Story Adda
07/08/2025
Rainy day ☔☔🌧️🌧️
22/05/2025
**अजनबी की परछाई**
विक्रम राज का फार्महाउस शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर एक सुनसान इलाके में था। चारों ओर घना जंगल और खेत थे। आसपास ना कोई मकान था, ना कोई बस्ती। कुछ साल पहले तक यह जगह वीरान थी, लेकिन विक्रम राज ने इसे अपनी रिटायरमेंट के लिए तैयार करवाया था। वे एक रिटायर्ड कर्नल थे – अनुशासित, सख़्त और नियमों के पक्के।
फार्महाउस में उनके साथ केवल एक बूढ़ा माली और एक चौकीदार रहते थे। उनके बेटे और बहू विदेश में बस चुके थे। कभी कभार ही कोई चिट्ठी या कॉल आता था। विक्रम राज को अब बस अपना सुकून भरा अकेलापन प्रिय था।
एक सुबह, जब कोहरा कुछ कम हुआ और धूप हल्की सी फैली, विक्रम राज हमेशा की तरह अपनी बगिया में टहलने निकले। हवा में मिट्टी की गंध थी, शायद रात को हल्की बारिश हुई थी।
उन्होंने जैसे ही गेट की तरफ़ देखा, तो पाया कि वहां एक आदमी बैठा है – झुका हुआ, काँपता हुआ। वह नंगे पाँव था, और उसके चेहरे पर थकान और डर साफ झलक रहा था।
विक्रम राज ने सख़्त आवाज़ में पूछा, "कौन हो तुम? यहां क्या कर रहे हो?"
आदमी ने सिर उठाया और धीमे से बोला, "साहब... मैं भागा हूं... जान बचाने के लिए।"
"जान? किससे?" विक्रम राज ने हैरानी से पूछा।
"चोर समझकर लोग पीछे पड़ गए... लेकिन मैं चोर नहीं हूं, साहब। मैं एक कारखाने में मजदूरी करता हूं। कल रात बारिश में फँस गया... जंगल में भटक गया... तो यहाँ शरण ले ली।"
उसी वक्त विक्रम राज की नजर गेट के पास रखे एक झोले पर पड़ी, जिसमें एक नन्ही सी बच्ची सिसक रही थी।
"यह किसकी है?" उन्होंने कठोर स्वर में पूछा।
आदमी ने कांपती आवाज़ में कहा, "मेरी बेटी है, साहब। माँ नहीं रही... इसको बचाने के लिए ही भागा हूँ।"
विक्रम राज कुछ देर खामोश रहे। उनकी कठोर आँखों में नमी सी चमकी। उन्होंने अपने माली को आवाज़ दी – "इस आदमी और बच्ची के लिए खाने का इंतज़ाम करो। और सुनो, जब तक मामला साफ़ नहीं होता, ये यहीं रहेंगे... मेरी निगरानी में।"
उस दिन एक अजनबी की परछाई विक्रम राज के जीवन में एक नया उजाला लेकर आई थी।
विक्रम राज की निगरानी में वह आदमी और उसकी बेटी फार्महाउस के एक पुराने स्टोर रूम में ठहरे। माली ने साफ़-सफ़ाई कर दी थी और चौकीदार ने कुछ पुराने बिस्तर वहां डाल दिए थे।
उस रात विक्रम राज को नींद नहीं आई। न जाने क्यों उस अजनबी की थकी आँखें और उसकी मासूम बच्ची का चेहरा उनके मन में उतर गया था। उन्हें अपनी पुरानी यादें सताने लगीं—जब उनकी पत्नी गुज़री थीं और उन्होंने अकेले अपने बेटे को पाला था।
सुबह विक्रम राज ने उस आदमी को बुलाया।
"तुम्हारा नाम क्या है?" उन्होंने सख़्ती से पूछा।
"नाम दीपक है, साहब," वह बोला, "बिहार से आया था काम की तलाश में। एक फैक्ट्री में काम करता था। लेकिन मजदूरी बहुत कम थी और... और मालिक की नीयत ठीक नहीं थी। मेरी बेटी पर बुरी नज़र थी उसकी। उसी से बचाकर भागा हूँ।"
विक्रम राज के चेहरे पर एक गहरी लकीर खिंच गई। वे समझ सकते थे कि ये बातें झूठ नहीं थीं।
