A K SINGH
07/06/2026
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर मैसूर के एक सरकारी दफ्तर की धूल खाती आलमारी से ताड़ के पत्तों का एक बंडल न मिला होता, तो क्या हमें कभी पता चलता कि भारत के पास ढाई हजार साल पहले ही राजनीति, कूटनीति और अर्थशास्त्र का दुनिया का सबसे महान ग्रंथ मौजूद था? हम सब आचार्य चाणक्य और उनके 'अर्थशास्त्र' का नाम गर्व से लेते हैं, लेकिन इस महान ग्रंथ को गुमनामी के गहरे अंधेरे से निकालकर आधुनिक दुनिया के सामने लाने वाले असली भगीरथ कोई और नहीं, बल्कि रुद्रपटनम शामशास्त्री थे। वे एक ऐसे 'मौन तपस्वी' विद्वान थे, जिन्होंने अगर अपनी जिंदगी के कई साल पांडुलिपियों की खाक छानने में न लगाए होते, तो चाणक्य का ज्ञान हमेशा के लिए इतिहास के मलबे में दफन हो जाता।
शामशास्त्री का जन्म १८६५ में कर्नाटक के हासन जिले के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर संस्कृत और प्राचीन लिपियों को जानने की एक अजीब सी तड़प थी। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर संस्कृत में महारत हासिल की और बाद में मैसूर के 'ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में एक लाइब्रेरियन और क्यूरेटर के रूप में काम करना शुरू किया। उस समय इस संस्थान का काम राजा-महाराजाओं और पुराने मठों से मिली प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजना था। यह काम बेहद उबाऊ और थका देने वाला था, जहाँ दिन भर धूल, दीमकों और सड़ते हुए ताड़ के पत्तों के बीच बैठना पड़ता था। लेकिन शामशास्त्री के लिए यह किसी खजाने की खोज जैसा था।
साल १९०४ की बात है, जब शामशास्त्री लाइब्रेरी के एक कोने में रखी उन पांडुलिपियों की कैटलॉगिंग बना रहे थे जिन्हें बरसों से किसी ने छुआ तक नहीं था। तभी तंजावुर के एक अज्ञात विद्वान ब्राह्मण द्वारा दान किए गए ताड़ के पत्तों का एक धूल धूसरित बंडल उनके हाथ लगा। वह लिपि आधुनिक कन्नड़ या देवनागरी नहीं थी, बल्कि 'ग्रंथ लिपि' थी, जो प्राचीन काल में संस्कृत लिखने के लिए दक्षिण भारत में इस्तेमाल होती थी। जब शामशास्त्री ने उन पत्थरों जैसे कड़े हो चुके पत्तों को धीरे-धीरे पलटना और पढ़ना शुरू किया, तो उनके रोंगटे खड़े हो गए। शुरुआती श्लोक में लिखा था कि यह अर्थशास्त्र प्राचीन आचार्यों के सिद्धांतों को संकलित करके बनाया गया है। शामशास्त्री समझ गए कि उनके हाथ में जो दस्तावेज है, वह कोई आम कहानी या कविता नहीं है। यह आचार्य चाणक्य का वह 'अर्थशास्त्र' था, जिसके बारे में दुनिया ने सिर्फ दूसरी किताबों में सुना था, लेकिन जिसका कोई सजीव वजूद पिछले १५०० सालों से किसी ने नहीं देखा था। पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मान चुके थे कि यह ग्रंथ हमेशा के लिए विलुप्त हो चुका है।
ग्रंथ का मिलना तो सिर्फ शुरुआत थी, असली परीक्षा तो अब शुरू होनी थी। ताड़ के वे पत्ते वेंटिलेज और सदियों पुराने थे, कई जगह से टूट रहे थे और उन पर लिखी स्याही धुंधली हो चुकी थी। शामशास्त्री रोज़ घंटों मोमबत्ती या दीये की रोशनी में, मैग्निफाइंग ग्लास लेकर बैठते थे। वे एक-एक अक्षर को डिकोड करते, उसका मिलान करते और फिर उसे कागज़ पर उतारते। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कूटनीति और शासन व्यवस्था के लिए ऐसे प्राचीन तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल किया था जो २०वीं सदी की शुरुआत के संस्कृत विद्वानों के लिए भी अजनबी थे। इसके समाधान के लिए शामशास्त्री ने कई-कई दिनों तक एक-एक शब्द के सही अर्थ को खोजने के लिए अन्य प्राचीन ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। लगभग पांच साल की हाड़-तोड़ दिमागी मेहनत और बिना किसी सरकारी मदद के, रात-रात भर जागकर उन्होंने पूरे ग्रंथ का अनुवाद और संपादन पूरा किया।
