Dr. Mohd Raffique

Dr. Mohd Raffique

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19/03/2026

मैं अपने सियासी रहनुमाओं को ताना देने के लिए नहीं बोल रहा, बल्कि एक दर्द, जिम्मेदारी और जवाबदेही के एहसास के साथ हक़ीक़त बयान कर रहा हूँ। सच्चाई यह है कि जब किसी क़ौम में बेईमानी, धोखेबाज़ी और खुदगर्ज़ी आम हो जाए, तो उसका ज़वाल तय हो जाता है।

हमारे पास कभी वसाइल, मौके और काबिलियत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन अफसोस कि हमारे सियासी रहनुमाओं ने उन्हें अक्सर अपने ज़ाती फायदे और परिवारिक हितों तक सीमित कर दिया। और जो कुछ बचा, उसे हमने खुद आपसी जलन, दिखावे, घमंड और लापरवाही में गंवा दिया।

यह सिर्फ नाकामी नहीं, बल्कि एक अमानत में खयानत है। हक़ीक़त तो यह है कि आज हमारी क़ौम अख़लाक़ी गिरावट और बेईमानी में घिर चुकी है। शायद ही कोई ऐसा गुनाह बचा हो जो हमसे न हुआ हो (ऐसे काम जो हमारे दीन और मुल्क दोनों के कानून में गलत ठहराए गए हैं)। जब गुनाह आम हो जाए और ज़मीर खामोश हो जाए, तो बर्बादी क़रीब आना लाज़मी है।

अगर एक विधायक, अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव में भी, अपनी पार्टी और अपने इलाक़े लोगों से धोखा कर सकता है, तो सोचिए कि हमारी रहनुमाई किन लोगों के हाथ में है। दोनों विधायकों के ज़रिए, राज्यसभा इलेक्शन में जो क्रॉस वोटिंग और सियासी धोखेबाज़ी की गई है, उसने न सिर्फ हमें अंदर से कमजोर किया है बल्कि पूरे हरियाणा में मुसलामानों और हमारे इलाक़े की छवि को भी नुकसान पहुँचाया है। अगर रहनुमाई ही भरोसे के काबिल न रहे, तो अवाम का भरोसा किस पर कायम रहेगा?

हमारे नामों की शुरुआत मोहम्मद और अहमद जैसे इस्लामी नामों से होती है, लेकिन हमारी कारगुजारी ऐसी हैं की नमरूद और फिरौन भी शर्मसार हो जायें। हमारे नबी ने फरमाया कि मेरे उम्मती हर गुनाह में मुब्तला हो सकते हैं लेकिन झूठे और धोखेबाज बिल्कुल नहीं हो सकते।

दुनियावी तौर पर हम पहले ही देश के सबसे पिछड़े लोगों में गिने जाते हैं, लेकिन इससे भी ज़्यादा फिक्र की बात हमारे दीन की हालत है। अगर आज के हालात ऐसे हैं, तो हमें सोचना चाहिए कि अल्लाह के सामने हमारा क्या मुकाम होगा और आख़िरत में हमारा क्या अंजाम होगा!

दोस्तों, मैं देख रहा हूँ कि हमारी क़ौम के अक्सरियत लोग रोज़ा, नमाज़, तरावीह और क़ुरआन की तिलावत से गाफिल हो चुके हैं। ये सिर्फ इबादतें नहीं हैं, बल्कि हमारे दीन की बुनियाद हैं; इन्हें छोड़ देना, अल्लाह की रहमत से दूर होना है।

हमें अपने आप से यह सवाल पूछना होगा कि हमने अपने रब को कितनी सच्चाई से पहचाना है, और क्या हम उसे वह अहमियत दे रहे हैं जिसके वह हक़दार हैं?

बदलाव बाहर से नहीं आएगा; असली इस्लाह तब शुरू होगी जब हम अपनी गलतियों को ईमानदारी से मानेंगे, तौबा करेंगे, और अपने अख़लाक़, अपने किरदार और अपनी नीयत को सुधारेंगे। सियासी इस्लाह ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है अख़लाक़ी और रूहानी बेदारी।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

Photos from Dr. Mohd Raffique's post 18/02/2026

जब कोई जिला लेवल का अफसर, वो भी एक ब्यूरोक्रेट आपकी बात की अहमियत समझते हुए अपनी गाड़ी से उतरकर ध्यान से सुनने लगे, तो समझ लीजिए कि आपने अपने सिर के बाल यूँ ही नहीं उड़ाए, यानि आपकी मेहनत और संघर्ष बेकार नहीं गए।

जी हाँ, यहां ज़िक्र जिला नूंह के अतिरिक्त उपायुक्त, श्री दलबीर सिंह जी का हो रहा है, जिन्होंने न सिर्फ़ गाड़ी से उतरकर हमारी बात सुनी, बल्कि अपने ड्राइवर को हिदायत दी कि सभी बुजुर्गों को CRID ऑफिस लेकर चलें। एडीसी साहेब के इस छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण वाक़ये से यह साफ़ हुआ कि असली तालीम इंसान को विनम्र बनाती है, घमंडी नहीं।

