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23/05/2025
23 मई, 1984.. ये सिर्फ़ एक तारीख नहीं है, ये एक पहाड़ से भी अटल और मजबूत जज़्बे की कहानी है। यही वो ऐतिहासिक दिन है जब भारत की बेटी, बछेंद्री पाल माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं।
लेकिन ये जीत रातों-रात नहीं आई थी। उत्तराखंड के एक छोटे से गांव नाकुरी में जन्मीं बछेंद्री, जब 12 साल की थीं, तभी उन्होंने पहली बार 13,000 फीट की चढ़ाई कर डाली थी। बिना किसी प्रोफेशनल ट्रेनिंग के।
घर में सीमित साधन थे, लेकिन सपनों की ऊंचाई असीम थी।
जब उन्होंने पर्वतारोहण को करियर बनाने की बात की, तो लोगों ने कहा—
“ये काम लड़कियों का नहीं है।”
पर बछेंद्री ने वही किया जो इतिहास रचने वाले करते हैं; लोगों की सुनना बंद किया और अपने लक्ष्य की ओर काम करती रहीं।
1984 में उन्हें 'First Indian Women Everest Expedition' के लिए चुना गया। लेकिन किस्मत ने फिर परीक्षा ली.. एवरेस्ट के बेस कैंप पर एक जबरदस्त एवलॉन्च आया, और कई सदस्य डर के मारे लौट गए।
बछेंद्री घायल थीं, लेकिन पीछे नहीं हटीं। उन्होंने सोचा, “अगर मैं लौट जाऊंगी, तो सारी औरतों के सपने भी टूट जाएंगे।”
और फिर... 23 मई 1984 को सुबह 1 बजकर 7 मिनट पर, समुद्र तल से 29,032 फीट ऊपर, बर्फ की उस चोटी पर तिरंगा लहराया गया।
भारत की एक बेटी ने साबित किया कि हौसलों की ऊंचाई, एवरेस्ट से भी बड़ी होती है।
उनकी इस उपलब्धि ने एक लहर पैदा की। पहाड़ अब लड़कियों के सपनों में आने लगे, पर्वतारोहण अब सिर्फ पुरुषों का खेल नहीं रहा, और ‘बछेंद्री पाल’ एक नाम नहीं, एक प्रेरणा बन गईं।
आज जब हम बेटियों के लिए नए आसमान खोजते हैं, तो ये याद रखना ज़रूरी है कि किसी ने तो पहली चढ़ाई की थी। किसी ने तो रास्ता बनाया था। और वो थीं—बछेंद्री पाल।
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