साल १९०९ में शामशास्त्री ने चाणक्य के 'अर्थशास्त्र' का पहला अंग्रेजी अनुवाद दुनिया के सामने रखा। इस प्रकाशन ने पूरी दुनिया के बौद्धिक जगत में एक भूचाल ला दिया। उस समय तक ब्रिटिश और पश्चिमी इतिहासकार यह ढिंढोरा पीटते थे कि भारत के पास कभी कोई राजनीतिक समझ या शासन चलाने का व्यवस्थित ज्ञान नहीं था और भारतीय तो सिर्फ पूजा-पाठ में डूबे रहते थे। शामशास्त्री की इस खोज ने पश्चिमी अहंकार को चूर-चूर कर दिया। दुनिया ने देखा कि जब यूरोप कबीलों में जी रहा था, तब भारत के पास टैक्स सिस्टम, जासूसी नेटवर्क, विदेश नीति, आपदा प्रबंधन और युद्ध कला पर इतना विस्तृत और वैज्ञानिक ग्रंथ मौजूद था। जर्मनी और यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान शामशास्त्री के इस काम को देखने मैसूर आने लगे।
शामशास्त्री के इस योगदान की भव्यता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के चांसलर और मैसूर के महाराजा के बीच एक बैठक चल रही थी, तो मैसूर के राजा ने महामना मदन मोहन मालवीय जी से पूछा कि वे उनके राज्य के लिए क्या कर सकते हैं? मालवीय जी ने तुरंत उत्तर दिया कि मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे अपने राज्य के विद्वान शामशास्त्री के दर्शन करा दीजिए, जिन्होंने भारत का खोया हुआ गौरव वापस दिलाया है। जब महात्मा गांधी मैसूर यात्रा पर आए, तो वे भी विशेष रूप से शामशास्त्री से मिलने पहुंचे और देश के इस अनमोल रत्न के सामने अपना सिर झुकाया।
इतना बड़ा काम करने के बाद भी शामशास्त्री कभी आत्मप्रशंसा के जाल में नहीं फंसे। वे मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और बाद में पुरातत्व विभाग के निदेशक भी रहे, लेकिन उनका रहन-सहन हमेशा एक साधारण दक्षिण भारतीय शिक्षक जैसा ही रहा। वे अक्सर कहते थे कि मैंने कुछ नया नहीं लिखा, मैंने तो बस उस ऋषि के ज्ञान पर जमी धूल को साफ किया है। साल १९४४ में यह महान मनीषी चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गया। आज हम जब भी मौर्य साम्राज्य की भव्यता, चाणक्य नीति की अचूकता और अखंड भारत के सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं, तो उस चर्चा की नींव में रुद्रपटनम शामशास्त्री की उसी लाइब्रेरी के कोने में की गई खामोश साधना का पसीना छुपा होता है।
26/05/2026
11/05/2026
जब जुनून और मेहनत साथ हो, तो इनोवेशन बड़े शहरों की लैब में नहीं... छोटे शहरों से भी निकलता है
प्रयागराज के शैलेन्द्र गौड़ ने ऐसा सिक्स-स्टोक इंजन बनाकर सबको चौंका दिया, जो कम ईंधन में ज्यादा माइलेज देने का दावा करता है।
अगर ऐसे देसी innovators को सही मंच और सपोर्ट मिले, तो भारत टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल की दुनिया में नई क्रांति ला सकता है
ये सिर्फ एक इंजन नहीं, बल्कि उस सोच का उदाहरण है जो समस्याओं का समाधान ढूँढती है।
असली टैलेंट डिग्री नहीं, आइडिया और मेहनत से पहचान बनाता है 100
क्या आपको लगता है कि ऐसे innovators को सरकार और बड़ी कंपनियों से ज्यादा support मिलना चाहिए?