"अब क्या करने का इरादा है?" उन्होंने पूछा।
"कोई भी छोटा-मोटा काम मिल जाए तो यहीं रहकर बेटी को पाल लूँगा, साहब," दीपक ने सिर झुकाकर कहा।
कुछ पल चुप रहने के बाद विक्रम राज बोले, "तुम यहाँ रहो। फार्महाउस बड़ा है। माली बूढ़ा हो गया है, उसे मदद की ज़रूरत है। तुम्हें काम मिलेगा, लेकिन नियमों के साथ।"
दीपक की आँखों में चमक आ गई। उसने विक्रम राज के पैरों को छू लिया।
समय बीतता गया। दीपक ने अपने कर्म, सच्चाई और मेहनत से न केवल विक्रम राज का भरोसा जीता, बल्कि फार्महाउस को भी एक नए जीवन से भर दिया। छोटी बच्ची, जिसे सब 'चुटकी' कहने लगे थे, धीरे-धीरे विक्रम राज की आंखों का तारा बन गई।
अब वह फार्महाउस, जो कभी वीरान और खामोश हुआ करता था, चुटकी की हँसी से गूंजने लगा था।
वक़्त जैसे पंख लगाकर उड़ने लगा। देखते ही देखते चुटकी पाँच साल की हो गई थी। उसकी किलकारियों से कभी वीरान पड़ा फार्महाउस अब एक जीवंत आँगन बन चुका था।
विक्रम राज अब पहले जैसे सख़्त नहीं रहे थे। उम्र ने उनके चेहरे पर झुर्रियाँ दी थीं, लेकिन चुटकी ने उनके दिल को एक नई कोमलता दी थी। वह सुबह अखबार के साथ बैठते तो चुटकी आकर उनकी छड़ी छीन लेती, उनकी टोपी पहनकर सलामी देती – “गुड मॉर्निंग, जनरल अंकल!” और विक्रम राज की ठहरी हुई मुस्कान खिल उठती।
दीपक अब फार्महाउस का एक भरोसेमंद सदस्य बन चुका था। माली और चौकीदार उसे ‘छोटे मालिक’ कहने लगे थे। वह खेती-बाड़ी, बगीचे की देखभाल और आसपास के गाँववालों से भी मेलजोल बनाए रखने में माहिर हो गया था।
एक दिन, जब चुटकी स्कूल से लौटी तो उसके हाथ में एक चित्र था — उसमें उसने विक्रम राज, दीपक और खुद को एक घर के भीतर खड़ा बनाया था, और ऊपर लिखा था:
**"मेरा परिवार"**
विक्रम राज की आँखें वह चित्र देखकर भर आईं। उन्होंने कुछ कहे बिना चुटकी को सीने से लगा लिया।
पर कहानी यहीं नहीं थमती।
एक शाम फार्महाउस की शांति को एक विदेशी नंबर से आई कॉल ने तोड़ा। विक्रम राज के बेटे ने कॉल किया था। वर्षों बाद।
"पापा, मैं इंडिया आ रहा हूँ… कुछ ज़रूरी बात करनी है।"
एक हफ़्ते बाद, उनका बेटा और बहू फार्महाउस पहुँचे। बड़े ही आधुनिक, व्यस्त और व्यावसायिक स्वभाव के लोग थे। पहले तो सब सामान्य रहा, लेकिन जब उन्हें दीपक और चुटकी के बारे में पता चला, तो उनके चेहरे पर असंतोष झलकने लगा।
“डैड, आप एक अजनबी और उसकी बच्ची को इतने सालों से यहाँ रखे हुए हैं? आप जानते भी हैं इनका बैकग्राउंड क्या है?”
विक्रम राज चुप रहे। कुछ देर बाद बोले,
“अगर खून का रिश्ता ही सब कुछ होता… तो तुम मुझे अकेले छोड़कर विदेश नहीं जाते। ये अजनबी नहीं हैं… मेरे अपने हैं।”
रात के खाने की मेज़ पर सन्नाटा था। लेकिन चुटकी की नन्ही आवाज़ गूंज रही थी — “दादू, कल आप मुझे बगीचे में स्टोरी सुनाओगे ना?”
विक्रम राज ने उसकी तरफ़ देखा, मुस्कुराए और बोले,
“हाँ बेटा… कल, हर रोज़, हमेशा… जब तक ये दिल धड़कता रहेगा।”
#हिंदीकहानी
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