साथियों, मामला बहुत संजीदा था; सैकड़ों बुजुर्गों की बुढ़ापा पेंशन पिछले करीब तीन महीनों से बंद थी, और कई दूसरे हकदार बुजुर्गों की पेंशन बनी ही नहीं। बुजुर्ग बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन हर बार यही कहा गया कि परिवार पहचान पत्र - PPP में उनकी सालाना आमदनी तय हद से ज़्यादा दर्ज है।

हकीकत यह है कि ज़्यादातर बुजुर्गों की कोई पक्की या रेगुलर आमदनी नहीं है। फिर भी उनके परिवार की सालाना इनकम ₹3 लाख से ₹8 लाख तक दिखा दी गई। इसी गलत एंट्री की वजह से उनकी पेंशन रोक दी गई। जबकि यह पेंशन उनके लिए सिर्फ पैसों का मसला नहीं, बल्कि इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का सहारा है।

पेंशन बंद होने से उन्हें माली परेशानियों के साथ-साथ ज़हनी तनाव भी झेलना पड़ा। पिछले हफ्ते माननीय मुख्यमंत्री के दखल के बाद नवंबर 2025 की एक किस्त उनके खातों में आ गई, लेकिन PPP में दर्ज गलत आमदनी की दिक्कत अब भी बरकरार है।

इसी मसले को लेकर मैंने दर्जनों हकदार बुजुर्गों के साथ मिलकर एडीसी साहब से मुलाक़ात कर गुज़ारिश की कि इस मामले में फौरन, संजीदगी और मजबूती से कार्रवाई की जाए। हमने साफ कहा कि अगर PPP में दर्ज आमदनी को असली आर्थिक हालात के मुताबिक सही नहीं किया गया, तो आगे भी पेंशन रुकने का खतरा रहेगा। इसलिए सभी हकदार बुजुर्गों की आमदनी का निष्पक्ष वेरिफिकेशन हो और PPP में दर्ज गलत इनकम को तुरंत दुरुस्त किया जाए, ताकि आगे किसी की पेंशन बेवजह बंद न हो।

साथियों, यह सिर्फ़ पेंशन का मसला नहीं है, बल्कि हमारे बुजुर्गों की इज़्ज़त, हक़ और सोशल सिक्योरिटी का सवाल है। हमें उम्मीद है कि जिला प्रशासन असली हालात को समझते हुए इंसाफ़पूर्ण और संवेदनशील कार्यवाही करेगा।

नोट: ये तस्वीरें किसी शख़्स ने बिना बताए खींचीं और बाद में मुझे सरप्राइज़ करते हुए व्हाट्सएप पर भेजीं। मेरा मक़सद बुजुर्गों की तकलीफ को सोशल मीडिया पर परोस कर वाहवाही लूटना नहीं है, बल्कि एक असली मुद्दे को सामने लाना और एक अफ़सर की अपनी ड्यूटी के प्रति लगन को शेयर करना है।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

01/02/2026

हमारा इलाक़ा उत्तर भारत के सबसे ग़रीब इलाक़ों में से एक है। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है। यहाँ की प्रति व्यक्ति आय राज्य और देश के औसत से बहुत कम है, और यही हमारी असली हक़ीक़त है। यहाँ ग़रीबी कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सच्चाई है।

ज़िले में लगभग आठ लाख महिलाएँ रहती हैं। इनमें से ज़्यादातर महिलाएँ खून की कमी और कुपोषण की शिकार हैं। बच्चे कमज़ोर हालत में पैदा होते हैं, और ग़रीबी बचपन से लेकर जवानी तक उनका पीछा नहीं छोड़ती। ये सब 'तथ्य' सरकारी और आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित हैं।

अब मैं अपना एक निजी तजुर्बा साझा करना चाहता हूँ, जो मैंने ख़ुद देखा और महसूस किया है। अपनी पीएचडी के लिए डेटा कलेक्शन के दौरान मैं ज़िले के एक गाँव में महिलाओं से इंटरव्यू कर रहा था। मैंने वहाँ मौजूद महिलाओं से उनकी उम्र, शिक्षा और वैवाहिक स्थिति के बारे में सवाल पूछे। लगभग सभी महिलाओं ने शांति और आत्मविश्वास के साथ जवाब दिए, सिवाय एक 23-24 साल की लड़की के।

