Jp Sharma

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10/01/2023

ॐ श्री विश्वकर्मा विश्व पांचाल ब्राह्मण धर्म वर्णन ॐ
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🚩स्कंद पुराने नागर खंडे 13 अध्याये ईश्वर षष्ट मुख संवाद ईश्वर उवाच।। 🚩

ॐ मनुर्मयश्च त्वष्टा: च शिल्पी च विश्वज्ञ एव च।
पंचैते देव ऋषयो विश्वकर्ममुखोद्भवा:।।
ॐ सृष्टि प्रवर्तकाह्येते रथकारास्तु पंच च।
शतं च विंशति: पंच वंशजा विश्वकर्मणाम्।।

🚩अर्थात मनु मय त्वष्टा शिल्पी और विश्वज्ञ (दैवज्ञ)ये पांचों देव ऋषि श्री विश्वकर्मा के मुख्य से उत्पन्न हुए हैं इनका मुख्य कर्तव्य सृष्टि उत्पन्न करने का है तथा सृष्टि के निमित्त रथ मूर्ति इत्यादि भी बनाने का है इन पांचों ऋषियों से आगे 2500 ऋषि पांचाल ब्राह्मण उत्पन्न हुए तथा इसी प्रकार इनसे और सृष्टि श्री विश्वकर्मा मुख उत्पन्न पांचाल ब्राह्मणों की उत्पन्न हुई है इन्हें विश्व ब्राह्मण कहते हैं।

ॐ तद्वंशसंभवा: सर्वे पंच पंचास्यसंभवा: ।
जायंतेअनुयुगं लोके सृष्टिसंत्राणतत्परा: ।।
ॐ कृते तु मनसासृष्टस्त्रेतायां दृष्टि साधनम्।।

🚩 श्री विश्वकर्मा मुखोउत्पन्न पांचाल ब्राह्मणों की जितनी वंशावली है वह सब इन्हीं पांचों देवता और देव ऋषि सानग, सनातन ,अहसान, और सुपर्ण से उत्पन्न हुई है यह पांचाल ब्राह्मण हमेशा सृष्टि कर्म में तत्पर रहते हैं सतयुग में मनसे त्रेता में दृष्टि साधन से (देखने) से द्वापर में मंत्र से कलयुग में केवल हाथ से (कारीगरी )से सृष्टि कर्म उत्पन्न होती है इस प्रकार पांचाल ब्राह्मण हमेशा शिल्प कर्म करते चले आ रहे हैं और युगानुसार सृष्टि कर्म में तत्पर हैं।

ॐ वैदिकेन मार्गेण तद्वंश्यानां विशेषत: ।।
गर्भाधानं निषेकं तु तुर्ये पुंसवनक्रिया।।
ॐ मासेअष्में हि सीमंतो जातेवै जातकर्म च।
अहन्येकादशे नाम षष्टे मास्यन्नभोजनम्।।

🚩 वेदादि शास्त्रों में पांचाल ब्राह्मणों का धर्म-कर्म इत्यादि का खुलासा वर्णन इस तरह किया हुआ है,

ॐ षोडश संसकार 👉
(१) वीर से गर्भ स्थित होता है ,
(२) पश्चात पुंसवन होतहोता हैं ,
(३) आठवें महीने में गांठि बंधन(सीमांत) करना चाहिए,
(४) उत्पन्न होने पर नंदी मुख श्राद्ध सीमन्तोन्नयन करना चाहिए ,
(५) ग्यारहवें दिन पर नामकरण करना चाहिए ,
(६) छठे महीने अन्नप्राशन करना चाहिए।

ॐ वर्षे तृतीये चौल स्यादष्टमे चोपनायनम्।
वेदव्रतचतुष्कंतु गोदानं षोडशे तथा।।
ॐ वत्सरे स्नातकं कर्म वैवाहं पैत्रमेधिकम्।
इति षोडश कर्माणि वंश्यानां विश्वकर्मण: ।।

