deepak lodhi

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21/08/2024

जिस पल आपकी मृत्यु हो जाती है,
उसी पल से आपकी पहचान एक "बॉडी" बन जाती है।
अरे
"बॉडी" लेकर आइये,
"बॉडी" को उठाइये,
ऐसे शब्दो से आपको पुकारा जाता है, वे लोग भी आपको आपके नाम से नही पुकारते ,
जिन्हे प्रभावित करने के लिये आपने अपनी पूरी जिंदगी खर्च कर दी।

इसीलिए

जीवन में आने वाली हर चुनौती को स्वीकार करें।......
अपनी पसंद की चीजों के लिये खर्चा करें।......
इतना हंसिये के पेट दर्द हो जाये।....

आप कितना भी बुरा नाचते हो ,
फिर भी नाचिये।......
उस खूशी को महसूस कीजिये।......
फोटोज् के लिये पागलों वाली पोज् दीजिये।......
बिलकुल छोटे बच्चे बन जाइये ।

क्योंकि मृत्यु जिंदगी का सबसे बड़ा लॉस नहीं है।
लॉस तो वो है
के जिंदा होकर भी आपके अंदर जिंदगी जीने की आस खत्म हो चुकी है।.....

हर पल को खूशी से जीने को ही जिंदगी कहते है।
"जिंदगी है छोटी,पर" हर पल में खुश हूँ "काम में खुश हूं,"आराम में खुश हूँ ,

"आज पनीर नहीं," दाल में ही खुश हूं,
"आज गाड़ी नहीं," पैदल ही खुश हूं,

"दोस्तों का साथ नहीं," अकेला ही खुश हूं,
"आज कोई नाराज है," उसके इस अंदाज से ही खुश हूं,

"जिस को देख नहीं सकता," उसकी आवाज से ही खुश हूं ।।

संकल्प-सर्वे भवन्तु सुखिनः

12/05/2024

सभी माताओं को मातृत्व दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं🙏
Deepak Lodhi
मां के प्रति प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भारत समेत कई देशों में हर साल मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है.
मदर्स डे मनाने की शुरुआत अमेरिकन महिला एना जॉर्विस ने की थी. हालांकि, मातृत्व दिवस को मनाने की शुरुआत औपचारिक रूप से 9 मई 1914 को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने की थी. उस समय अमेरिकी संसद में कानून पास करके हर साल मई के महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाने का फैसला लिया गया था. उसी समय से अमेरिका, यूरोप और भारत सहित कई देशों में मई के महीने के दूसरे संडे को मदर्स डे मनाया जाने लगा.

मदर्स डे कि शुरुआत एक अमेरिकन एक्टिविस्ट एना जार्विस ने की थी. एना जार्विस को अपनी मां से बेहद लगाव था. जार्विस अपनी मां के साथ ही रहती थी और उन्होंने कभी शादी भी नहीं की थी. मां के गुजर जाने के बाद एना ने मां के प्रति प्यार जताने के लिए मदर्स डे की शुरुआत की थी. इसके लिए एना ने इस तरह की तारीख चुनी कि वह उनकी मां की पुण्यतिथि 9 मई के आस-पास ही पड़े. उसी समय से हर साल मई माह के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है.

30/04/2024

मिडिल क्लास पति बीवी से
प्यार ज़ाहिर करने के लिए उसे
#ऐनिवर्सरी पर #ताजमहल
या #नैनीताल नहीं ले जा पाता

वो रात में घर में जब सब सो जाते हैं तब ऑफ़िस वाले बैग में से चाँदी की एक जोड़ी #पायल और लाल काँच की #चूड़ियाँ धीरे से निकाल कर बीवी को पहनाता है और..

