Ravikant Patel
💔 "मम्मी-पापा... मुझमें दोबारा NEET देने की हिम्मत नहीं है..."
यह सिर्फ एक सुसाइड नोट की पंक्ति नहीं, बल्कि एक बेटी के टूटे हुए सपनों की आखिरी चीख थी।
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले की होनहार छात्रा आकांक्षा चतुर्वेदी अब इस दुनिया में नहीं रही। वह डॉक्टर बनना चाहती थी। उसके माता-पिता ने अपनी हैसियत से बढ़कर संघर्ष किया। किसान पिता ने कर्ज लिया, नागपुर में कुक का काम किया, ताकि बेटी सफेद कोट पहन सके और परिवार का भविष्य बदल सके।
बताया जाता है कि NEET परीक्षा के बाद आकांक्षा को अपने चयन की उम्मीद थी, लेकिन परीक्षा से जुड़ी विवादों और अनिश्चितताओं ने उसे गहरे मानसिक तनाव में डाल दिया।
आज उस घर में किताबें हैं, नोट्स हैं, NEET की तैयारी का हर सामान है...
लेकिन उन्हें पढ़ने वाली बेटी नहीं है।
एक पिता का कर्ज बाकी है...
एक मां की आंखों के आंसू बाकी हैं...
और अधूरा रह गया है एक डॉक्टर बनने का सपना।
सवाल सिर्फ आकांक्षा का नहीं है।
सवाल उन लाखों छात्रों का है जो हर साल NEET जैसी परीक्षाओं के लिए अपना बचपन, अपनी खुशियां और अपने परिवार की जमा-पूंजी दांव पर लगा देते हैं।
आकांक्षा चली गई...
लेकिन पीछे छोड़ गई एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब पूरे देश को देना होगा।
🕯️ विनम्र श्रद्धांजलि।
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