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21/04/2025
*सच्चे साधक के लिए एक अंतरंग वार्ता*
♥️ शुभ सोमवार ♥️
11 अगस्त, 1999
यूरोपियन आश्रम, बाद अन्तोगास्त, जर्मनी
216. अणु व्रत
मन को हमेशा 'और' चाहिए; मन 'अधिक' पर जीता है।
'और अधिक' से दुःख शुरू होता है। दुःख तुम्हें जड़ और स्थूल बनाता है।
आत्मा सूक्ष्म है। स्थूल से सूक्ष्म तक जाने के लिए सूक्ष्मतम से गुज़रना पड़ता है-अणु। द्वेष, घृणा, ईर्ष्या, आकर्षण या उलझनों से निकलने के लिए तुम्हें अणु तक जाना होगा। अणु तक जाने का अर्थ है इन सभी के एक छोटे से अंश को स्वीकार करना।
जो चीज़ तुम्हें पसन्द नहीं, उसे स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है पर उसका एक अत्यन्त छोटा सा अंश - एक अणु, तो तुम निश्चित ही स्वीकार कर सकते हो। जिस क्षण तुम उस एक अणु को स्वीकार करते हो, तुम परिवर्तन देखोगे। इसे ध्यानावस्था में करना चाहिए।
मान लो तुम किसी से प्रेम करते हो। तुम्हें वे 'और अधिक' चाहिए, पर फिर भी कोई संतुष्टि नहीं मिलती। अणु व्रत अणु की प्रतिज्ञा से तुम उस व्यक्ति का केवल एक अणु ले लो - वही पर्याप्त है तुम्हें तृप्ति देने के लिए।
यद्यपि नदी विशाल है, पर एक घूँट ही प्यास बुझा देता है; यद्यपि पृथ्वी पर इतना आहार है, पर थोड़ा सा भोजन तुम्हारी भूख मिटाता है। तुम्हें 'थोड़ा' ही चाहिए। जीवन में प्रत्येक चीज़ का 'थोड़ा' सा अंश तुम स्वीकार कर कर लो। उतना पर्याप्त है तुम में तृप्ति लाने के लिए।
स्टेफानोः मुसीबत का क्या?
श्री श्रीः दुनिया में इतनी मुसीबतें है, तुम उसका एक छोटा सा अंश ले सकते हो।
आज रात जब विश्राम करने जाओ, दिव्यता का एक छोटा सा अंश साथ लेकर सन्तुष्टि की भावना से सो जाओ।
तृप्ति सूक्ष्मता से आती है, 'अधिक और अधिक' से नहीं।
प्रश्नः और दान का क्या?
श्री श्रीः छोटा सा अंश तुम लो, बाकी दे दो।
*श्री श्री रविशंकर जी ज्ञान सूत्र*
♥️🙏🏻♥️ जय गुरुदेव ♥️🙏🏻♥️
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