Ravi Shankar Kumar
लोगों से सम्मान हम चाहते क्यों हैं? इसीलिए चाहते हैं
कि हम स्वयं में अपने भीतर एक हीनता की ग्रंथि
अनुभव करते हैं।
यह हमारा मनोविज्ञान है जिसको ठीक-ठीक समझ
लेना चाहिए। जो व्यक्ति अपने भीतर हीनता की
ग्रंथि अनुभव करता है, उस हीनता के बोध के
कारण ही वह दूसरों से सम्मान चाहता है, ताकि
किसी तरह भीतर का गड्ढा भर जाए। मगर भरता
नहीं यह गड्ढा, क्योंकि बाहर का सम्मान भीतर के
गढे को भरेगा कैसे? कोई उपाय नहीं इस तरह
भरने का। बाहर की संपत्ति भीतर की दरिद्रता को
नहीं मिटा सकती है। न बाहर का यश, न बाहर की
प्रतिष्ठा भीतर किसी तरह के अंतर ला सकती है।
भीतर और बाहर के जगत विपरीत आयामों में फैले
हुए हैं।
इसलिए जो लोग बाहर धन की दौड़ में लगे हैं,
उनका कारण भी एक है-- भीतर निर्धनता अनुभव
करते हैं। अब कैसे इस निर्धनता को झुठलाएं?
बाहर धन का ढेर इकट्ठा कर दें, दुनिया के सामने
प्रमाणित कर दें कि मैं गरीब नहीं हूं।
यह हो सकता है, दुनिया के सामने प्रमाणित हो
जाए कि तुम गरीब नहीं हो। मगर क्या तुम स्वयं
अपने भीतर अमीर हो जाओगे? धन तो बाहर है,
बाहर ही रहेगा। भीतर तुम जितने खाली थे, शायद
उससे भी ज्यादा खाली मालूम पड़ोगे।
ओशो
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