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अस्पताल में मरीजों के अधिकार :-
अस्पताल जाते वक्त भी एक उपभोक्ता के नाते आपके कई अधिकार हैं। क्योंकि, स्वास्थ्य सेवाएं देना सब्जी बेचने जैसा नहीं है। डॉक्टर और मरीज़ का रिश्ता खास होता है, जहां डॉक्टर मरीज की ओर से कई फैसले लेता है।
स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले अस्पताल 'मेडिकल क्लीनिक कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट' के अंदर आते हैं। साथ ही, मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया की ज़िम्मेदारी है कि वो ये सुनिश्चित करे कि डॉक्टर 'कोड ऑफ़ मेडिकल एथिक्स रेग्युलेशंस' का पालन करें। इसलिए, अगर डॉक्टर की लापरवाही का मामला हो या सेवाओं को लेकर कोई शिकायत हो तो उपभोक्ता हर्जाने के लिए उपभोक्ता अदालत जा सकता हैं।
01. इमरजेंसी मेडिकल मदद का अधिकार:-
अगर कोई व्यक्ति गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचता है तो सरकारी और निजी अस्पताल के डॉक्टरों की ज़िम्मेदारी है कि उस व्यक्ति को तुरंत डॉक्टरी मदद दी जाए। जान बचाने के लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाएं देने के बाद ही अस्पताल मरीज़ से पैसे मांग सकते हैं या फिर पुलिस को जानकारी देने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
02. खर्च की जानकारी का अधिकार:-
सभी मरीज़ों को जानकारी दी जानी चाहिए कि उनको क्या बीमारी है और इलाज का क्या नतीजा निकलेगा। साथ ही मरीज को इलाज पर खर्च, उसके फायदे और नुक़सान और इलाज के विकल्पों के बारे में लिखित व मौखिक रूप में देनी चाहिए।
03. मेडिकल रिपोर्ट्स, रिकॉर्ड्स पर अधिकार:-
मरीज़/ परिजनों को अधिकार है कि अस्पताल उसे केस से जुड़े सभी कागजात की फोटोकॉपी अस्पताल में भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर और डिस्चार्ज होने के 72 घंटे के भीतर दें। कोई भी अस्पताल मरीज़ को उसके मेडिकल रिकॉर्ड या रिपोर्ट देने से मना नहीं कर सकता। इन रिकॉर्ड्स में डायग्नोस्टिक टेस्ट, डॉक्टर की राय, अस्पताल में भर्ती होने का कारण आदि शामिल हैं। डिस्चार्ज के समय मरीज को एक डिस्चार्ज कार्ड दिया जाना चाहिए जिसमें भर्ती के समय मरीज़ की स्थिति, लैब टेस्ट के नतीजे, भर्ती के दौरान इलाज, डिस्चार्ज के बाद इलाज, क्या कोई दवा लेनी है या नहीं लेनी है, क्या सावधानियां बरतनी हैं, क्या जांच के लिए वापस डॉक्टर के पास जाना है, इन बातों का ज़िक्र होना चाहिए।
04. दूसरी राय लेने का अधिकार:-
अगर आप किसी डॉक्टर के तरीके से ख़ुश नहीं हैं तो आप किसी दूसरे डॉक्टर की सलाह ले सकते हैं। ऐसे में ये अस्पताल को सभी मेडिकल और डायग्नोस्टिक रिपोर्ट मरीज़ को उपलब्ध करवानी चाहिए। किसी दूसरे डॉक्टर की सलाह उस वक्त महत्वपूर्ण हो जाती है जब बीमारी से जान को खतरा हो, या फिर डॉक्टर जिस लाइन पर इलाज सोच रहा है उस पर सवाल हो।
05. इलाज की गोपनीयता का अधिकार:-
इलाज के दौरान डॉक्टर को कई ऐसी बातें पता होती हैं जिसका ताल्लुक मरीज की निजी ज़िंदगी से होता है, तो डॉक्टर का फर्ज़ है कि वो इन जानकारियों को गोपनीय रखे।
06. मंज़ूरी से पहले पूरी जानकारी का अधिकार:-
किसी बड़ी सर्जरी से पहले डॉक्टर का फ़र्ज है कि वो मरीज़ या फिर उसका ध्यान रखने वाले व्यक्ति को सर्जरी के दौरान होने वाले मुख्य ख़तरों के बारे में बताए और जानकारी देने के बाद सहमति पत्र पर दस्तख़त करवाए, और ये भी पूछे कि क्या वो सर्जरी करवाना चाहते हैं।
07. मेडिकल स्टोर या डायग्नोस्टिक सेंटर चुनने का अधिकार:-
अक्सर शिकायत आती रहती है कि जब किसी अस्पताल में डॉक्टर मरीज को दवा की पर्ची देता है तो कहता है कि वो अस्पताल की ही दुकान से दवा खरीदें या फिर अस्पताल में ही डायग्नॉस्टिक टेस्ट करवाएं। अस्पताल ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि ये उपभोक्ता के अधिकारों का हनन है। उपभोक्ता को आज़ादी है कि वो टेस्ट जहां से चाहे, वहीं से करवाए। मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया की नीति के मुताबिक़, जहां तक संभव हो, डॉक्टर को दवाई का वैज्ञानिक (जेनेरिक) नाम इस्तेमाल करना चाहिए, न कि किसी कंपनी का ब्रैंड नाम।
08. अस्पताल से डिस्चार्ज का अधिकार:-
अक्सर देखा गया है कि अगर अस्पताल का पूरा बिल न अदा किया गया हो तो मरीज़ को अस्पताल छोड़ने नहीं दिया जाता, कई बार लाश तक नहीं ले जाने देते। अस्पताल की ये ज़िम्मेदारी है कि वो मरीज़ और परिवार को दैनिक खर्च के बारे में बताएं लेकिन इसके बावजूद अगर बिल को लेकर असहमति होती है, तब भी मरीज को अस्पताल से बाहर जाने देने से या फिर शव को ले जाने से नहीं रोका जा सकता।
अगर किसी मरीज़ को उपरोक्त अधिकारों संबंधित कोई शिकायत है तो पहले कोशिश करें कि अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर से बातचीत करके समस्या का हल निकलें। लेकिन अगर कोई हल नहीं निकलता है तो केस के बारे में सभी सबूत इकट्ठा उपभोक्ता फॉरम से संपर्क करें। साथ ही, राज्य मेडिकल काउंसिल में डॉक्टर और अस्पताल के खिलाफ शिकायत दर्ज करवायें।
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