Mera Ramnagar
09/04/2026
28/03/2026
मेरे शहर , रामनगर , पश्चिमी चंपारण ( बिहार ) में डॉ . अंबेडकर चौराहे से उत्तर दिशा में गोवर्धना , सोमेश्वर आदि मनोरम और भ्रमण योग्य स्थल हैं , जिनकी चर्चा पिछले कड़ी में मैं कर चुका हूं ।
आज पूरब दिशा की ओर जाने वाली सड़क हमें कहां ले जाती है और उस रास्ते किन - किन जगहों पर जा सकते है , उसकी चर्चा करूंगा ।
पूरब की तरफ बढ़ेंगे तो सबसे पहले बाई तरफ खस्ता हाल त्रिवेणी नहर और दाई तरफ सरकारी हस्पताल है । सरकारी हस्पताल से आगे बढ़ने पर दाई तरफ हीं " कुट मिल ( गत्ता फैक्ट्री ) " और उसी से सटे रामरेखा नदी के किनारे हमारा " नयका सिनेमा ( श्याम ज्योति सिनेमा )" है ।
इससे आगे का रास्ता करीब तीन - चार सौ मीटर के बाद तीन रास्तों में बंट जाता है । दाहिनी तरफ वाला , मिल -
बहुअरी , पंचरुखिया , नवगांवां और चीनी मिल की तरफ चला जाता है । बाई तरफ वाला मुजरा की तरफ ।
बीच वाली सड़क के दाहिनी तरफ " किशोरी मल का बगीचा " है , जो हमारे विद्यार्थी जीवन का " मुगल गार्डन " हुआ करता था । स्कूल से आने के बाद हम यहां घंटों समय बिताया करते थे और पहली जनवरी को ' पिकनिक ' भी मनाया करते थे । आज इसके एक हिस्से में विवाह भवन , बीच में पुरानी बगिया और पूरबी हिस्से में " स्टोन क्रशर " बन गया है ।
इस रास्ते नरकटियागंज ( थाना - शिकारपुर ) , भिखना ठोरी , भितिहरवा गांधी आश्रम और भारत - नेपाल सीमा का प्रमुख शहर रक्सौल जाया जा सकता है ।
नरकटियागंज रामनगर से करीब 15 - 16 किलोमीटर है । नरकटियागंज एक अच्छा शहर है और रेलवे जंक्शन है । यहां से रेल मार्ग से बेतिया , मोतिहारी होते हुए मुजफ्फरपुर जाया जाता है । इसी रेल - मार्ग पर स्थित सुगौली जंक्शन से एक रूट रक्सौल की तरफ चली जाती है । एक रेल रूट गौनाहा और भिखना ठोरी की तरफ जाती है । नरकटियागंज से सड़क मार्ग से भी बेतिया , मोतिहारी होते हुए मुजफ्फरपुर जा सकते हैं । एक सड़क लौरिया की तरफ जाती है , जहां से भी बेतिया , बगहा , वाल्मिकीनगर और गोरखपुर जाने के रास्ते हैं ।
इसके अतिरिक्त , रामनगर से करीब 45 किलोमीटर पर मनोरम पर्यटन स्थल भिखना ठोरी, करीब 20-22 किलोमीटर प्रसिद्ध भितिहरवा गांधी आश्रम और 60 किलोमीटर के करीब रक्सौल है ।
नेपाल की सीमा अवस्थित भिखना - ठोरी घने जंगलों , खूबसूरत पहाड़ों और कल - कल बहती पहाड़ी से इतनी मनोरम हो जाती है कि जो यहां एक बार आता है , फिर दुबारा - तिबारा आना चाहता है । यहां अब खूबसूरत ' रिसोर्ट्स ' , बच्चों के लिए " फन - पार्क " और अच्छे " होम - स्टे " बन गए हैं । यहांं खांटी देशी चिकन , पहाड़ी बकरे का मिट्टी के बर्तन और लकड़ी के चूल्हे पर बना मटन , बेहतरी दही और जंगली गाय - भैंस के दूध के शुद्ध घी का आनंद ले सकते हैं ।
भितिहरवा गांधी आश्रम , जो रामनगर से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर है , महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन का शुरुआती स्थल है । 1917 में जब गांधी जी चंपारण के किसानों को नील की खेती से मुक्ति के लिए यहां आए थे तो भितिहरवा में कुछ समय के लिए रुके थे । यहां जिस कुटिया में उन्होंने निवास किया था , वैसे हीं सुरक्षित रखा गया है और एक भव्य स्मारक बना दिया गया है ।
बिहार की राजनीति और राजनीतिक पदयात्राएं समय - समय पर यहां से शुरू होती हैं ।
नेपाल का प्रवेश द्वार , रक्सौल करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है जहां से नेपाल के प्रमुख शहर बीरगंज जाया जा सकता है । बीरगंज से पोखरा , काठमांडू और नेपाल के अन्य जगहों के लिए बस और प्राइवेट टैक्सियां मिलती हैं ।
