Satyapath
सनातन वैदिक धर्म के कुछ वाक्य –
१. येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।। (उपनिषद)
अर्थ : जिसके पास विद्या, तप, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं, वह मनुष्य ऐसा जीवन व्यतीत करते हैं जैसे एक मृग। अर्थात जिस मनुष्य ने किसी भी प्रकार से विद्या अध्ययन नहीं किया, न ही उसने व्रत और तप किया, थोड़ा बहुत अन्न-वस्त्र-धन या विद्या दान नहीं दिया, न उसमें किसी भी प्रकार का ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है, ऐसे मनुष्य इस धरती पर भार होते हैं। मनुष्य रूप में होते हुए भी पशु के समान जीवन व्यतीत करते हैं।
२. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ -वृहदारण्यक उपनिषद
अर्थ : वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से ही पूर्ण है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
३. शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।। -उपनिषद
अर्थ : शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है। अर्थात शरीर को सेहतमंद बनाए रखना जरूरी है। इसी के होने से सभी का होना है अत: शरीर की रक्षा और उसे निरोगी रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है। पहला सुख निरोगी काया।
४. आहार केवल मात्र वही नहीं जो मुख से लिया जाए, आहार का अभिप्राय है स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर को पुष्ट और स्वस्थ रखने के लिए इस संसार से जो भी खाद्य लिया जाए।
आहार शुद्धि से प्राणों के सत की शुद्धि होती है, सत्व शुद्धि से स्मृति निर्मल और स्थिरमति (जिसे प्रज्ञा कहते हैं) प्राप्त होती है। स्थिर बुद्धि से जन्म-जन्मांतर के बंधनों और ग्रंथियों का नाश होता है और बंधनों और ग्रंथियों से मुक्ति ही मोक्ष है। अत: आहार शुद्धि प्रथम नियम और प्रतिबद्धता है।
1. कान के लिए आहार है शब्द या ध्वनि।
2. त्वचा के लिए आहार है स्पर्श।
3. नेत्रों के लिए आहार है दृश्य या रूप जगत।
4. नाक के लिए आहार है गंध या सुगंध।
5. जिह्वा के लिए आहार है अन्न और रस।
6. मन के लिए आहार है उत्तम विचार और ध्यान।
ज्ञानेन्द्रियों के जो 5 दोष हैं जिससे चेतना में विकार पैदा होता है, उनसे बचें।
५. प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं। तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।
अर्थ : जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा‚ मात्र लोगों को भ्रमित करेगा व निश्चित मृत्यु को प्राप्त अपने कर्मों के फल भोगेगा।
६. ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ (कठोपनिषद)
अर्थ : परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। उक्त तरह की भावना रखने वाले का मन निर्मल रहता है। निर्मल मन से निर्मल भविष्य का उदय होता है।
1.६ धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................
इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों ने मनुष्यों को जन्म के अनुसार दो जातियों स्त्री व पुरूष एवं गुण‚ कर्म व ज्ञान के अनुसार ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य व शूद्र चार भागों अर्थात् वरणों में बाँटा है। जिन्हे वेदों के अनुसार अपना सम्पूण जीवन सोलह संस्कारों के नियमों का पालन करते हुए व धर्मयुक्त आचरण धारण करते हुए जीना होता है‚ जो मनुष्य ऐसा करते हैं वेद उन्हे आर्य (श्रेष्ठ) कहते हैं और इन नियमों के विपरीत जाकर अधर्मयुक्त आचरण का जीवन जीते हैं वे अनार्य‚ दस्यु व असुर आदि कहे गए हैं। सोलह संस्कार कौन से हैं व उनके क्या नियम हैं इस पर बाद में लिखा जाएगा। इस समय धर्म क्या है इसको लेकर बताया जाएगा क्यों धर्म के बिना सब व्यर्थ है और वेदों के समस्त नियम मनुष्यों द्वारा पृथ्वी पर धर्म स्थापना के लिए ही हैं।
वेदों में धर्म को ईश्वर प्रदत्त व अति गूढ विषय बताया गया है जिसको लेकर समय समय पर सनातन वैदिक धर्म के कुछ विख्यात अति विद्वान ऋषियों ने अपने ज्ञानानुसार धर्म को परिभाषित किया है‚ तो आइए जानते हैं कि उनके अनुसार धर्म क्या है –
याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं:
अहिंसा सत्य मस्तेतयं शौचमिन्द्रि यनिग्रह: ।
दानं दमो दया शान्ति : सर्वेषां धर्मसाधनम् ।।
(अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना) , दान, संयम (दम) , दया अर्थात् संसार के समस्त प्राणियों के प्रति समभाव एवं शान्ति‚ शान्ति अर्थात् संसार के समस्त प्राणियों से प्रेम की भावना)
महाभारत के महान् यशस्वी पात्र विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं -
इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ।
उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान् बन जाता है।
गौतम ऋषि कहते हैं -
'यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म।'
अर्थात् जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है।
महर्षि मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं:
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥ (मनुस्मृरति ६.९२)
अर्थात् धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा की गयी गलतियों को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (आन्तरिक एवं बाह्य शुचिता अर्थात् पवित्रता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्ति की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य अर्थात् न्याय, करूणा, परोपकार, समभाव, अभय, प्रेम आदि सतगुणों का पालन) और अक्रोध (अकारण क्रोध न करना)।
ये दस धर्म के लक्षण हैं .........।
जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ॥
अर्थात् धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो। अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।
वात्स्यायन के अनुसार धर्म
वात्स्यायन ने धर्म और अधर्म की तुलना करके धर्म को स्पष्ट किया है। वात्स्यायन मानते हैं कि मानव के लिए धर्म मनसा, वाचा और कर्मणा होता है। यह केवल क्रिया या कर्मों से सम्बन्धित नहीं है बल्कि धर्म चिन्तन और वाणी से भी संबंधित है।
शरीर का अधर्म : हिंसा, अस्तेय, प्रतिसिद्ध मैथुन
शरीर का धर्म : दान, परित्राण, परिचरण (दूसरों की सेवा करना)
बोले और लिखे गये शब्दों (वाणी) द्वारा अधर्म : मिथ्या, परुष, सूचना, असम्बन्ध
बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा धर्म : सत्व, हितवचन, प्रियवचन, स्वाध्याय (self study)
मन का अधर्म : परद्रोह, परद्रव्याभिप्सा (दूसरे का द्रव्य पा लेने की इच्छ), नास्तिक्य (denial of the existence of morals and religiosity)
मन का धर्म : दया, स्पृहा (disinterestedness), और श्रद्धा
महाभारत के वनपर्व (३१३/१२८) में कहा है-
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
जो पुरूष धर्म का नाश करता है, धर्म उसी का नाश कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म भी उसकी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म (धर्म को नष्ट करने का प्रयास या इच्छा) कभी हमारा नाश न कर डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए।
इन महान ऋषियों की परिभाषाओं के अनुसार यदि कहा जाय कि धर्म के इऩ लक्षणों अर्थात् परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि ऐसे कर्म जिनसे विश्व‚ राष्ट व समाज के समस्त प्राणियों व जीवनदायिनी प्रकृति का कल्याण होता है‚ वही धर्म है। वास्तव में धर्म प्राचीनकाल में "संविधान का पर्यायवाची" हुआ करता था। आज जिस प्रकार संविधान का उल्लंघन करने पर व्यक्ति कानून द्वारा "दंडित" किया जाता है उसी तरह प्राचीन वैदिक संस्कति की समाज व्यवस्था में "धर्म विपरीत" आचरण करने पर उस समय के कानून व समाज द्वारा दंडित किया जाता था यहाँ तक कि विषय अधिक गम्भीर होने पर व्यक्ति का "सामाजिक बहिष्कार" तक कर दिया जाता था व विषय अक्षम्य होने पर मृत्यु दण्ड तक का प्रावधान था।
ओउम् .......।
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