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Photos from Next Gaon's post 23/02/2026

मेरे जीवन के सबसे ज्यादा खुशी के पल ।

हर किसी का कहाँ होता है नसीब, अपने सपनों को जीने का...

मैं खुशनसीब हूं जो अपने सपनों को जीने का सौभाग्य मुझे मिलेगा....

एक शिक्षक होना भी कितने गर्व वाली बात है....इसका धीरे धीरे एहसास मुझे हो रहा हैं. ...

23/02/2026

बस एसे एक बच्चें की जिंदगी ही अगर हमसे बदली गई ,
तो मैं खुद को खुशनसीब समझूँगा . एकबार पढ़ना जरूर कि पढ़ाई की ताकत क्या है??

उसने सिर्फ 15 डॉलर देकर एक अजनबी बच्चे को बचाया।
दशकों बाद उसे पता चला कि वह बच्चा उसे क्यों खोज रहा था।

1982 में, केन्या का एक लड़का — क्रिस म्बुरू — सब कुछ खोने की कगार पर खड़ा था।
वह अपने ग्रामीण जिले का सबसे मेधावी छात्र था। मिट्टी के घर में, बिना बिजली के, लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करता था।

लेकिन उसका परिवार स्कूल की फीस नहीं चुका सकता था।
बिना मदद के उसकी पढ़ाई खत्म हो जाती — और उसके साथ खत्म हो जाता खेतों में कॉफी तोड़ते हुए जिंदगी बिताने से बाहर निकलने का सपना।
इसी बीच, दुनिया के दूसरे कोने में स्वीडन में रहने वाली 80 वर्षीया किंडरगार्टन शिक्षिका हिल्डे बैक ने एक बाल प्रायोजन कार्यक्रम का विज्ञापन देखा।

उन्होंने सूची में से एक नाम चुना — “क्रिस म्बुरू, केन्या।”
उन्होंने हर स्कूल टर्म में 15 डॉलर भेजने शुरू किए।
न कोई पहचान, न धन्यवाद की अपेक्षा — बस एक शांत निर्णय कि वह उस बच्चे की मदद करेंगी, जिससे शायद वह कभी मिलें भी नहीं।

वह छोटा-सा धनराशि सब कुछ बदल गई।
क्रिस स्कूल में बना रहा। समय के साथ उसने और हिल्डे ने पत्रों का आदान-प्रदान शुरू किया।
वह उसके शिक्षकों, पढ़ाई और सपनों के बारे में पूछती थीं।
उनके शब्दों से क्रिस को एहसास हुआ कि वह सिर्फ किसी संस्था का हिस्सा नहीं हैं — वह एक वास्तविक इंसान हैं, जो उस पर विश्वास करती हैं।

और उसने उन्हें कभी नहीं भुलाया।
क्रिस ने नैरोबी विश्वविद्यालय से कानून में टॉप किया।
बाद में उसे हार्वर्ड में फुलब्राइट स्कॉलरशिप मिली।
आगे चलकर वह संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार वकील बना — जिसने दुनिया भर में नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराधों के मामलों में काम किया।
लेकिन उसके दिल में एक बात हमेशा खटकती रही।
वह उस महिला को ठीक से धन्यवाद नहीं कह पाया था, जिसने उसकी जिंदगी बदल दी।

सच तो यह था कि वह उन्हें ठीक से जानता भी नहीं था।
2001 में, क्रिस ने अपने जैसे प्रतिभाशाली लेकिन गरीब छात्रों के लिए एक छात्रवृत्ति कार्यक्रम शुरू किया।
उसने केन्या में स्वीडन के राजदूत से अनुरोध किया कि वे उसके रहस्यमयी प्रायोजक को ढूंढने में मदद करें — ताकि वह फाउंडेशन का नाम उनके नाम पर रख सके।
वे उन्हें ढूंढ लाए।
हिल्डे बैक।

वह अभी भी जीवित थीं।
अब भी स्वीडन में शांत जीवन जी रही थीं।
क्रिस उनसे पहली बार मिलने गया।
उसे लगा था कि वह किसी धनी परोपकारी महिला से मिलेगा।

लेकिन उसे एक साधारण, स्नेही और विनम्र महिला मिली — जो यह सुनकर हैरान थीं कि कोई उनके काम को इतना बड़ा मान रहा है।
फिर फिल्म निर्माता जेनिफर अर्नोल्ड ने उनके पुनर्मिलन पर एक डॉक्यूमेंट्री बनानी शुरू की।
शोध के दौरान एक सच सामने आया, जो हिल्डे ने कभी क्रिस को नहीं बताया था।

