Tatva Chintamani
॥ श्रीहरिः ।॥
सम्पादकका निवेदन
सत्य-सुखके विधातक जड़वादके इस विकास-युगमें, जहाँ ईस्वर और ईश्वरीय चर्चाको व्यर्थ बतलाने के माननेका दुःसाहस किया जा रहा है, जहाँ परलोकका सिद्धान्त कल्पना-प्रसूत समझा जाता है, जहाँ जञान-वैग भक्तिकी बातोंको अनावश्यक और देख-जातिकी उन्रतिमें प्रतिबन्धकरूप बतलाया जाता है, जहां भौतिक उन्नतिक ही मनुष्य-जीवनका परम ध्येय समझा जाने लगा है, जहाँ केवल इन्द्रिय-सुख ही परम सुख माना जाता है और यह प्रायः समूचा साहित्य-क्षेत्र जड़-उन्नतिके विधायक ग्रन्थों, मौज-शौकके उपन्यासों और गल्पों एवं कुरुचि-उत्पादर शब्दाडम्बरपूर्ण कविताओंकी बाढ़से बहा जाता है, वहाँ भक्ति, ज्ञान, वैराग्य ओर निष्काम कर्मयोग-विषक् तात्त्विक विषयोंकी पुस्तकसे सबको सन्तोष होना बहुत ही कठिन है तथापि गत तीन वर्षोंके अनुभवसे मुझे यह पत लगा है कि नास्तिकताकी इस प्रवल आँधीके आनेपर भी ऋषि-मुनि-सेवित पुण्यभूमि भारतके सुदढ़ मूल आध्यात्मिक सघन छायायुक्त विशाल तरुवरकी जड़ें अभी नहीं हिली हैं और उनका हिलना भी बहुत ही कठिन मालूम होता है। इस समय भी भारतके आध्यात्मिक जगत्में सच्चे जिज्ञासुओं और साधुस्वभावके मुमुक्षुओंका अस्तित्व है, यद्यपि उनकी संख्या घट गयी है। इस अवस्थामें यह आशा करना अयुक्त नहीं होगा कि इस सरल भाषामें लिखी हुई त्पूर्ण पुस्तकका अच्छा आदर होगा और लोग इससे विशेष लाभ उठावेंगे।
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