अर्थात 👉 (७) तीसरे वर्ष क्षौर कर्म (मुंडन) कराना चाहिए,
(८) आठवें वर्ष उपनयन यज्ञोपवीत (जनेऊ कराना )चाहिए ,
(९) वेदव्रत (वेदा अध्ययन वेद आदि पढ़ना)
(१०) वेदव्रत (वेदाअध्ययन वेद विद्या का पढ़ाना)
(११) वेदव्रत (वेद पाठन पूजा पाठ इत्यादि वैदोक्त रीति से करना)
(१२) वेदव्रत (वेद कर्म वेद आदि में लिखने के मुताबिक धर्म-कर्म अर्थात यज्ञ आदि करना)
(१३) सोलह वर्ष के उपरांत गोदान कर्म
(१४) पश्चात स्नातक कर्म करें
(१५) उपरांत इन कर्मों के बाद विवाह होना चाहिए
(१६) और विवाह के बाद पितर कर्म करना चाहिए

अर्थात 👉 यही षोडश कर्म श्री विश्वकर्मा मुखोउत्पन्न पांचाल ब्राह्मणों को करना आवश्यक है । बिना इन षोडश कर्मो के किये जो कोई केवल पशु की तरह अपना जन्म व्यतीत करता है वह स्वधर्म त्याग के दोष से अंत समय तक दरिद्र रहता है पश्चात 60000 वर्ष तक घोर नरक वास करता है ।
जब तक यज्ञोपवीत ना हो उनके हाथ का जल पीना निषेध है क्योंकि बिना मौजी धारण के काया शुद्ध नहीं होती है

ॐ नमो विश्वकर्मणे 🙏🙏🙏🙏🙏

🚩 अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारतवर्ष( लोह, काष्ठ, ताम्र, शिल्प और स्वर्ण) 🚩
(पंडित रामदरश शास्त्री रीवा मध्यप्रदेश)

05/01/2023

🚩🚩 *विश्वकर्मा प्रकट दिवस के पूर्व महत्वपूर्ण संदेश*🚩🚩 (नोट - विश्वकर्मा समाज की संस्थाएं समाज में जागरूकता हेतु इस संदेश को अपने कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में छपवा सकते हैं या अन्य मार्गों से प्रचार कर सकते हैं।)

🚩 *विश्वकर्मा शब्द का अर्थ एवं वेद शास्त्रों में प्रमाण*🚩
*यो विश्वं सर्वकर्म क्रियामाणस्य स विश्वकर्मा:* अर्थात जो एकमात्र ब्रह्म परमात्मा समस्त संसार की उत्पत्ति से लेकर प्रलय के साथ समस्त कर्म करने की योग्यता रखता है उस परमपिता परमेश्वर को ' *विश्वकर्मा* ' कहा जाता है।
सर्वप्रथम , विश्वकर्मा की उपाधि परब्रह्म परमपुरुष को प्राप्त हुई जिसकी उद्घोषणा समस्त वेद-शास्त्र करते हैं। इसी उपाधि से उनका वैदिक प्रचलित नाम *विश्वकर्मा* भी हुआ। इन्हीं ब्रह्म अर्थात परब्रह्म को सृष्टि की सबसे शाश्वत ध्वनि अर्थात नाद को *ॐ* भी कहा गया। उन्ही को शास्त्रों में *विष्णु* (सर्वव्यापक) , *शिव* (कल्याण), *पशुपति* , *विराट*, *प्रजापति*(प्रजा पालक) , *हिरण्यगर्भ* आदि ये सब नाम एवम् उपाधियाँ उसी *विश्वकर्मा* ब्रह्म अर्थात परब्रह्म परमात्मा की है। परब्रह्म विश्वकर्मा को ही सर्वदृष्टा, सर्वपालक, सर्वश्रेष्ठ औऱ सर्वस्तुत्य पिता कहा है। वे परमात्मा ही विश्वपति, विश्वरूप, नियामक, पालक, सभी यज्ञों के भोक्ता , स्वामी तथा धाता-विधाता कहे गए हैं। यथा प्रमाण ;
*विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक् ।*
*तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्पर एकमाहुः ॥* - (ऋग्वेद मंडल - १०, सूक्त - ८२, मंत्र - २)
अर्थात - वो महान विश्वकर्मा जिसका समस्त जग को निर्माण करने का कार्य है और जो अनेक प्रकार के विज्ञान से युक्त ,समस्त पदार्थों में व्याप्त ,सबका धारण पोषण करनेवाला एवं रचने वाला, सबको एक समान देखने वाला , सबसे उत्तम जो है और जो परमात्मा अद्वितीय है वैसा कोई और नहीं है। विद्वान लोग कहते हैं वो सप्तऋषियों से भी ऊंचे स्थान पर स्थापित है और उनकी अभिलाषाओ को हव्यान्न द्वारा पूर्ण करते हैं।
विश्वकर्मा परमात्मा ही विष्णु , कृष्ण ,वैकुंठ, विश्वात्मा , पुरुषोत्तम भगवान हैं। यथा प्रमाण ;
*विश्वकर्मनमस्तेस्तु विश्वात्मा विश्वसंभव।*
*विष्णो विष्णो हरे कृष्ण वैकुंठ पुरुषोत्तम ॥*
-(महाभारत शांतिपर्व युधिष्ठिर उवाच अध्याय-४३ श्लोक - ५)
अर्थात - तुम ही विष्णु, विष्णु हो, तुम ही हरे कृष्ण हो, वैकुंठ हो , तुम ही पुरुषोत्तम हो, तुम ही विश्वात्मा हो और जगत को उत्पन्न करने वाले हों । इससे हे विश्वकर्मा आपको नमस्कार है।

