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30/05/2026

हत्या सिर्फ किसी की साँसें छीन लेने का नाम नहीं है। कभी-कभी शब्द भी हथियार बन जाते हैं। हर रोज़ तानों से किसी का आत्मविश्वास तोड़ देना, उसकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ करना, हर कोशिश के बाद भी उसे यह एहसास दिलाना कि वह कभी पर्याप्त नहीं है — यह भी एक तरह की हत्या है।

किसी की मेहनत को किस्मत कह देना, उसके संघर्ष को अनदेखा कर देना, उसके सपनों का मज़ाक बनाना और उसके अस्तित्व को धीरे-धीरे मिटा देना — ये घाव शरीर पर नहीं, आत्मा पर लगते हैं। ऐसे घाव दिखाई नहीं देते, लेकिन उन्हें सहने वाला इंसान हर दिन भीतर से थोड़ा-थोड़ा मरता है।

कई लोग ज़िंदा दिखाई देते हैं, मुस्कुराते भी हैं, लेकिन उनके भीतर का विश्वास, उनका आत्मसम्मान और उनकी खुशियाँ कब की दम तोड़ चुकी होती हैं। इसलिए कभी किसी को अपने शब्दों, व्यवहार या उपेक्षा से इतना मत तोड़िए कि वह जीते-जी मरने लगे।

अब एक सवाल खुद से पूछिए — क्या हम किसी की ज़िंदगी में सहारा बन रहे हैं, या अनजाने में उसके आत्मविश्वास

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