बीरगंज में सीमा पर बसे भारतीय , मसाले और विदेशी वस्तुएं खरीदने आते हैं । इस सीमा से तस्करी भी होती है जिसकी वजह से दोनों तरफ के कस्टम वाले और पुलिस तस्करी रोकने के लिए मुस्तैद रहते हैं ।
अगली कड़ी में दक्षिण की चर्चा करूंगा ,
अरे दक्षिण भारत की नहीं , रामनगर से दक्षिण की 🙂
13/03/2026
मेरे गृह नगर रामनगर , पश्चिमी चंपारण ( बिहार ) के बीच से रामरेखा नदी और त्रिवेणी नहर गुजरती है । इस नदी और नहर की चर्चा कभी बाद में , आज रामरेखा नदी के ऊपर से जहां त्रिवेणी नहर क्रास करती है , सिंचाई विभाग द्वारा ' सायफन ' बनाया गया है । ऐसा हीं एक ' सायफन ' मसान नदी के ऊपर भी बना है । नीचे से नदी और ऊपर से नहर ।
इसके लिए इस तरह की रचना बनाई गई है कि नदी और नहर दोनों निर्बाध बहते रहें ।
रामनगर में " नयका सिनेमा " के पास बना ' सायफन ' बचपन से लेकर युवावस्था तक हमारे लिए बहुत महत्व का था । शाम के समय हमारी बैठकी और मस्तियां यहीं हुआ करती थीं । साफ - सुथरी शांत और ठंडी हवाओं की प्रचुरता वाली यह हमारी पसंदीदा जगह थी । रात में कभी - कभी देर तक यहाँ बैठकी होती थी । इस जगह पहले एक लोहे की पतली पुल हुआ करती थी , जिस पर लकड़ी की पटरियां लगी रहती थी । बाद में एक - एक कर पटरियां गायब होती गईं और बमुश्किल दो - ढाई फुट चौड़ी पुल के दोनों ओर तार की कमजोर सी रेलिंग और मध्य में छह इंच चौड़ा पुल के शुरू से अंत तक लोहे का गार्डर । उस गार्डर पर बैलेंस बना कर चलना , हमारा खेल हुआ करता था । नहर के " नयका सिनेमा " साइड में नहर के पानी को रामरेखा नदी में गिरने के लिए करीब तीन - तीन फीट का गैप बना था । उसको भी फलंगाते हुए एक तरफ से दूसरी तरफ और फिर दूसरी तरफ से वापस होना भी हमारा खेल था । मजे की बात यह थी कि कभी कोई इस मस्ती के क्रम में गिरा नहीं । नहर के दूसरी तरफ एक ऊंचा चबूतरा जैसा था , जिस पर हम थोड़ी ज्यादा हवा खाने के चक्कर में बैठा करते थे । अक्सर हमारी चौकड़ी नहर में नहाया भी करती थी । स्कूल से बंक कर उसी ऊंचे चबूतरे से नहर में छलांग लगा कर खूब नहाते भी थे लड़के । मुझे चुकी तैरना नहीं आता था , मैने कभी इस तरह नहाने का प्रयास नहीं किया ।
अब ना तो वह पतली लोहे की पुल है , ना हीं वह ऊँचा चबूतरा , ना ही स्वच्छता और ना हीं वहां बैठने वाले लोग ।
रामरेखा नदी का वह हिस्सा , जहां नहर का पानी गिरा करता है , गंदगी और बेतरतीब उगे घास - पात से भरा हुआ है । " नयका सिनेमा " की तरफ की रामरेखा तो लगता है गायब हीं हो गई है । ' सायफन ' का ना तो कोई रखरखाव है नहीं गंदगी फैलाने वालों पर कोई रोक - टोक । मेरे समय के लोग आज इन तस्वीरों को देखें तो उन्हें निश्चय हीं बेहद अफसोस होगा कि उनके बचपन का खूबसूरत टाइम पास स्थल आज इतनी बदहाल स्थिति में है कि वहां दो मिनट खड़ा होना भी मुश्किल है ।
23/01/2026
पं. अखिलेश्वर नाथ त्रिपाठी
बगहा , पश्चिमी चंपारण , बिहार
सेवानिवृत शिक्षक ,
अब अधिवक्ता , बगहा , सिविल कोर्ट
बेहद शालीन , शांत व सबके प्रिय
हिंदी , संस्कृत , अंग्रेजी , उर्दू व कई क्षेत्रीय भाषाओं के
उद्भट विद्वान
हस्तलिपि मोतियों समान
मेरी नजर में राष्ट्रीय स्तर के कवि व साहित्यकार लेकिन
आत्मप्रचार से हमेशा दूर रहे ।
खुद को चुपचाप अध्ययन , लेखन और बाकी समय में कोर्ट में व्यस्त रखने की वजह से आपका सही मूल्यांकन साहित्य के क्षेत्र में न हो सका ।
मेरा गिलहरी प्रयास है कि आपके व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में लोगों को बताऊं।
आज प्रस्तुत है उनकी हस्तलिपि में उनकी दो रचनाएं ।,
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