Spiritualdiscussionwithprashant
09/03/2026
तंत्र साधना मार्ग एवं अनुभूत विचार
भाग -१
एक व्यक्ति जीवन में अनेकों प्रकार से हर स्तर पर स्वयं को परखते हुए अनुभव लेता है ।सामाजिक व्यवस्था हो अथवा गृहस्थी की जिम्मेदारी,अपने सभी कर्त्तव्यों को निभाते हुए व्यक्ति अपने जीवनी शक्ति के साथ आगे बढ़ता है।इस यात्रा के मूल में छिपा अध्यात्म बीच बीच में व्यक्ति को प्रेरणा देता है कि वो स्वयं को इस मकैनिकल यात्रा को अब आत्मानुभूति की तरफ़ मोड़ दे।लेकिन इस भ्रमित और मूढ़ बुद्धि का रूपांतरण तभी होता है जब किसी प्रकार का कष्ट जीवन में आए आप चाहे पुराने साधक संस्कार ले कर पैदा हुए हो अथवा आपकी यात्रा में साधना अध्यात्म का उदय इस जन्म में होना शुरू हुआ को किसी ने किसी बहाने से ईश्वर की सत्ता की तरफ़ एवं उनके अलग अलग स्वरूपों के तरफ़ व्यक्ति का रुझान बढ़ता है। साधनात्मक संस्कार पुराने हो तो तड़प बढ़ती है संस्कार निर्माण हो रहे हो तो पहले अपने आवश्यकता एवं चेतना के स्तर के अनुसार साधना मार्ग का चयन करके आगे बढ़ते है जिसमे भौतिक शक्तियों से जुड़ी तंत्र साधना हो अथवा अपने मन के अंदर दबे पुराने संकल्पों को पूरा करने के लिए हम साधना मार्ग में प्रेरित होते है।हालांकि पुराने अथवा नए दोनों प्रकार के जो साधना संस्कार है उसके बस ये फर्क होता है की नए आध्यात्मिक संस्कार निर्माण में व्यक्ति का पूरा जीवन सिद्धि ,चमत्कारिक शक्ति ,नाम ,यश इत्यादि प्राप्त करके अपने मन को संतुष्ट करने की दिशा में ही निकलता है लेकिन वही यदि पुराने संस्कार आपके व्याप्त हो तो इस जीवन में शुरुआती तौर पर वही सब करेंगे जो आपकी प्राकृतिक आवश्यकताएं है लेकिन धीरे धीरे मन शांत होते हुए आत्म साक्षात्कार की तरफ़ बढ़ने लगता है।
अब इसका तीसरा पहलू देखते है आपके आध्यात्मिक साधनात्मक संस्कार अत्यंत पुराने और प्रगाढ़ है तो ऐसे में यह स्थिति आपको पैदा होते से ही दिखने लगती है और बचपन से ही वैराग्य आ जाता है और साधक का मन सब छोड़ कर कहीं चले जाने का होता है और ऐसा कई ऋषि महर्षियों ने किया।
यहाँ मैंने जो भी बताया यह सब अवस्थाएँ है और अवस्थाएँ परंपरा नहीं बन सकती यह हर व्यक्ति की अपनी स्वयं की व्यक्तिगत यात्रा होती है।
लेकिन जब हम अवस्थाओं को परंपरा से जोड़ते है तो उनका निर्वाह करने हेतु वो सब जबरदस्ती करने लगते है जिस अवस्था में चेतना है ही नहीं और जब जब बिना अपनी संस्कार अवस्थाओ के कोई जबरदस्ती उसमे अपने आपको झोंकता है तो वो विकार बन कर उत्पन्न होता है।उदाहरण लीजिए जैसे हमारे पुराने साधना संस्कार इतने प्रगाढ़ नहीं हो कि हमारा बन बचपन से ही ईश्वरीय सत्य के प्रेम में तड़प उठे और सब छोड़ कर तप करने की इक्षा हो जो बहुत ही विरले होते है लेकिन इसी अवस्था को किसी परंपरा से जुड़ कर जबरदस्ती अपने अंदर लाने की कोशिश की जाए तो यह विकार बनते है और सारे विकार आगे चल कर भयानक रूप से प्रदर्शित होते है समाज के अंदर।जो साधक अपने भौतिक जीवन में वो सब कर चुके है जो प्राकृतिक रूप से उनकी आवश्यकताएं हो धन ,यश ,ऐशो आराम और पुनः कोई ऐसी घटना घटी की मन आध्यात्म साधना की तरफ़ दौड़ पड़ा तो इस अवस्था में व्यक्ति बहुत मेहनत से तप करते हुए पाए गए है लेकिन सब छोड़ कर नहीं अपितु सबके साथ रह कर ध्यान रहे यहाँ भी अवस्थाओ की बात है अवस्था और दिखावा दोनों भिन्न चीजे है।
