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10/11/2025

शिवहर जिला अधिकारी की अपील

02/11/2025

चंदा बाबू और उमा देवी कृष्णैया:-

आपने चंदा बाबू और उनके दो बेटों का नाम बार बार सुना होगा , हां वही , तेज़ाब से नहला दिया, ब्ला ब्ला ब्ला। मगर क्या आपने जी कृष्णैया का नाम उस तरह सुना ? नहीं सुना होगा।

चलिए मैं डिटेल के साथ बताता हूं

जी. कृष्णैया का जन्म तत्कालीन आंध्र प्रदेश और अब के तेलंगाना के महबूबनगर जिले के एक बेहद गरीब दलित परिवार में हुआ था , उनके पिता रेलवे में गैंगमैन (कुली) की नौकरी करते थे।

कृष्णैया ने बहुत गरीबी और मुश्किल हालात में अपनी पढ़ाई की , पिता के साथ कुली का काम किया और साथ में पढ़ाई भी की और मेहनत करके UPSC परीक्षा पास कर 1985 बैच के IAS अधिकारी बने और कैडर मिला बिहार।

बिहार कैडर में आने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग पश्चिम चंपारण में हुई। अपनी पोस्टिंग के बाद ही वह सादगीपूर्ण जीवन जीने और गरीबों के मसीहा के रूप में चर्चित होने लगे क्योंकि वह रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याएं सुनते और समाधान करते।

इसके बाद लालू प्रसाद यादव की सरकार में मात्र 37 साल की उम्र में वह गोपालगंज के जिलाधिकारी बने और डकैतों के गढ़ में भी उन्होंने भूमि सुधार जैसे कठिन कार्यों को बखूबी निभाया और उनके इस काम में उन्हें जमींदारों का भारी विरोध झेलना पड़ा।

इस सबके बावजूद उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि जिले का आम आदमी उन्हें "डीएम साहब" कहकर प्यार से पुकारता था कोई भी सीधे जिलाधिकारी के पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंच जाता मगर इसी कारण वह जमींदारों की आंखों की किरकिरी थे।

यह वही दौर था जब लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री काल में बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई चरम पर थी और वह तबका जो समाज में अछूत था वह सत्ता के शीर्ष पर आने लगा‌, मंत्री विधायक बनने लगा था। और स्वर्ण जातियां इस कारण उग्र हो रहीं थीं।

इसी बीच दिसंबर 1994‌ को मुजफ्फरपुर में स्थानीय गैंगस्टर छोटन शुक्ला की हत्या हो गई। जानते हैं कि छोटन शुक्ला कौन थे ? बाहुबली गैंग्स्टर मुन्ना शुक्ला के छोटे भाई और लालगंज विधानसभा क्षेत्र से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ रही शिवानी शुक्ला के सगे चाचा।

छोटन शुक्ला के समर्थक और तत्कालीन विधायक आनंद मोहन सिंह के नेतृत्व में हजारों की उग्र भीड़ छोटन शुक्ला की शवयात्रा के बहाने सड़क जाम कर प्रदर्शन कर रही थी। और उग्र भीड़ शुक्ला की मौत का बदला लेने के नारे लगा रही थी।

5 दिसंबर 1994 को दोपहर में गोपालगंज जिले के खाबरा गांव के पास मुजफ्फरपुर-गोपालगंज हाईवे से गोपालगंज के जिलाधिकारी कृष्णैया एक आधिकारिक बैठक से सफेद अंबेसडर में बैठे लौट रहे थे और उनके साथ में थे ड्राइवर दीपक कुमार और गनर।

हाईवे पर सड़क जाम के कारण गाड़ी रुक गई। उग्र भीड़ ने गाड़ी को मुज़फ्फरपुर जिलाधिकारी की कार समझ लिया और भीड़ ने गाड़ी पर हमला कर दिया, टायर फोड़े, शीशे तोड़े और जी कृष्णैया को कार से बाहर खींच लिया।

कृष्णैया चिल्लाते रहे कि "मैं गोपालगंज का DM हूं, मुजफ्फरपुर का नहीं", लेकिन गुस्सैल भीड़ ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया और वह घायल होकर ज़मीन पर गिर गये। इस पिटाई के दौरान आनंद मोहन ने जिलाधिकारी कृष्णैया के सिर में दो गोलियां मार दी।

बाहुबली नेता आनंद मोहन सिंह को भीड़ का नेतृत्व करने और गोली चलाने का दोषी ठहराया गया और 2007 में पटना की निचली अदालत ने आनंद मोहन को फांसी की सजा सुनाई जिसे बाद में पटना हाईकोर्ट ने इसे उम्रकैद में बदल दिया।

फांसी की सज़ा पा चुके ऐसे आनंद मोहन सिंह को 2023 में नितीश कुमार की बिहार सरकार के जेल मैनुअल संशोधन के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया।

30 साल से संघर्ष कर रही उमा कृष्णेय्या आज भी न्याय के लिए संघर्षरत हैं और कहती हैं कि "मैं अपने पति के न्याय के लिए आखिरी सांस तक लड़ूंगी"

अब आनंद मोहन सिंह नितीश कुमार के करीबी हैं और उनकी पत्नी लवली आनंद जदयू से सांसद और बड़ा बेटा विधायक है और दूसरे बेटे को भाजपा में सेट करने में लगे हुए हैं....उस पर सब चुप हैं और ओसामा शहाब पर तमाम मुख्यमंत्री और गृहमंत्री आक्रमण कर रहे हैं।

यही फर्क है शहाबुद्दीन और आनंद मोहन सिंह का

साभार: मोहम्मद ज़ाहिद

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