हिल्डे बैक का जन्म 1922 में नाजी जर्मनी में एक यहूदी परिवार में हुआ था।
जब हिटलर के नूरेमबर्ग कानूनों ने यहूदी बच्चों को स्कूल जाने से रोक दिया, तब अजनबियों ने उन्हें स्वीडन भागने में मदद की।

उनके माता-पिता पीछे रह गए, क्योंकि स्वीडन की शरण नीति वृद्ध यहूदियों को प्रवेश की अनुमति नहीं देती थी।
दोनों को बाद में यातना शिविरों में भेज दिया गया।
उनके पिता वहीं मारे गए।

मां का फिर कभी कोई पता नहीं चला।
हिल्डे होलोकॉस्ट से इसलिए बचीं क्योंकि अजनबियों ने उनकी मदद की।
लेकिन उन्होंने अपनी खुद की शिक्षा खो दी — सिर्फ इसलिए कि वह कौन थीं।

पचास साल बाद, उन्होंने चुपचाप दुनिया के दूसरे छोर पर एक बच्चे की शिक्षा के लिए भुगतान किया —
वही बच्चा, जो बड़ा होकर उसी नफरत के खिलाफ लड़ेगा जिसने उनके परिवार को नष्ट कर दिया था।
जब क्रिस को उनकी कहानी पता चली, तो वह रो पड़ा।
और हिल्डे को यह तक नहीं पता था कि जिस बच्चे को उन्होंने प्रायोजित किया, उसने अपना जीवन नरसंहार के अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने के लिए समर्पित कर दिया है।

2003 में, हिल्डे केन्या आईं — “हिल्डे बैक एजुकेशन फंड” के उद्घाटन के लिए।
पूरा गांव उनका सम्मान करने उमड़ पड़ा।
2012 में वह फिर लौटीं — अपने 90वें जन्मदिन पर —
सैकड़ों बच्चों के बीच, जिनका भविष्य उनकी उदारता से बदल चुका था।
13 जनवरी 2021 को, 98 वर्ष की आयु में हिल्डे बैक का निधन हो गया।

आज “हिल्डे बैक एजुकेशन फंड” लगभग 1,000 केन्याई बच्चों की शिक्षा में सहायता कर चुका है।
कई छात्र विश्व के विश्वविद्यालयों से स्नातक हो चुके हैं।
और कई अब खुद अगली पीढ़ी की मदद कर रहे हैं।

एक महिला।
पंद्रह डॉलर।
एक बच्चा।

उस बच्चे ने एक फाउंडेशन बनाया।
उस फाउंडेशन ने सैकड़ों जिंदगियां बदल दीं।
और वे जिंदगियां अब औरों की जिंदगी बदल रही हैं।
क्रिस ने एक बार कहा था:

“आप पूरी दुनिया नहीं बदल सकते। कभी-कभी एक बच्चे की मदद करना ही काफी होता है।”
हिल्डे ने एक बच्चे की मदद की।
और वह एक छोटा-सा करुणा का कार्य पीढ़ियों तक गूंजता रहेगा।

Photos from Next Gaon's post 22/02/2026

अध्याय 3....

एक वादा... एक संकल्प... और आंसुओं में लिपटी वो मुस्कान! ❤️

​आज शब्द कम पड़ रहे हैं और भावनाएं आँखों से छलक रही हैं। कल का दिन मेरे जीवन के सबसे यादगार दिनों में से एक था। कल 'वो' आई थी... मेरी वो बहन, जिसके एक वादे पर मैंने अपनी पूरी जिंदगी का मकसद टिका दिया।

​किस्सा शुरू होता है साल 2009 से...

मुझे आज भी याद है जब मैं अपनी बहन से मिलने गया था और हम दोनों 'मदर टेरेसा अनाथ आश्रम' गए थे। उस दिन वहां मासूम चेहरों को देखकर मेरे भीतर कुछ टूट सा गया था। वही मेरे जीवन का 'टर्निंग पॉइंट' था। उस दिन मैंने अपनी बहन के हाथ पर बंधी राखी की लाज रखते हुए उसे एक वचन दिया था— "एक दिन मैं भी तुम्हारे लिए एक ऐसा ही 'एजुकेशनल अनाथ आश्रम' खड़ा करूँगा, जहाँ शिक्षा की लौ से अंधेरे मिटाए जाएंगे।"
​साल बीतते गए, चुनौतियां आईं, पर वो वादा पत्थर की लकीर बना रहा। 2009 से शुरू हुआ यह मानसिक सफर आखिरकार 15 फरवरी 2026 को धरातल पर उतरा, जब मैंने इस सपने की नींव रखी।