11/05/2026
2 साल। नंगे पांव। घना जंगल। 20 घंटे। अकेला।
यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं है।
यह मध्य प्रदेश की घटना है। आज की। 2026 की।
मैं यह खबर सुबह से कई बार पढ़ रहा हूं और हर बार एक पल के लिए सब कुछ थम जाता है।
📌सिर्फ एक तस्वीर दिमाग में आती है:
एक नन्हा बच्चा। दो साल का। नंगे पांव। निचले हिस्से पर कपड़े नहीं। मध्य प्रदेश के रायसेन के उस घने जंगल में, जहां रात को जंगली जानवरों की आवाजें आती हैं- अकेला भटक रहा है। घंटों कई किलोमीटर।
🚩वो चल रहा है। किसी को नहीं जानता कि कहां जाना है। बस चल रहा है।
📌शायद मां को ढूंढ रहा है।
🔸️3 मई 2026।
🔹️विदिशा जिले के हिनोतिया गांव के राजेंद्र अहिरवार ने अपनी पत्नी ज्योति (27 साल) को यह कहकर घर से लेकर निकला था कि मोबाइल खरीदने जाना है। वह ज्योति और बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। वहां राजेंद्र ने पत्थर उठाया। और ज्योति की कहानी वहीं खत्म हो गई।
📍 एसपी रोहित कश्वानी ने पुष्टि की, राजेंद्र ने अपने 2 साल के बेटे को उसी जंगल में अकेला छोड़ा और फरार हो गया। रात हुई। जंगल में अंधेरा छाया। वो बच्चा, जो अभी ठीक से बोलना भी नहीं जानता वहां अकेला था। परिवार ने जब इंतजार किया और कोई नहीं लौटा तो पुलिस को ख़बर दी। पुलिस, ड्रोन, डॉग स्क्वॉड, रातभर जंगल में उस एक नन्हीं सांस को ढूंढते रहे।
और सुबह करीब 8:30 बजे, जब वो बच्चा मिला, वो अपने मूल स्थान से लगभग 2 किलोमीटर दूर पैदल चल चुका था।
दो साल का बच्चा। 2 किलोमीटर। अकेला। रात के जंगल में।
🚩 वो जिंदा था। मेरा दिल एक और सवाल पर अटका है उन 20 घंटों में उस बच्चे के भीतर क्या हो रहा था? विज्ञान इसका जवाब देता है। और यह जवाब, दिल को चीर देता है।
विजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के 2025 के शोध में पाया गया, जब कोई शिशु अपनी मां से अलग होता है, तो उसके मस्तिष्क में ऑक्सीटॉसिन की सक्रियता असामान्य रूप से बढ़ जाती है, जैसे दिमाग़ चीख-चीख कर मां को पुकार रहा हो।
मां की अनुपस्थिति में शिशु का स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल तेजी से बढ़ता है। यह सिर्फ रोना नहीं है, यह शरीर का टूटना है। और यदि यह अलगाव लंबा हो तो इसका असर पूरी जिंदगी दिमाग की बनावट पर पड़ता है। मां का स्पर्श, उसकी आवाज, उसकी गंध, यह सब एक नन्हे बच्चे के मस्तिष्क के विकास के लिए उतना ही जरूरी है जितना हवा और पानी। मनोविज्ञान के इतिहास में हैरी हार्लो का वो प्रयोग याद है?
