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25/05/2026

“आख़िरी स्टेशन” — एक बेवफा मोहब्बत की कहानी

सर्दियों की एक सुबह थी।
मुंबई से प्रयागराज जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। भीड़ इतनी थी कि लोगों को सांस लेने तक की जगह नहीं मिल रही थी। उसी भीड़ में एक लड़का था — आरव। साधारण सा चेहरा, आंखों में सपने और दिल में ढेर सारी उम्मीदें।

आरव अपनी सीट ढूंढ ही रहा था कि तभी उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी। सफेद सूट, खुले बाल और हाथ में एक छोटी सी डायरी। लड़की परेशान थी क्योंकि उसकी सीट किसी और ने घेर रखी थी।

आरव ने मुस्कुराते हुए कहा —
“आप चाहो तो मेरी सीट पर बैठ सकती हो।”

लड़की ने हल्की मुस्कान दी —
“थैंक यू… वैसे मेरा नाम सिया है।”

बस… वहीं से कहानी शुरू हुई।

पूरा सफर दोनों बातें करते रहे।
कभी चाय साझा हुई, कभी खिड़की से बाहर भागते खेतों को देखकर सपने। नंबर एक्सचेंज हुए और फिर रोज़ बातें होने लगीं।

धीरे-धीरे वो दोस्ती प्यार में बदल गई।

सिया अक्सर कहती —
“आरव… अगर तुम मेरी जिंदगी में ना आते ना, तो शायद मैं कभी खुश रहना ही भूल जाती।”

और आरव?
वो तो सच में उसे अपनी दुनिया मान बैठा था।

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प्यार या सिर्फ जरूरत?

दो साल गुजर गए।

आरव नौकरी करता था और अपनी आधी सैलरी सिया पर खर्च कर देता।
उसके जन्मदिन से लेकर उसके छोटे-छोटे सपनों तक… हर चीज़ पूरी करता।

लेकिन धीरे-धीरे सिया बदलने लगी।

अब कॉल कम होने लगी।
मैसेज का जवाब घंटों बाद आता।
मिलने के बहाने खत्म हो गए।

एक दिन आरव ने पूछा —
“सिया… सब ठीक तो है ना?”

सिया ने ठंडी आवाज़ में कहा —
“आरव, मुझे लगता है हम दोनों का साथ यहीं तक था।”

आरव का दिल जैसे रुक गया।

“मतलब?”

“मतलब… मैं किसी और से शादी करने वाली हूं।”

ये सुनकर आरव की आंखें भर आईं।

“पर क्यों? मैंने क्या कमी छोड़ी?”

सिया हंस पड़ी —
“तुम अच्छे हो आरव… लेकिन जिंदगी सिर्फ प्यार से नहीं चलती।
जिससे मेरी शादी हो रही है, वो बहुत अमीर है। मुझे वैसी लाइफ चाहिए।”

आरव टूट चुका था।

“तो इतने साल…?”

“बस… अच्छा लगता था तुम्हारे साथ। लेकिन अब मुझे आगे बढ़ना है।
प्लीज मुझे छोड़ दो।”

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आखिरी मुलाकात

कुछ दिनों बाद सिया ने खुद आरव को मिलने बुलाया।

जगह वही थी — रेलवे स्टेशन।
वही प्लेटफॉर्म जहां पहली बार दोनों मिले थे।

सिया लाल रंग के सूट में थी। हाथों में शादी की चूड़ियां चमक रही थीं।

उसने कहा —
“आज के बाद मुझे कॉल मत करना।”

आरव बस उसे देखता रहा।

फिर मुस्कुराया।

इतनी शांति देखकर सिया हैरान थी।

“तुम ठीक हो?”

आरव बोला —
“हां… अब सब समझ आ गया।”

इतना कहकर उसने अपनी जेब से एक पुरानी फोटो निकाली।
दोनों की ट्रेन वाली पहली तस्वीर।

उसने फोटो सिया को दी और कहा —
“इसे संभाल कर रखना… क्योंकि अगली बार जब ट्रेन में किसी अजनबी से मिलो, तो याद रखना हर कोई आरव नहीं होता।”

सिया कुछ समझ पाती उससे पहले ट्रेन आ गई।

भीड़ बढ़ने लगी।

आरव धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

सिया ने आखिरी बार पूछा —
“अब कहां जाओगे?”

आरव मुस्कुराया —
“जहां से लौटकर लोग कभी बेवफा नहीं बनते…”

और फिर…

ट्रेन चल पड़ी।

भीड़ छंटी।

लेकिन आरव कहीं दिखाई नहीं दिया।

सिर्फ प्लेटफॉर्म पर उसका फोन पड़ा था…
जिसमें आखिरी रिकॉर्डिंग चल रही थी —

> “अगर कभी सच में प्यार करना…
तो किसी ऐसे इंसान से करना
जो तुम्हें इस्तेमाल ना करे…”

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सस्पेंस वाला अंत

तीन महीने बाद…

सिया की शादी टूट गई।

जिस अमीर लड़के से वो शादी करने वाली थी, उसने किसी और से शादी कर ली।

टूटी हुई सिया एक दिन वही पुरानी ट्रेन पकड़कर वापस लौट रही थी।

अचानक उसकी नजर सामने बैठे एक आदमी पर पड़ी…

काली हूडी, झुका हुआ चेहरा…
और हाथ में वही पुरानी डायरी… जो कभी सिया की हुआ करती थी।

सिया का दिल जोर से धड़कने लगा।

“आरव…?”

आदमी ने धीरे से चेहरा उठाया।

लेकिन…

वो आरव नहीं था।

उस आदमी ने सिर्फ इतना कहा —

> “कुछ लोग ट्रेन में मिलते हैं…
और फिर सिर्फ याद बनकर रह जाते हैं।”

सिया डर गई।

उसने तुरंत डायरी खोली।

आखिरी पन्ने पर लिखा था —

> “जिस दिन तुम्हें मेरी कीमत समझ आएगी…
उस दिन मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगा।”

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