उसके माथे पर पसीने से फैल चुके #सिंदूर को
#उँगलियों से पोछते हुए ख़ुद से वादा करता है
कि अगली गर्मी से पहले वो #कूलर ख़रीद लाएगा
और शर्ट की जेब टटोल कर #500 रूपये
हाथ में देते हुए कहता है,

घर जाना तो #अम्मा और #भाभी के लिए
कुछ ख़रीद लेना.
क्या पता तब हाथ में पैसे रहे न रहे..🍁 🙂

हर कोई चाहता है प्यार में
#ताजमहल बनाना परंतु जीवन का सच है
दो टाइम की रोटी का जुगाड़ लगाना🙏🏼

जिंदगी तब बहुत आसान हो जाती है,

जब साथी परखने वाला नहीं....!
बल्कि समझने वाला साथ हो...!!
‼🌷❤🙏❤🌷‼
Deepak Lodhi

27/04/2024

राजनीति क्या होती है समझिए
===============≠===
एक बनिया था 5 रुपए की रोटी बेचता था। उसे रोटी की कीमत बढ़ानी थी लेकिन बिना राजा की अनुमति कोई भी अपने दाम नहीं बढ़ा सकता था। लिहाजा राजा के पास बनिया पहुंचा, बोला राजा जी मुझे रोटी का दाम 10 करना है। राजा बोला तुम 10 नहीं 30 रुपए करो, बनिया बोला महाराज इससे तो हाहाकार मच जाएगा, राजा बोला इसकी चिंता तुम मत करो, तुम 10 रुपए दाम कर दोगे तो मेरे राजा होने का क्या फायदा, तुम अपना फायदा देखो और 30 रुपए दाम कर दो, अगले दिन बनिये ने रोटी का दाम बढ़ाकर 30 रुपए कर दिया, शहर में हाहाकार मच गया, सभी राजा के पास पहुंचे, बोले महाराज यह बनिया अत्याचार कर रहा है, 5 की रोटी 30 में बेच रहा है, राजा ने अपने सिपाहियों को बोला उस गुस्ताख बनिए को मेरे दरबार में पेश करो, बनिया जैसे ही दरबार में पहुंचा, राजा ने गुस्से में कहा गुस्ताख तेरी यह मजाल तूने बिना मुझसे पूछे कैसे दाम बढ़ा दिया, यह जनता मेरी है तू इन्हें भूखा मारना चाहता है, राजा ने बनिए को आदेश दिया तुम रोटी कल से आधे दाम में बेचोगे, नहीं तो तुम्हारा सर कलम कर दिया जाएगा, राजा का आदेश सुनते ही पूरी जनता ने जोर से बोला.... महाराज की जय हो , महाराज की जय हो, महाराज की जय हो।
नतीजा सुनिए....
अगले दिन से 5 की रोटी 15 में बिकने लगी।
अब जनता भी खुश...बनिया भी खुश...और राजा भी खुश।

05/03/2024

#मानसिक #तनाव के #शिकार हो रहे #युवा, इन्हें #बचाना #आवश्यक...... Deepak Lodhi

युवाओं में मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते ही वह अपनी जीवन लीला समाप्त करने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इससे उन्हें बचाने के लिए आवश्यकता है। इसके लिए शासन, प्रशासन के साथ समाजिक रूप से पहल करने की आवश्यकता है।
आए दिन जिला अस्पताल में एक न एक मामला पहुंचता है, जिसमें लोग खुद को मिटाने के लिए कदम उठाए हुए होते हैं। इसमें कुछ की जान बच जाती है, लेकिन सभी खुशनसीब नहीं होते। बीते वर्ष में ही 117 लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त करने कर ली। जबकि यदि 10 वर्ष का आंकड़ा देखे तो केवल मानसिक तनाव के चलते ही 814 लोगों को जान चली गई। सबसे पहले युवाओं को इससे बचने की आवश्यकता है, क्योंकि इस आंकड़े में सबसे अधिक युवा वर्ग ही है। पिछले वर्ष जिला प्रशासन द्वारा मनोरोगों को पहचानने, मानसिक विकारों से निपटने के लिए प्रबन्धन समेत उपचार के बारे में लोगों को बताने के लिए स्वास्थ्य विभाग को योजना तैयार करने के निर्देश दिए। वहीं स्वास्थ्य विभाग की टीम कुछ स्कूल भी गए, जहां पर विद्यार्थियों को महत्वपूर्ण बातें समझाई गई। वहीं काउंसलर के नंबर भी दिए गए। इसके बाद इस मामले में कुछ हद तक कमी आयी, लेकिन इसमें और काम करने की आवश्यकता है।