उन्होंने नन्हे बंदरों को दो "नकली मां" के साथ रखा, एक बिजली तार की बनी मां जो खाना देती थी, एक कपड़े की बनी पुतले वाली मां जो सिर्फ नर्म थी। और बंदर के बच्चे हमेशा हमेशा कपड़े की मां के पास गए। क्योंकि प्राणी को भोजन से पहले ममता चाहिए।
यह सिर्फ भावना नहीं है। यह इवोल्यूशन है। करोड़ों साल पुरानी जीववैज्ञानिक प्रोग्रामिंग। और उस जंगल में वो दो साल का बच्चा उसी प्रोग्रामिंग के सहारे जीवित रहा। शायद मां की गंध को खोजता रहा। शायद उसकी आवाज़ सुनने की कोशिश करता रहा।
लेकिन मां नहीं थी। क्योंकि उसके पिता ने उसे छीन लिया था। और यह सिर्फ विदिशा में पहली नहीं हुआ, जब किसी अपने ने ही एक शिशु से उसकी मां को अलग कर दिया और उसे भटकने को छोड़ दिया। हम ऐसी खबरें पढ़ते हैं। दुखी होते हैं। फिर भूल जाते हैं। अगले रविवार 11 मई Mother's Day है।
पूरी दुनिया में उस दिन मां को कार्ड मिलेगा। फूल मिलेंगे। केक मिलेगा। कई मोबाइल पर फोन कर विष करेंगे। कई व्हाट्सएप्प फेसबुक पर फोटो, वीडियो शेयर कर अपनी मां को बधाइयां देंगे। मैं उस बच्चे के बारे में सोच रहा हूं जो अपनी मां के मृत शरीर के आस पास सारी रात उस जंगल में उसे खोजता रहा। रोता रहा। बिलखता रहा। हिचकता रहा। और भागता रहा। गिरता। उठता। फिर इधर से उधर दौड़ता। मां के लिए। शरीर के अथाह दर्द चोट को बिसरा कर मां के बस एक आलिंगन के लिए।
नहीं पता था कि मां जा चुकी है।
न उसे मां का चेहरा ही आगे याद रहेगा
मेरे बच्चे कभीकभी रात को डर जाते हैं और मैं देखता हूं कि कैसे वह नींद में ही सीधे अपनी मां से चिपक जाते हैं। लिपट जाते है। मां के शरीर से लगने पर जो सुकून जो ठंडक मिलती है, वह मैंने भी ताउम्र महसूस की है। क्योंकि मां सिर्फ एक रिश्ता नहीं होती। मां एक बच्चे की पूरी दुनिया होती है। उसकी पहली आवाज। उसकी पहली गंध। उसकी पहली सुरक्षा। उसका पहला घर। और जो इंसान उस दुनिया को छीन ले, वो सिर्फ हत्यारा नहीं है।
वो उस बच्चे से उसकी पूरी जिंदगी छीन रहा है। उसका भरोसा। उसका बचपन। उसकी नींद। उसके सपने। विज्ञान कहता है, जो बच्चा मां के बिना बड़ा होता है : उसके स्ट्रेस लेवल ज्यादा होते हैं। मुश्किलों से उबरने की ताकत कम होती है। और जिंदगी भर जुड़ाव में कठिनाई रहती है।
यानी वो बच्चा, जो आज बचाया गया, उसकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। वो जिंदगी भर उस एक रात का बोझ उठाएगा। इस समाचार के जरिए एक निवेदन है आप सबसे
जहां भी घरेलू हिंसा दिखे, 'चुप मत रहिए।'
किसी बच्चे को खतरे में देखें, Childline 1098 पर call करें। अपने घर में, अपने पड़ोस में, किसी मां को तकलीफ में देखें, आगे आइए। आपकी एक काल एक जान बचा सकती है। उस बच्चे को दादा-दादी के पास सौंप दिया गया है। वो सुरक्षित है, जिस्म से। पर उसके भीतर, एक सवाल हमेशा रहेगा। मां कहां गई? और उस सवाल का जवाब, कोई नहीं दे सकता।
📌 स्रोत: NDTV, Times of India, Moneycontrol, Republic World, Weizmann Institute of Science (2025), NIH Research
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