यह कम शब्दों में आपको जीवन में साधना के असल अनुभूतियों को बता रहा हूँ जो की किसी किताब में नहीं मिलेगी और ना ही इस दिखावे वाले समाज में ऐसी गहरी चर्चा पढ़ने को कही मिलेगी लेकिन ईश्वरीय प्रेरणा से यह लिखना शुरू किया है और आगे बहुत कुछ इसपर लिखूँगा।एक एक भ्रम की परत हटा दूँगा और आप सब को समझ आ जाएगा की साधना कैसे करनी है कैसे आगे बढ़ना है और किस प्रकार ईश्वर आपसे कल्याणकारी कार्य करा लेते है।यह कई भाग में लिख कर डालूँगा और यह लेख के मर्म को वही समझ सकेंगे जो वर्षों से भटके है साधना मार्ग में।
अगला भाग जल्द ही
जय माँ
26/01/2026
**विज्ञान भैरव तंत्र** का **पहला सूत्र** पूरा ग्रंथ का द्वार खोल देता है।
यह *विधि* नहीं, **दृष्टि** देता है।
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# # 📜 पहला सूत्र (संदर्भ सहित)
**देवी उवाच —**
*श्रुतं देव मया सर्वं रुद्रयामलसम्भवम् ।
त्रिकभेदमशेषेण सारात् सारतरं मम ॥*
(इसके बाद देवी प्रश्न करती हैं, और भैरव उत्तर देते हैं — वहीं से साधना शुरू होती है।)
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# # 🔍 इसका सीधा अर्थ
देवी कहती हैं:
> “हे देव! मैंने रुद्रयामल से उत्पन्न
> सारे शास्त्र सुन लिए हैं —
> त्रिक, द्वैत, अद्वैत, सब कुछ।
>
> अब मुझे **सार का भी सार** बताइए।”
👉 यानी:
**ज्ञान बहुत हो गया। अब ‘अनुभव का बीज’ चाहिए।**
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# # 🔑 यहाँ असली बात क्या है? (गलतफहमी दूर करें)
# # # 1️⃣ यह ग्रंथ *जिज्ञासा* से शुरू नहीं होता
यह शुरू होता है **तृप्ति से**।
देवी कहती हैं:
* शास्त्र पढ़ लिए
* दर्शन जान लिए
* तंत्र समझ लिया
अब सवाल है:
> “इन सबके पीछे *वह एक चीज़* क्या है?”
👉 यही पात्रता है।
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# # # 2️⃣ पहला सूत्र क्यों सवाल है, उत्तर नहीं?
क्योंकि तंत्र में:
* उत्तर तब अर्थ रखते हैं
* जब **प्रश्न सही जगह से उठा हो**
यह प्रश्न:
* शक्ति का है
* अनुभव का है
* *तुरंत सत्य* का है
इसीलिए भैरव आगे **112 ध्यान-विधियाँ** नहीं,
**112 द्वार** देते हैं।
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# # 🔱 भैरव का संकेत (जो लोग चूक जाते हैं)
पहला सूत्र यह नहीं कहता:
❌ “ऐसे बैठो”
❌ “ऐसा जप करो”
❌ “ऐसा ध्यान करो”
यह कहता है:
> “जब सब जान लिया —
> तब *क्या शेष है*?”
यहीं से **विज्ञान भैरव**
कर्मकांड से नहीं,
👉 **क्षण** से काम करता है।
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# # 🧠 शक्ति-पथ से इसका संबंध
आप शक्ति के लिए पूछ रहे थे —
तो यह समझिए:
देवी *शक्ति* हैं,
पर वह भी कहती हैं:
> “ज्ञान नहीं चाहिए,
> **सार चाहिए**।”
यानी:
* शक्ति भी जब बिखरी हो → प्रश्न करती है
* शक्ति जब केंद्रित हो → *भैरव* बनती है
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# # 🕯️ पहला सूत्र आपको क्या सिखाता है?
