Yogi uttarakhandi
18/10/2023
22/11/2021
(ऋषिकेश नारायण भरत मंदिर)
स्कन्द पुराण केदार खण्ड के अन्तर्गत इस प्राचीन मन्दिर का वर्णन इस प्रकार से है ।
कृते वाराहरुपेण त्रेतायां कृतवीर्यजम् ।
द्वापरे वामनं देवं कलौ भरतमेव च ।
(स्कन्द पुराण 116/42)
यहाँ पर रैभ्य ऋषि एवं सोमशर्मा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनको दर्शन दिये और उनके आग्रह पर अपनी माया के दर्शन कराये। ऋषि ने माया के दर्शन कर भगवान से प्रार्थना की, प्रभु आप माया से मुक्ति प्रदान करें। भगवान विष्णु ने तब वरदान दिया कि आपने इन्द्रियों (हृषीक) को वश में करके मेरी आराधना की है, इसलिये यह स्थान हृषीकेश कहलायेगा और मैं कलियुग में भरत नाम से विराजूंगा। हृषीकेश के मायाकुण्ड में पवित्र स्थान के बाद जो प्राणी मेरे दर्शन करेगा उसे माया से मुक्ति मिल जायेगी। ये ही हृषीकेश भगवान श्री भरत जी महाराज हैं।
विक्रमी सम्वत् 846 (ई0 सन् 789) के लगभग आद्य शंकराचार्य जी ने बसंत पंचमी के दिन हृषीकेश नारायण श्री भरत भगवान की मूर्ति को मन्दिर में पुनः प्रतिष्ठित करवाया। यह मूर्ति शालिग्राम शिला पर निर्मित है। तभी से हर वर्ष बसन्त - पंचमी के दिन भगवान शालिग्राम जी को हर्ष उल्लास से मायाकुण्ड में पवित्र स्नान के लिये ले जाया जाता है एवं धूमधाम से नगर भ्रमण के बाद पुनः मन्दिर में आकर प्रतीकात्मक प्रतिष्ठित किया जाता है।
दारुहल्दी -किनगोड़🍇
'दारू हल्दी जिसे स्थानीय भाषा में किनगोड़ कहा जाता है, एक जबरदस्त एंटी डायबेटिक पौधा है। साथ ही इसमें अन्य औषधीय गुण भी है। इसका संस्कृत नाम दारुहरिद्रा,हिन्दी नाम दारुहल्दी तथा अन्य नाम किनगोड़, तोतर वा किलमोड़ा है
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल के पारंपरिक खानपान में जितनी विविधता एवं विशिष्टता है, उतनी ही यहां के फल-फूलों में भी है। खासकर जंगली फलों का तो यहां समृद्ध दुनिया है। यह फल कभी मुसाफिरों व चरवाहों की क्षुधा शांत किया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को इनका महत्व समझ में आया तो लोक ज़िंदगी का भाग बन गए। औषधीय गुणों से भरपूर जंगली फलों का लाजवाब जायका हर किसी को इनका दीवाना बना देता है।
उत्तराखंड में जंगली फल न केवल स्वाद, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद अहमियत रखते हैं। बेडू, तिमला, मेलू, काफल, अमेस, दाड़िम, करौंदा, बेर, जंगली आंवला, खुबानी, हिंसर, किनगोड़, खैणु, तूंग, खड़ीक, भीमल, आमड़ा, कीमू, गूलर, भमोरा, भिनु समेत जंगली फलों की ऐसी सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं,जो पहाड़ को प्राकृतिक रूप में संपन्नता प्रदान करती हैं। इन जंगली फलों में विटामिन्स व एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इन जंगली फलों में एक फल है किनगोड़।
किनगोड़ उत्तराखंड के 1400 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाला एक औषधीय प्रजाति है। इसका बॉटनिकल नाम ‘बरबरिस अरिस्टाटा’ है। किनगोड़ से अब एंटी डायबिटिक दवा तैयार की जा रही है।
इसका पौधा दो से तीन मीटर ऊंचा होता है। पहाड़ में पायी जाने वाली कंटीली झाड़ी किनगोड़ आमतौर पर खेतों की बाड़ के लिए प्रयोग होती है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह औषधीय गुणों से भी भरपूर है। मधुमेह में किल्मोड़ा की जड़ बेहद कारगर होती है। इसके अलावा बुखार, पीलिया और नेत्र आदि रोगों के इलाज में भी ये फायदेमंद है।
इस पौधे की होम्योपैथी में बरबरिस नाम से दवा बनाई जाती है। इस पौधे की जड़ से अल्कोहल ड्रिंक बनता है। इसके अलावा कपड़ों के रंगने में इसका इस्तेमाल होता है। यह प्रजाति भारत के उत्तराखंड-हिमांचल के अलावा नेपाल और श्रीलंका में भी पाई जाती है।
किनगौड़ की जड़ों को पानी में भिगोकर रोज सुबह पीने से शुगर के रोग से बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है। फलों का सेवन मूत्र संबंधी बीमारियों से निजात दिलाता है। इसके फलों में मौजूद विटामीन सी त्वचा रोगों के लिए भी फायदेमंद है।
उत्तराखंड के जंगलों में यह बहुतायत में पाया जाता है। कई लोग इसके कंटीली झाड़ी से खेतों पर बाड़ लगाते हैं, इसका फल बहुत ही टेंगी होता है। इसे सभी पसंद करते हैं, इसकी औषधीय गुणवता की जानकारी ना होने की वजह से लोग इसका पर्याप्त फायदा नहीं उठा पाते हैं। लेकिन ध्यान यह रखें कि इसके प्रयोग से पहले इसकी प्रयोग की विधि किसी जानकार व्यक्ति से अवश्य लें। तभी ही इस औषधि का सेवन करें।_yogi uttarakhandi
उत्तराखंड राज्य के उत्तरी कुमाऊं क्षेत्र में पंचचूली नाम का एक मनमोहक हिमशिखर है। वास्तव में यह शिखर पांच पर्वत चोटियों का समूह है। समुद्रतल से इनकी ऊंचाई 6,312 मीटर से 6,904 मीटर तक है। इन पांचों पीक्स को पंचचूली-1 से पंचचूली-5 तक नाम दिये गये हैं। इनको पंचचूली क्यों कहा गया, इसका पौराणिक आधार है। जानते हो महाभारत युद्घ के उपरांत वर्षों तक पांडवों ने सुचारू रूप से राज्य सम्भाला। जब वह वृद्घ हो गये तो उन्होंने स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान किया। मान्यता है कि हिमालय में विचरण करते हुए इस पर्वत पर उन्होंने अंतिम बार अपना भोजन बनाया था। इसके पांच उच्चतम बिंदुओं पर पांचों पांडवों ने पांच चूल्ही अर्थात छोटे चूल्हे बनाये थे, इसलिए यह स्थान पंचचूली कहलाया।
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