🚩 *विश्वकर्मा प्रकट दिवस क्यों मनाया जाता है ?*🚩
वेद-शास्त्रों में देवताओं के आचार्य एवं शिल्पी के रूप में देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा को माना जाता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष के तेरहवें दिन अर्थात माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन देवाचार्य भगवान विश्वकर्मा प्रकट हुये थे। जिस कारण इस दिन विश्वकर्मा प्रकट दिवस के रूप में यज्ञ, हवन ,पूजन के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है। कुछ विद्वानों की मान्यता ये भी हैं कि इसी दिन राजा पृथू को भगवान विश्वकर्मा ने स्वप्न में आकर दर्शन दिये थे जिस कारण उनका प्रकट दिवस या उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान विश्वकर्मा जी की माता का नाम भुवना हैं जिस कारण इन्हें *भौवन विश्वकर्मा* भी कहा जाता हैं।

🚩 *देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा के कुल का शास्त्रीय प्रमाण एवं उनका दिव्य स्वरूप* 🚩
*बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी ।*
*योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत ।*
*प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य तु ॥*
*विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः।*
*कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वार्धकिः॥*
- (विष्णुपुराण/प्रथमांश:/अध्याय -१५, श्लोक - ११८-११९)
अर्थात - देवगुरु बृहस्पति की बहन वरस्त्री(भुवना), जो ब्रह्मचारिणी थी और सिद्ध योगिनी थी तथा अनासक्त भाव से समस्त भूमंडल में विचरती थी, वो आठवें वसु प्रभास की धर्मपत्नी हुई। उन्हीं के पुत्र रूप में सहस्त्रों शिल्पों के कर्ता , देवताओं के शिल्पी एवं आचार्य महाभाग अर्थात महाभाग्यशाली प्रजापति देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा प्रकट हुए।
*देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा जी का दिव्य स्वरूप लक्ष्मीनारायण संहिता में वर्णित हैं यथा प्रमाण ;
*विश्वकर्मा चतुर्बाहुरक्षमालां च सूत्रकम् ।*
*गजं कमण्डलुं धत्ते त्रिनेत्रो हंसवाहनः ।।*
- (लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्ड-२/अध्याय-१४२,श्लोक- १०)
अर्थात - चार भुजाओं वाले देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा जी ने रक्षमाला और एक धागा (जनेऊ या सूत का धागा) धारण किया है। उनके पास एक हाथी और एक जलपात्र है, उनकी तीन आंखें हैं और उनके पास एक हंस वाहन स्वरूप भी है।