बंद करें उपेक्षित महसूस करना

अधिकतर युवा वर्ग खुद को परिवार, रिश्तेदार व समाज से उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। वह अवसादग्रस्त हो जाते हैं। पुलिस विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार उपेक्षापूर्ण कार्य के चलते बीते वर्ष 117 लोगों की मौत हुई। कोई फंदे पर झूला तो किसी जहर सेवन किया। वहीं किसी ने कहीं डूबकर या जलकर जान दे दी। इससे लोगों को बचने और बचाने की आवश्यकता है। जीवनलीला समाप्त करने के अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन कबीरधाम जिले में इसका प्रमुख कारण प्रेम प्रसंग भी है। युवा जहां प्रेम में असफल या फिर प्रेमी द्वारा प्रताडि़त हो जाते हैं। युवाओं को इससे भी बचाने की आवश्यकता है।
तनाव से मुक्त होने यह करें
मुख्य कारण डिप्रेशन मतलब मानसिक तनाव है। सबसे पहले इससे बचने की आवश्यकता है। इसके लिए डॉक्टसर्् सबसे अच्छा उपाय परिवार व दोस्तों के साथ घुल-मिलकर रहने की सलाह देते हैं। साथ ही योग, ध्यान, व्यायाम, घूमने-फिरने से भी तनाव कम होता है। वहीं युवाओं को कहीं न कहीं व्यस्त रहने की आवश्यकता है ताकि खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे से ख्याल ही दिमाग में न आए।

कॉलेज में काउंसलिंग बेदह जरूरी

पिछले वर्ष कलक्टर ने डॉक्टरों की बैठक लेकर इस विषय पर चर्चा की और स्वास्थ्य विभाग को योजना तैयार करने के निर्देश दिए। इस पर काउंसलर द्वारा कई स्कूल में पहुंचकर विद्यार्थियों से रूबरू होकर कई प्रकार की जानकारी दी। इस तरह की काउंसलिंग लगातार होती रहनी चाहिए। स्कूल के साथ-साथ निजी व शासकीय कॉलेज, कोचिंग सेंटर सहित अन्य स्थानों पर इसका आयोजन होना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक युवा वर्ग तनाव मुक्त हो सके। क्योंकि इन संस्थानों में ही अधिक युवा पहुंचते हैं। वहीं तनाव भी अधिकतर इन्हें युवाओं को महसूस होता है।

12/01/2024

भारत में सेवा का मतलब पैर दबाना और पैरों तले रहना है........

10/01/2024

घर की नई नवेली इकलौती बहू एक प्राइवेट बैंक में बड़े ओहदे पर थी । उसकी सास तकरीबन एक साल पहले ही गुज़र चुकी थी । घर में बुज़ुर्ग ससुर औऱ उसके पति के अलावे कोई न था । पति का अपना कारोबार था ।

पिछले कुछ दिनों से बहू के साथ एक विचित्र बात होती ।बहू जब जल्दी जल्दी घर का काम निपटा कर ऑफिस के लिए निकलती ठीक उसी वक़्त ससुर उसे आवाज़ देते औऱ कहते बहू ,मेरा चश्मा साफ कर मुझें देती जा। लगातार ऑफिस के लिए निकलते समय बहू के साथ यही होता । काम के दबाव औऱ देर होने के कारण क़भी कभी बहू मन ही मन झल्ला जाती लेकिन फ़िरभी अपने ससुर को कुछ बोल नहीं पाती ।

जब बहू अपने ससुर के इस आदत से पूरी तरह ऊब गई तो उसने पूरे माजरे को अपने पति के साथ साझा किया ।पति को भी अपने पिता के इस व्यवहार पर बड़ा ताज्जुब हुआ लेकिन उसने अपने पिता से कुछ नहीं कहा। पति ने अपनी पत्नी को सलाह दी कि तुम सुबह उठते के साथ ही पिताजी का चश्मा साफ करके उनके कमरे में रख दिया करो ,फिर ये झमेला समाप्त हो जाएगा ।

अगले दिन बहू ने ऐसा ही किया औऱ अपने ससुर के चश्मे को सुबह ही अच्छी तरह साफ करके उनके कमरे में रख आई।लेकिन फ़िरभी उस दिन वही घटना पुनः हुई औऱ ऑफिस के लिए निकलने से ठीक पहले ससुर ने अपनी बहू को बुलाकर उसे चश्मा साफ़ करने के लिए कहा। बहू गुस्से में लाल हो गई लेकिन उसके पास कोई चारा नहीं था। बहू के लाख उपायों के बावजूद ससुर ने उसे सुबह ऑफिस जाते समय आवाज़ देना नहीं छोड़ा ।

