Devi Renu ji
19/04/2026
अक्षय तृतीया के इस पावन पर्व पर, आपके जीवन में सुख, समृद्धि और आरोग्य का अक्षय भंडार बना रहे। माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद सदा आप पर बरसे।
अक्षय तृतीया मनाने के पीछे कई गहरी धार्मिक और पौराणिक कथाएं हैं। 'अक्षय' शब्द का अर्थ है जिसका कभी 'क्षय' (नाश) न हो। माना जाता है कि इस दिन किए गए कार्यों का फल अनंत काल तक बना रहता है।
विस्तार से इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. भगवान परशुराम का जन्मोत्सव
अक्षय तृतीया को भगवान विष्णु के छठे अवतार, भगवान परशुराम के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने पृथ्वी पर अधर्म का नाश करने और न्याय की स्थापना के लिए अवतार लिया था।
2. गंगा का धरती पर आगमन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन माता गंगा स्वर्ग से उतरकर पृथ्वी पर आई थीं। राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी ने इसी तिथि को धरती को पावन किया था, इसलिए यह दिन आध्यात्मिक शुद्धता का प्रतीक है।
3. महाभारत की कथाएँ
इस दिन से महाभारत काल की दो महत्वपूर्ण घटनाएँ जुड़ी हैं:
अक्षय पात्र: जब पांडव वनवास में थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को 'अक्षय पात्र' दिया था, जिससे कभी भोजन समाप्त नहीं होता था। यह समृद्धि का प्रतीक है।
महाभारत लेखन: माना जाता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास ने भगवान गणेश के साथ मिलकर महाभारत ग्रंथ लिखना शुरू किया था।
4. त्रेता युग का आरंभ
हिंदू काल गणना के अनुसार, सतयुग और त्रेता युग का समापन और नए युग की शुरुआत इसी तिथि से मानी जाती है। इसीलिए इसे "युगादि तिथि" भी कहते हैं।
5. अन्नपूर्णा देवी का जन्म
अन्न की अधिष्ठात्री देवी, माता अन्नपूर्णा का जन्म भी इसी दिन हुआ था। इसलिए इस दिन रसोई और अनाज की पूजा का विशेष महत्व है ताकि घर में कभी अन्न की कमी न हो।
6. सुदामा और श्री कृष्ण का मिलन
जब दरिद्रता से परेशान होकर सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे, तो उनके पास भेंट में केवल दो मुट्ठी चावल थे। कृष्ण ने उन चावलों को स्वीकार किया और बदले में सुदामा के बिना मांगे ही उनकी झोपड़ी को महल में बदल दिया। यह घटना भी अक्षय तृतीया को ही हुई थी।
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