🚩 *भगवान विश्वकर्मा को शास्त्रों में देवाचार्य , श्रेष्ठ देवता और श्रेष्ठ ब्राह्मण होने का प्रमाण* 🚩
*देवाचार्यस्य महतो विश्वकर्मस्य धीमतः।*
*विश्वकर्मात्मजश्चैव विश्वकर्ममयः स्मृतः॥*
- (वायुपुराण/उत्तरार्धम्/अध्याय - २२, श्लोक - २०)
अर्थात - महान और बुद्धिमान विश्वकर्मा देवताओं के आचार्य (गुरु) हुए हैं और उनके पुत्र भी उन्हीं के समान गुणों वाले हुए।
*तस्मिन्नेव ततः काले शिल्पाचार्यो महामतिः।*
*विश्वकर्मा सुरश्रेष्ठः कृष्णस्य प्रमुखे स्थितः॥*
(हरिवंशपुराण/पर्व २ (विष्णुपर्व)/अध्यायः ०५८,श्लोक -२२)
अर्थात - उसी क्षण देवताओं में श्रेष्ठ महान बुद्धिजीवी देवताओं के शिल्प के आचार्य विश्वकर्मा जी भगवान कृष्ण के सामने प्रकट हुए।
*शातनं तेजसो मेऽद्य क्रियतामिति भास्करः।*
*तञ्चाह विश्वकर्माणं संज्ञायाः पितरं द्विज॥*
- (मार्कण्डेयपुराण/अध्याय - ७७/श्लोक - ४१)
अर्थात - संज्ञा के पिता विश्वकर्मा जी से सूर्य ने कहा - हे ब्राह्मण , आप मेरा तेज घटा दीजिये।

🚩 *हमारी जाति , हमारा वेद , हमारे कुल, इष्टदेवता एवं आराध्य देवता कौन हैं ?*🚩
१) हमारी जाति - 'विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण' और
हमारी उपजाति - पाँच पंचशिल्पी वर्ग में कोई एक।
२) कुल, इष्टदेवता एवं आराध्य देवता - भगवान विश्वकर्मा जी। (जिन लोगों के कुल परंपरा से कुलदेवता और कुलदेवी ज्ञात हैं वो लोग उन्हें भी मानें, जिनके नहीं ज्ञात हैं वो भगवान विश्वकर्मा जी को मान सकते हैं।)
३) हमारा वेद - अथर्ववेद (कार्मिक दृष्टि से संपूर्ण समाज का) और कुल परंपरागत दृष्टि से अपने अपने अलग वेद , उपवेद , शाखा , सूत्र , प्रवर, शिखा आदि हो सकते हैं। अथर्ववेद का उपवेद शिल्पवेद हैं जिस कारण कार्मिक दृष्टिकोण से समस्त भारतवर्ष में हम *अथर्ववेदीय विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण* सिद्द होते हैं।
४) हमारा मुख्य उपनाम (समस्त भारतवर्ष) - आचार्य (आचारी ,चारी) , शर्मा , धीमान , पांचाल , जांगीड़, मैथिल , ओझा , झा , विश्वकर्मा , विश्वब्राह्मण ,मालवीय , वेदपाठक , महामुनि , धर्माधिकारी , दीक्षित , पंडित , महाराणा , राणा आदि २०० से ज्यादा हैं।