धीरे धीरे समय बीतता गया औऱ ऐसे ही कुछ वर्ष निकल गए। अब बहू पहले से कुछ बदल चुकी थी। धीरे धीरे उसने अपने ससुर की बातों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया और फ़िर ऐसा भी वक़्त चला आया जब बहू अपने ससुर को बिलकुल अनसुना करने लगी । ससुर के कुछ बोलने पर वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देती औऱ बिलकुल ख़ामोशी से अपने काम में मस्त रहती। गुज़रते वक़्त के साथ ही एक दिन बेचारे बुज़ुर्ग ससुर भी गुज़र गए।

समय का पहिया कहाँ रुकने वाला था,वो घूमता रहा घूमता रहा। छुट्टी का एक दिन था। अचानक बहू के मन में घर की साफ़ सफाई का ख़याल आया। वो अपने घर की सफ़ाई में जुट गई। तभी सफाई के दौरान मृत ससुर की डायरी उसके हाथ लग गई।बहू ने जब अपने ससुर की डायरी को पलटना शुरू किया तो उसके एक पन्ने पर लिखा था-"दिनांक 24-08-09.... आज के इस भागदौड़ औऱ बेहद तनाव व संघर्ष भरी ज़िंदगी में, घर से निकलते समय, बच्चे अक्सर बड़ों का आशीर्वाद लेना भूल जाते हैं जबकि बुजुर्गों का यही आशीर्वाद मुश्किल समय में उनके लिए ढाल का काम करता है। बस इसीलिए, जब तुम चश्मा साफ कर मुझे देने के लिए झुकती थी तो मैं मन ही मन, अपना हाथ तुम्हारे सिर पर रख देता था क्योंकि मरने से पहले तुम्हारी सास ने मुझें कहा था कि बहू को अपनी बेटी की तरह प्यार से रखना औऱ उसे ये कभी भी मत महसूस होने देना कि वो अपने ससुराल में है औऱ हम उसके माँ बाप नहीं हैं। उसकी छोटी मोटी गलतियों को उसकी नादानी समझकर माफ़ कर देना । वैसे मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ है बेटा!! डायरी पढ़कर बहू फूटफूटकर रोने लगी। आज उसके ससुर को गुजरे ठीक 2 साल से ज़्यादा समय बीत चुके हैं लेकिन फ़िर भी वो रोज़ घर से बाहर निकलते समय अपने ससुर का चश्मा साफ़ कर, उनके टेबल पर रख दिया करती है, उनके अनदेखे हाथ से मिले आशीष की लालसा में।

जीवन में हम रिश्तों का महत्व महसूस नहीं करते हैं, चाहे वो किसी से भी हो, कैसे भी हो और जब तक महसूस करते हैं तब तक वह हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।

रिश्तों के महत्व को समझें और उनको सहेज कर रखें🙏
deepak lodhi

08/01/2024

👉 #विनम्रता बनाये रखें #जीवन में

एक चीनी सन्त बहुत बूढ़े हो गए। मरने का समय निकट आया तो उनके सभी शिष्य उपदेश सुनने और अन्तिम प्रणाम करने एकत्रित हुए।

उपदेश न देकर उन्हाेने अपना मुँह खोला और शिष्यों से पूछा-देखो इसमें दाँत है क्या?

शिष्यों ने उत्तर दिया – एक भी नहीं।

दूसरी बार फिर उन्हाेने मुँह खोला और पूछा – देखो इसमें जीभ है क्या?

सभी शिष्यों ने एक स्वर में उत्तर दिया हाँ – है – है।

सन्त ने फिर पूछा – अच्छा एक बात बताओ। जीभ जन्म से थी और मृत्यु तक रहेगी और दाँत पीछे उपजे और पहले चले गए। इसका क्या कारण है?

