Omprakash Prajapat
20/12/2025
दीपू चंद्र दास पुलिस कस्टडी में थे। थाने के अंदर थे। भीड़ आई और उन्हें बाहर खींच ले गई। उसके बाद उन्हें जीवित जला दिया गया। पुलिस ने कुछ नहीं किया ताकि हत्यारों के मानवाधिकार सुरक्षित रहे।
ठीक उसी तरह पालघर में साधु भी पुलिस कस्टडी में थे। उन्हें तो पुलिस ने बाहर लाकर भीड़ को सौंपा था। ताकि हत्यारों के मानवाधिकार सुरक्षित रहे।
ऑस्ट्रेलिया के बोदी बीच के पचास मीटर दूर ही न केवल थाना है, बल्कि तीन पुलिस कर्मी वही थे, बीच पर ही। फायर नहीं किया। ताकि आतंकियों के मानवाधिकार का उल्लंघन न हो जाए।
ये वामपंथियों ने सौ वर्षों की मेहनत से अचीव किया है: “विक्टिम ग्रुप को हिंसा का अधिकार है। पुलिस बाद में न्यायालय में कार्यवाही करे, हिंसक भीड़ पर बल प्रयोग न करे।”
सरकार का मुख्य काम आपकी रक्षा होता है। उसी काम के लिए सारे टैक्स लिए जाते है।
सरकार ने आपसे हथियार भी छीन लिए, इस वचन के साथ कि वही आपकी रक्षा करेगी। लेकिन जब भी किसी पुलिस कर्मी ने आपको बचाने के लिए बल प्रयोग किया, वामपंथियों ने उसका करियर समाप्त कर दिया। न्यायालय भी भीड़ की रक्षा में खड़े हो गए।
ये सब हुआ क्यूंकि हमने होने दिया। हमने ही वामपंथ को “victim classes” के लिए स्पेशल क़ानून बनने दिए। हमने ही वामपंथ को ये अधिकार दिया कि वो कह सके कि विक्टिम्स पर नैतिक नियम लागू नहीं होते, क़ानून भी लागू नहीं होता।
साथ नहीं आयेंगे, इन infantiles के हाथ से इस विश्व को वापस नहीं लेंगे, तो एक एक कर हम सब दीपू बनते जाएँगे। पुलिस को पंगु होने देंगे तो लिंचिंग हमारी होगी, नेताओ व न्यायाधीशों की नहीं।
25/11/2025
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