🚩 *शिल्पकर्म और वास्तुकला एक ब्राह्मण कर्म कैसे है उसका शास्त्रीय प्रमाण*🚩
*शिल्पकर्म* की उत्पत्ति वेदांग कल्प के शुल्ब-सूत्र से हुई है और वास्तुकला की उत्पत्ति वेदांग ज्योतिष की संहिता स्कंध से हुई है। वेदांग ग्रंथों का अध्ययन करना ब्राह्मणो का प्रमुख कर्तव्य आदिकाल से रहा है। शुल्ब-सूत्र से यज्ञवेदी (यज्ञकुंड), यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञपात्र, मूर्ति आदि का निर्माण होता हैं। ब्राह्मणों के दो प्रमुख कर्म हैं एक है इष्टकर्म (षटकर्म आदि) और दूसरा है पूर्तकर्म (शिल्पादि कर्म आदि)।
*आचारहीनान्न पुनंति वेदा यद्यप्यधीताः सह षद्भिरङ्गैः।*
*शिल्पं हि वेदाध्ययनं द्विजानां वृत्तं स्मृतं ब्राह्मणलक्षणं तु।* -(भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व-१, अध्याय - ४१,श्लोक - ७)
अर्थात - वेदों का अध्ययन छ: अंगों द्वारा होते हुए भी सदाचार से रहित व्यक्ति को शुद्ध नहीं करता। शिल्पकर्म के लिये वेदों का अध्ययन द्विज रूपी ब्राह्मणों के कर्म एवं लक्षण हैं।
*इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः।*
*चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शुल्बकर्मणि॥*
- (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग - १४,श्लोक -२८)
अर्थात - यज्ञ हेतु अग्निकुंड में ईंटें नियम और मानकों के अनुसार बनाई गई थीं। शुल्ब-सूत्र से उत्पन्न शिल्पकर्म मे निपुण ब्राह्मणों ने इन ईंटो से अग्निकुंड बनाकर अग्नि स्थापित की गईं।
विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण जो शिल्प करते हैं वो सामान्य शिल्प नहीं हैं अपितु , उसे ब्रह्मशिल्प कर्म कहा जाता हैं जिस कारण ये 'ब्रह्मशिल्पी ब्राह्मण' भी कहलाते हैं। ब्रह्मशिल्प कर्मो का निर्वहन आज भी विश्वकर्मा शिल्पी ब्राह्मण पाँच प्रकार के शिल्पकर्मो के माध्यम से करते आ रहें है। पंचशिल्पकर्म एवं पंचशिल्पी ब्राह्मण निम्न है , लौह शिल्प - लौहकार ब्राह्मण (लोहार), काष्ठ शिल्प - काष्ठकार ब्राह्मण (बढ़ई) , ताम्र शिल्प - ताम्रकार ब्राह्मण, शिला शिल्प - शिल्पी ब्राह्मण (मूर्तिकार) , स्वर्ण शिल्प - स्वर्णकार ब्राह्मण (सोनार) हैं । इसमें मेढ़ क्षत्रिय (सोनार)एवं हैहेय वंशी क्षत्रिय(ताम्रकार) एवं अन्य उपजातियाँ तथा अन्य वनवासी उपजातियाँ सम्मिलित नहीं है जिन्होंने अपनी जीविका के लिए मात्र शिल्पकर्म को अपनाया। इनका विश्वकर्मा कुल के ब्राह्मण वंश परंपरा से कोई संबंध नहीं है। प्रजापति कुम्हारों का हमारी जाति कुलपरंपरा से कोई संबंध नहीं हैं।
🚩 *हमारे ब्राह्मण होने का प्रसिद्ध ब्राह्मण विद्वानों की पुस्तकों में प्रमाण* 🚩
१)' ब्राह्मणोत्पत्तीमार्तण्ड ' ग्रंथ उसमें पृष्ठ ५६२ - ५६८ तक विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मणों का उल्लेख ' अथ पांचालब्राह्मणोंत्पत्ती प्रकरण ' बताकर दिया गया है।
२) ' ब्राह्मणोंत्पत्ति दर्पण ' नामक पुस्तक में पृष्ठ क्रमांक ३५८ से ३६१ तक विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मणों की उत्पत्ति बताई गई है और उन्हें ब्राह्मण स्वीकार किया गया हैं।
३) काशी से प्रकाशित 'आदित्य पंचांग' के विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मणों को अथर्ववेदीय ब्राह्मण बताकर जांगिड़ ब्राह्मण एवं पांचाल ब्राह्मण से संबोधित किया गया है। इसके पुराने संस्करण के पृष्ठ ४६ और नवीन संस्करण (२०२२-२३)के पृष्ठ ४४ पर प्रमाण देखा जा सकता हैं।
🚩ॐ नमो विश्वकर्मणे🚩
- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा® (संपूर्ण भारत)
(नोट - विश्वकर्मा समाज की संस्थाएं समाज में जागरूकता हेतु इस संदेश को अपने कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में छपवा सकते हैं या अन्य मार्गों से प्रचार कर सकते हैं।)

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