​कल की वो मुलाकात और वो भावुक पल:

कल जब बहन स्कूल (आश्रम) विजिट करने आई, तो लगा जैसे 2009 से 2026 तक का सारा संघर्ष सफल हो गया। हमने साथ बैठकर केक काटा, पुराने दिनों की बातें कीं और उस पुराने वादे को फिर से याद किया। साथ बैठकर खाना खाते हुए जब हमारी नजरें मिलीं, तो बिना कहे ही हम दोनों समझ गए कि हमने लंबा रास्ता तय किया है। उसकी आँखों में गर्व की चमक देखना मेरे लिए दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

​मेरा संकल्प:

मैं ईश्वर से बस यही प्रार्थना करता हूँ कि जिस भाव और पवित्रता के साथ मैंने इस मिशन की शुरुआत की है, उसे उसी तरह पूरा कर सकूँ। यह सिर्फ एक इमारत नहीं है, यह उन बच्चों का भविष्य है जिन्हें शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत है। मैं समाज में शिक्षा का प्रसार उसी निस्वार्थ भाव से करना चाहता हूँ जो भाव उस दिन 2009 में मेरे मन में जागा था।
​बहन, तुम्हारा यह भाई अपना वादा मरते दम तक निभाएगा। यह अनाथ आश्रम सिर्फ मेरा नहीं, हम दोनों के उस अटूट विश्वास का प्रतीक है।

अपनी बहन यश्मी धमीजा (बेंनू) के नाम समर्पित।

आगे की कहानी अगली पोस्ट में... जारी है...

— कलम: मोहन सोनी
M.D -MAV School Sirsa

(अध्यापक: अपनी पसंद से, इत्तेफाक से नहीं)

18/02/2026

मेरी जीवनी: अध्याय - 2

"एक संकल्प, एक नई दिशा"

2009 का वह साल मेरे जीवन का 'टर्निंग पॉइंट' था। जब मैं खुद से वह वादा करके अपने कॉलेज के लिए निकला, तो लौटते वक्त मैं वह इंसान नहीं रहा था जो गया था। मेरी रातों की नींद अब चैन की नहीं, बल्कि एक मकसद की मोहताज हो चुकी थी। दिल और दिमाग में बस एक ही गूँज थी—अपनी बहन यश्मी धमीजा (बेंनू) के उस सपने को हकीकत में बदलना।

उस दिन के बाद जैसे मेरी दुनिया ही बदल गई। ब्रांडेड कपड़ों का शौक और दोस्तों के साथ बेमतलब की मस्ती, सब पीछे छूट गए। मैंने अपना वक्त अनाथालयों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं में बिताना शुरू कर दिया। मैं जीवन की गहराइयों और रिश्तों के असली अर्थ को समझने की कोशिश करने लगा। हर साल राखी आती और बेंनू की भेजी हुई वह राखी मेरे उस वादे को और फौलादी बना देती, जो मैंने उसे उपहार के रूप में देने के लिए खुद से किया था।

वर्ष 2013 में मेरी B.Tech पूरी हुई। करियर की राह मुझे दिल्ली ले आई, जहाँ मैंने IES की तैयारी के लिए 'Madeeasy' में दाखिला लिया। वहाँ बिताए उन 7-8 महीनों ने मुझे न केवल नए दोस्त दिए, बल्कि एक मार्गदर्शक भी दिया—बी. सिंह (B. Singh) जी।

वहाँ पढ़ाई के दौरान, एक दिन सर ने 'Complete School' के कॉन्सेप्ट का जिक्र किया। उन्होंने एक ऐसे स्कूल की कल्पना साझा की जहाँ बच्चा सिर्फ शिक्षा के लिए न आए, बल्कि सफलता का हाथ थामकर बाहर निकले। दिल्ली में रहकर किताबों और सिलेबस में मेरी दिलचस्पी भले ही कम रही हो, लेकिन वहाँ मिले जीवन के अनुभवों ने मेरे सपनों को पंख दे दिए। मुझे वह मार्ग मिल गया था, जिस पर चलकर मैं अपने गंतव्य तक पहुँच सकता था।

जनवरी का महीना था, जब मेरे कॉलेज का मित्र अशोक अपनी नौकरी छोड़ SSC CGL की तैयारी के लिए दिल्ली आ गया। उसी दौरान मेरे स्कूल का साथी मनोज भी दिल्ली पहुँचा। अब मैं अकेला नहीं था; हम तीन दोस्त और एक साझा सपना था। यहीं से शुरू हुए उस सपने को धरातल पर उतारने के नए और ठोस प्रयास...
जारी है...