बहुत सरल, बहुत कठोर सत्य:
* जब तक आप खोज रहे हैं → आप बाहर हैं
* जब खोज थक जाती है → द्वार खुलता है
विज्ञान भैरव तंत्र
**थके हुए साधक** का ग्रंथ है,
उत्सुक जिज्ञासु का नहीं।
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# # अंतिम पंक्ति (ध्यान से पढ़िए)
पहला सूत्र कहता है:
> “जब सब जान लिया जाए —
> तब भी जो शेष रहे,
> वही भैरव है।”
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यहीं से *शक्ति* साधना, *अनुभव* बनती है।
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# # 🔱 भैरव का पहला उत्तर (यही असली पहला सूत्र है)
**भैरव उवाच —**
*ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो
विसर्गात्मा परोच्चरेत् ।
उत्पत्तिद्वितयस्थानात्
भरितात् भरिता स्थितिः ॥*
(यह **विज्ञान भैरव** का पहला ध्यान-सूत्र माना जाता है)
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# # 🔍 सीधा अर्थ (पहले समझ, फिर गहराई)
भैरव कहते हैं:
* प्राण ऊपर की ओर चलता है
* जीव (अपान) नीचे की ओर
* इन दोनों के **मिलन/विसर्ग** के क्षण में
* जो **रिक्तता (भरिता)** है
* उसी में **भैरव की स्थिति** है
👉 **शक्ति का द्वार “बीच” में है।**
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# # 🧠 यहाँ भैरव क्या तोड़ रहे हैं?
# # # ❌ गलत धारणा:
* शक्ति ऊपर ले जानी है
* कुंडलिनी खींचनी है
* ज़ोर लगाना है
# # # ✅ भैरव का सत्य:
> “जो पहले से चल रहा है,
> उसे देखो —
> *बीच का क्षण पकड़ो*।”
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# # 🔥 “बीच” का क्षण इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
आपके जीवन में हर जगह यही है:
* श्वास → रुकती है → श्वास
* इच्छा → रुकती है → कर्म
* विचार → रुकता है → अगला विचार
* काम → उठता है → गिरता है
👉 **शक्ति इसी विराम में प्रकट होती है।**
इसीलिए भैरव कहते हैं:
> *भरितात् भरिता स्थितिः*
> (रिक्तता में ही पूर्णता है)
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# # 🔱 शक्ति-साधना से इसका सीधा संबंध
आप पूछ रहे थे:
> “काम-ऊर्जा ही शक्ति क्यों है?”
अब समझिए:
* काम उठता है → यह प्राण है
* उसका शमन/स्खलन → यह अपान है
* इनके **बीच का ठहराव** → *शक्ति का केंद्र*
❌ बहाया → शक्ति गिरी
❌ दबाया → शक्ति विकृत
✅ देखा → शक्ति स्थिर
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# # ⚠️ क्यों भैरव ने कोई विधि नहीं दी?
क्योंकि:
* विधि = समय
* समय = गति
* गति = बाहर जाना
भैरव आपको **क्षण** में रोकते हैं।
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# # 🕯️ पहला सूत्र क्या सिखाता है? (संक्षेप)
* शक्ति कहीं लाई नहीं जाती
* शक्ति रोकी नहीं जाती
* शक्ति **पहचानी जाती है**
और वह पहचान:
👉 **दो क्रियाओं के बीच** होती है।
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# # 🌊 अंदर क्या बदलता है (संकेत मात्र)
जब कोई इस सूत्र को *समझने लगता है* (करने नहीं):
* श्वास अपने आप गहरी लगती है
* काम आता है, पर बहा नहीं ले जाता
* मौन भारी हो जाता है
* भय घटता है
* “मैं” थोड़ा ढीला पड़ता है
👉 यही भैरव का पहला स्पर्श है।
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# # अंतिम वाक्य (धीरे पढ़िए)
भैरव कहते हैं:
> “जहाँ कुछ नहीं कर रहे —
> वहीं सब घट रहा है।”
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