इस प्रश्न का उत्तर किसी से भी न बन पड़ा।

सन्त ने कहा जीभ कोमल होती है इसलिए टिकी रही। दाँत कठोर थे इसलिए उखड़ गए।

15/12/2023

#ऐसे जीने से तो #मर जाना #बेहतर है.....
Deepak Lodhi

ऐसे जीने से तो मर जाना बेहतर हैं...
ऐसे जीने से तो मर जाना बेहतर है ....

धृतराष्ट की तरह आंखे मूंदे रहने से से तो अभिमन्यु बन मर जाना बेहतर हैं
कायर बन जीने से तो शहीद कहलाना बेहतर हैं....

ऐसे जीने से तो मर जाना बेहतर है

किसी के तलवे चाटने से तो खुद्दार हो जाना बेहतर हैं..
गलत कर रात भर जगने से तो ईमानदारी से भूखे पेट सो जाना बेहतर हैं...

इस तरह जीने से तो मर जाना बेहतर हैं...

किसी और को कुचल आगे बढ़ जाने से तो पीछे रह जाना बेहतर है...
अपनी दस्तार किसी के कदमो रख देने से गर्दन कटा लेना बेहतर हैं....

इस तरह जीने से तो मर जाना बेहतर हैं

जिंदा होकर सच को सच ओर झूट को झूट बोल नही सकते...

सुनो इससे तो जिंदा लाश कहलाना बेहतर हैं....

इस तरह जीने से तो मर जाना बेहतर है....

बेईमानी के पैसों का महल से तो ख़ुदारी वाली झोपड़ी बेहतर हैं...
दौलत वालो के आगे झुक जाने से तो किसी गरीब के घर का चूल्हा बन जाना बेहतर हैं

ऐसे जीने तो मर जाना बेहतर हैं........

10/12/2023

शीर्षक:: #टूटते #परिवार, #दरकते #रिश्ते

एक समय था, जब लोग समूह और परिवार में रहना पसंद करते थे। जिसका जितना बड़ा परिवार होता वो उतना ही संपन्न और सौभाग्यशाली माना जाता था और जिस परिवार में मेल-मिलाप होता था और संपन्नता होती थी उसकी पूरे क्षेत्र में प्रतिष्ठा रहती थी।

यह ऐसा समय था, जब समाज में परिवारों का बोलबाला था और समाज में संपन्नता की निशानी परिवार की प्रतिष्ठा से लगाई जाती थी। उस दौर में व्यक्ति की प्रधानता नहीं थी, बल्कि परिवारों की प्रधानता थी।

लोग कहते हैं कि आज जमाना नहीं रहा कि घर में अकेले रहा जाए। आज जमाना नहीं रहा कि किसी नौकर को घर में अकेले छोड़ा जाए। अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि आज जमाना नहीं है कि अकेले बच्चों को बाहर भेजा जाए।

आज कॉलोनियों और महानगरों में रहने वाले परिवार अपने ही घर में अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं और घर के मुख्य द्वार पर एक छेद रखा जाता है कि पहले देखा जाए कि कौन है? यह छेद संयुक्त परिवारों की टूटन के बाद आया छेद है।

लोग दिनदहाड़े अपने घरों में अंदर से ताला लगाकर कैद होकर रह रहे हैं और कह रहे हैं कि जमाना बदल गया है। कभी सोचा है यह जमाना बदला किसने? आज जरूरत है, इन तालों को तोड़ने की, मुख्य दरवाजों में लगे इन छेदों की जगह दिल में रोशनदान बनाने की ताकि आप अपने मोहल्ले और शहर को अपना समझें और भाईचारा फैलाएं।

आज जरूरत है, औपचारिकताओं को मिटाकर दिमाग के दरवाजे खोलने की ताकि आपके दिल में सारा परिवार समा जाए और पूरा मोहल्ला आ जाए और आपको लगे कि यह शहर मेरा है, यह परिवार मेरा है, यह मोहल्ला मेरा है।

हम अपने संस्कारों को न भूलें, अपनी परंपराओं को न भूलें। याद रखें विकास करना बुरी बात नहीं है, पर विकास के साथ परंपराओं को भूलना नासमझी है। हम समझदार बनें और संयुक्त परिवार और मोहल्ले के महत्व को समझें ताकि आने वाले समय में हमारी पीढ़ी को कह सके कि हां हमने भी आपके लिए एक सुखी, समृद्ध, संपन्न और विकसित भारत छोड़ा है।

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