जब मैंने उस बहन से पूरे सम्मान के साथ उनकी वैवाहिक स्थिति स्पष्ट करने को कहा, तो वह अचानक उठीं और रोते हुए वहाँ से चली गईं। कुछ पल के लिए मुझे लगा कि शायद मुझसे कोई ग़लत शब्द निकल गया हो। ख़ैर, हिम्मत जुटाकर मैंने वहाँ मौजूद दूसरी महिलाओं से पूछा कि वह इतनी भावुक होकर क्यों चली गईं। जो वजह उन्होंने बताई, उसे मैं ज़िंदगी भर नहीं भूल पाऊँगा।

उन्होंने बताया कि "यह लड़की पिछले पाँच-छह सालों से कुँवारी ही बैठी है। उसकी शादी सिर्फ़ इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि उसके पिता दहेज में मोटरसाइकिल देने की हैसियत नहीं रखते। इसी वजह से उसकी अब तक सगाई भी नहीं हो पाई है"। न सगाई, न शादी, न सामाजिक इज़्ज़त। उसकी हम-उम्र लड़कियाँ माँ तक बन चुकी थीं, जबकि वह ग़रीबी में एक गुमनाम ज़िंदगी जी रही थी; अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि मजबूरी से। यही वजह थी कि शादी का सवाल सुनते ही वह टूट गई और रोते हुए चली गई।

यह दर्द सिर्फ़ एक बेटी का नहीं है। हमारे इलाक़े में हज़ारों बेटियाँ ऐसी हैं जो ग़रीबी की वजह से आज भी शादी के इंतज़ार में अपने घरों में बैठी हैं।

साथियों, क्या ये हालात अचानक पैदा हुए हैं? बिल्कुल नहीं। यही वह सच्चाई है जो दिल्ली, गुरुग्राम और फ़रीदाबाद के चमकदार फ़ार्महाउसों में होने वाली भव्य शादियों के पीछे छुपी रहती है। ऐसे हालात में एलीट लोगों का दिखावा कोई परंपरा नहीं, बल्कि बेपरवाही और हवाबाज़ी का घिनौना तमाशा बन जाता है।

जब एलीट लोग एक ही रात में इतना पैसा उड़ा देते हैं, जितना ज़िले के 95 प्रतिशत से ज़्यादा परिवार पूरी ज़िंदगी में नहीं कमा पाते, तो वह खुशी का जश्न नहीं होता। वह इस बात का खुला एलान होता है कि उन्हें अपने आसपास की ग़रीबी से कोई मतलब नहीं है। इनके लिए क़ौम की ग़रीबी और दर्द सिर्फ़ अपनी कमाई का ज़रिया बन गया है।

जहाँ ज़्यादातर लोग दो वक्त की रोटी, इलाज और ज़रूरी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हों, वहाँ स्थानीय एलीट द्वारा की जाने वाली भव्य शादियाँ निजी मामला नहीं रहतीं। यह एक गंभीर सामाजिक और नैतिक सवाल बन जाता है।

जब हज़ारों परिवार अपनी बेटियों की शादी इज़्ज़त से करने, बच्चों को पेट भर खाना खिलाने और इलाज कराने के लिए परेशान हों, तब अमीरों द्वारा दौलत का खुला प्रदर्शन एक तरह का सामाजिक ज़ुल्म है। सच यह है कि ऐसी शादियाँ खुशी के लिए नहीं, बल्कि ताक़त, रुतबा और दबदबा दिखाने के लिए की जाती हैं। ये गरीबों को उनकी 'औक़ात' याद दिलाने का तमाशा बन चुकी हैं।

इसके अलावा, जो नेता, समाजसेवी, अधिवक्ता, जेई, पटवारी, भावी, युवा या फ़ेसबुकिया लोग दहेज और ग़रीबी में फँसी अपने इलाक़े की बेटियों के बीच खड़े होकर ऐसे जश्नों में शामिल होते हैं, और वहाँ की रील या फोटो सोशल मीडिया पर डालते हैं, उन्हें समाज में इंसाफ़ और एकता की बातें करने का कोई नैतिक हक़ नहीं होना चाहिए।

याद रखिए, किसी समाज को इस बात से नहीं परखा जाता कि उसके अमीर लोग कितनी शानो-शौकत से शादी करते हैं, बल्कि इस बात से परखा जाता है कि वह अपने आसपास के दर्द और ग़रीबी को कितनी ईमानदारी से देखता और समझता है।

वैसे भी, हमारा मज़हब हमें सादगी, रहम और ज़िम्मेदारी की सीख देता है। और इंसानियत भी यही कहती है कि जब आसपास इतनी तकलीफ़ हो, तो जश्न के साथ संवेदनशीलता भी होनी चाहिए।

आज मेवात को चमकदार लाइटों, महंगे टेंटों और आलीशान कार्पेटों वाली शादियों की नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक मुहिम की ज़रूरत है जो एलीट वर्ग को उनके दिखावे की इंसानी क़ीमत का एहसास कराए।

शुक्रिया।
डॉ. मोहम्मद रफ़ीक़

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