Suraj Parmar Bsp
*शासक* बनकर *शोषक* बनना हो तो पहले *शोसितों* को *भगवान्* नाम का *भूषा* खिलाकर उनका *पालन -पोषण* करो, फिर शोसितों का *दिल-दिमाग* भूषा से भर जाये तो जहां जहां अपने स्वार्थलाभ के लिए *निर्मित झूठे* *भगवान्* या *राष्ट्र* के नाम मरने मारने की जरूरत पडे़ उस आग में इन्हें *झोकों* और परदे के पीछे दो कौड़ी का मौज करो। ये है *समाज* , *राष्ट्र* और *भगवान्* के नाम पर *शैतानी शोषक शासकों* का *खेल* , चाहे *शोषक शाषक* *भगवान्* के नाम हो या *राष्ट्र* के इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, *बली* का *बकरा* तो हमेंशा *भक्त* को ही बनना है, *पजारी* को *नहीं*।अब आप को मंथन चिंतन करना है कि आप कब तक भगवान् नाम का भूषा भेजे में भरते रहो औ मूर्ख बने रहो। दूसरे पर *शासन* और *शोषण* दोनों ही किसी भी *जाग्रत चेतना* को *स्वीकार्य* नहीं है।
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