अपनी बहन यश्मी धमीजा (बेंनू) के नाम समर्पित।

आगे की कहानी अगली पोस्ट में... जारी है...

— कलम: मोहन सोनी
M.D -MAV School Sirsa

(अध्यापक: अपनी पसंद से, इत्तेफाक से नहीं)

17/02/2026

Aap Sab ka bahut bahut आभार..

1. Mata Bimla Devi -11000
2. Mamta Sinwar- 1100
3. Deepak soni -5100
4. Krishan bhai ji -2100
5. Rakesh bhai ji - 2100
6. Sharmila bai - 5100
7. Lovepreet -1100
8. Aman dhayal - 1100
9. Sushila bai bhattu - 1100
10. Ramesh ji chimpa - 500
11. Geeta ji nezia- 1100
12. Kapil ji soni - 3100
13. Kishor ji soni - 1100

Photos from Next Gaon's post 15/02/2026

🌟 एक सपने का साकार होना: 'नेक्स्ट गांव' - एजुकेशनल अनाथ आश्रम की नींव 🌟

​"आज 15 फरवरी 2026 का दिन मेरे जीवन का सबसे ऐतिहासिक और भावुक दिन है।"

​17 साल पहले, एक छोटा सा बीज एक सपने के रूप में मन में बोया गया था—एक ऐसा सपना जहाँ उन बच्चों को सहारा मिले जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है। आज वह सपना हकीकत में बदल गया है। मुझे यह बताते हुए अपार हर्ष और संतोष हो रहा है कि आज हमने 'नेक्स्ट गांव' (Next Gaon) नामक एक अनोखे एजुकेशनल अनाथ आश्रम की नींव रख दी है।

​हमारा संकल्प:

'नेक्स्ट गांव' केवल एक आश्रय स्थल नहीं होगा, बल्कि यह एक ज्ञान का मंदिर होगा। यहाँ हम अनाथ बच्चों को गोद (Adoption) लेंगे और उनकी उच्च स्तर की शिक्षा, संस्कार और उज्ज्वल भविष्य की पूरी जिम्मेदारी उठाएंगे। हमारा लक्ष्य है कि यहाँ से निकलने वाला हर बच्चा समाज का एक जिम्मेदार और सफल नागरिक बने।

​स्थान: माता अनारी देवी विद्यापीठ, जमाल (जिला सिरसा, हरियाणा) के पास।

​आज के पावन अवसर की झलकियाँ:

इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने मेरे अपनों का साथ पाकर मेरा उत्साह और भी बढ़ गया। इस शुभ अवसर पर मेरे पिता श्री प्रभु दयाल भामा जी, फूफा जी श्री सुभाष चंद्र जी सोनी जी, मेरे प्रिय मित्र अमन की माता जी, भाई कृष्ण जी, धर्मवीर राव जी, नवीन, रोहतास जांगड़ा जी,दीपक भाई जी, कपिल भाईसाहब राकेश जी, ममता मैडम और मनीष शास्त्री जी उपस्थित रहे। साथ ही, स्कूल के समस्त स्टाफ मेंबर्स और प्यारे विद्यार्थियों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और भी खास बना दिया। आप सभी का आशीर्वाद और सहयोग ही मेरी असली ताकत है।

​यह सफर लंबा है, लेकिन इरादे फौलादी हैं। 17 साल का इंतजार आज एक नई शुरुआत में बदल गया है। मैं आप सभी से निवेदन करता हूँ कि इस नेक कार्य में अपना आशीर्वाद और साथ बनाए रखें।

​संपर्क करें:
यदि आप इस मुहिम से जुड़ना चाहते हैं या कोई जानकारी चाहते हैं, तो हमसे संपर्क करें:
📞 9813203074
9050303074

​"शिक्षा ही वह शस्त्र है जिससे हम दुनिया बदल सकते हैं, और 'नेक्स्ट गांव' इसी बदलाव की पहली सीढ़ी है।"

15/02/2026

मेरे जीवन की कहानी

1.जीवन का एक नया अध्याय:

मेरी छोटी बहन और वह टर्निंग पॉइंट
​हर किसी के जीवन में कुछ लक्ष्य होते हैं और उन लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए कोई न कोई 'टर्निंग पॉइंट' (मोड़) ज़रूर आता है। मेरे जीवन का वह मोड़ साल 2009 में आया, जब मैं अपनी राखी बहन, बेनू से पहली बार लुधियाना में मिला।
​उस समय तक मैं एक ऐसा लड़का था जिसे सिर्फ ब्रांडेड कपड़े पहनना और मौज-मस्ती में रहना पसंद था। हालांकि दोस्ती मेरे लिए तब भी उतनी ही प्यारी थी जितनी आज है, जिसके लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ।

2. ​वह मुलाकात जिसने सब बदल दिया

​उस समय मेरी 'लिटिल चैम्प' बेनू शायद सातवीं या आठवीं कक्षा में रही होगी। उसने मुझसे कहा— "भैया, कहीं घूमने चलें?" मुझे लगा उसे बर्गर, पिज्जा खाना होगा या कोई मूवी देखनी होगी। मैं तैयार हो गया, पर मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि वह छोटी सी गुड़िया मुझे लुधियाना के 'मदर टेरेसा अनाथ आश्रम' ले जाएगी और मेरी पूरी सोच को हिलाकर रख देगी।
​वहाँ अनाथ बच्चों के साथ-साथ मानसिक रूप से अक्षम (mentally challenged) बच्चे और एक वृद्धाश्रम भी था। बेनू मुझे एक-एक करके हर जगह ले गई।

3.​घृणा से प्रेम तक का सफर

​जब हम छोटे बच्चों से मिले, तो मेरी नज़र एक ऐसे बच्चे पर पड़ी जो शायद कई दिनों से नहाया नहीं था और काफी गंदा दिख रहा था। उसे देखकर मेरे मन में एक पल के लिए घृणा (घिन) का भाव आया। लेकिन तभी बेनू ने उसी बच्चे को बिना किसी हिचकिचाहट के गोद में उठा लिया और उसे लाड-दुलार करने लगी।
​वह मेरी दुनिया को झकझोर देने वाला पहला पल था। अगले ही पल, मेरी वह घिन प्यार में बदल गई और उस दृश्य ने हमेशा के लिए मेरी दुनिया बदल दी।

4. ​निस्वार्थ सेवा की मूरत

​इसके बाद हम वृद्धाश्रम गए। वहाँ कई बुजुर्ग दादा-दादी उसे पहचान रहे थे और उसे ढेर सारा आशीर्वाद दे रहे थे। मैं बस मंत्रमुग्ध होकर यह सब देख रहा था। मेरे अंदर कुछ टूट रहा था और कुछ नया बन रहा था। अपनी छोटी सी बहन के लिए मेरे मन में सम्मान और प्यार कई गुना बढ़ गया था।
​अगला पड़ाव वह वार्ड था जहाँ मानसिक रूप से अक्षम बच्चे थे। हैरानी की बात तो यह थी कि जो बच्चे किसी को नहीं पहचानते थे, वे भी बेनू को पहचान रहे थे। यह उस निस्वार्थ प्रेम की ताकत थी, जो उसे वहाँ एक अलग पहचान दे रही थी। मेरी बहन मुझे अनजाने में ही 'प्रेम' का असली मतलब समझा रही थी। उस दिन तक मैं एक लक्ष्यहीन (visionless) इंसान था, लेकिन बेनू ने मुझे जीवन का एक बड़ा उद्देश्य दे दिया था।

5. ​राखी का अनमोल कर्ज

​वहाँ कुछ बच्चे ऐसे भी थे जिन्हें वह पढ़ाया करती थी। इतनी कम उम्र में समाज के लिए ऐसा समर्पण देखकर मैं खुद को उसकी राखी के कर्ज तले दबा हुआ महसूस करने लगा। उसी दिन मैंने ठान लिया कि मुझे अपनी इस बहन को राखी का असली उपहार देना है।
​साल दर साल बीतते गए, बेनू राखी भेजती रही और मैं हर बार खुद से और उससे यह वादा करता रहा कि— "एक दिन तेरा भाई तुझे उपहार में बेसहारा लोगों का सहारा बनने वाला एक 'आशियाना' बनाकर देगा।"

​आगे की कहानी अगली पोस्ट में... जारी है...

​— कलम: मोहन सोनी
(अध्यापक: अपनी पसंद से, इत्तेफाक से नहीं)

14/02/2026

आप सब का स्वागत है

14/02/2026

एक नई सुबह और एक हैं शुरुआत है, आप सबका साथ रहेगा तो नई राहें बनाएंगे।

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