Santosh Kumar Gangwar Page
16/07/2026
📌 "संस्कृत विदेशी है?" — कांग्रेस सांसद जावेद आजाद के बयान पर बवाल 📌
बिहार के एक धरने में माइक हाथ में लिया... और एक ऐसा बयान दे दिया, जिसने पूरे देश में भाषा की सियासत छेड़ दी। एक तरफ उर्दू को "अपनी मिट्टी की भाषा" बताया, तो दूसरी तरफ संस्कृत और अंग्रेज़ी को एक ही कतार में खड़ा कर "विदेशी भाषा" करार दे दिया। सवाल उठ रहा है — क्या यह भाषाई सच्चाई है, या सोची-समझी सियासत?
📍 हुआ क्या था? 📍
बिहार के किशनगंज से कांग्रेस सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद आज़ाद, अंबेडकर टाउन हॉल के पास कांग्रेस सेवादल के धरने में पहुँचे थे। मुद्दा था — बिहार के नए डिग्री कॉलेजों से उर्दू विषय हटाए जाने का सरकारी फैसला।
🫵 पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उर्दू बिहार की दूसरी राजभाषा है और यह पूरी तरह हिंदुस्तान की धरती पर जन्मी भाषा है, इसलिए इसे यूँ खत्म नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन इसी बहस में उन्होंने आगे कहा कि संस्कृत और अंग्रेज़ी, दोनों बाहर से आई भाषाएं हैं — यानी विदेशी।
बस, यहीं से बवाल शुरू हो गया।
📍 कौन हैं मोहम्मद जावेद? 📍
👉 पेशे से MBBS डॉक्टर, बिहार के किशनगंज ज़िले के गोवाबाड़ी गाँव में जन्मे एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं।
👉 राजनीति में लंबा अनुभव — चार बार विधायक रह चुके हैं, और 2019 व 2024 दोनों लोकसभा चुनावों में किशनगंज से जीत दर्ज कर चुके हैं।
👉 कांग्रेस पार्टी में लोकसभा व्हिप की ज़िम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
🫵 यानी यह कोई नौसिखिया बयान नहीं — एक अनुभवी, सीनियर नेता की टिप्पणी है, जिसका वज़न राजनीतिक हलकों में ज़्यादा है।
📍संस्कृत का इतिहास — क्या यह सच में "बाहरी" है? 📍
भाषाविदों का एक बड़ा तबका मानता है कि संस्कृत का ताल्लुक़ हिंद-आर्य भाषा परिवार से है, और इसका सबसे पुराना रूप — वैदिक संस्कृत — भारतीय उपमहाद्वीप में हज़ारों साल से मौजूद वेदों, उपनिषदों और महाकाव्यों की भाषा रही है।
🫵 "आर्य बाहर से आए" वाला सिद्धांत एक पुरानी औपनिवेशिक-कालीन थ्योरी है, जिस पर आज भी इतिहासकारों और आनुवंशिकीविदों में गहरी असहमति है — कुछ इसे सही मानते हैं, कुछ इसे भारत की सभ्यता को "बाहरी" साबित करने की कोशिश बताते हैं।
👉 आलोचकों की दलील है कि संस्कृत को "विदेशी भाषा" कहना, भारत की हज़ारों साल पुरानी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत — वेद, गीता, रामायण, महाभारत — को नकारने जैसा है।
👉 वहीं दूसरा पक्ष यह भी कहता है कि हर भाषा किसी न किसी भाषा-परिवार से जुड़ी होती है और भाषाओं का सफ़र लगातार गतिशील रहा है — इसलिए "शुद्ध देसी" या "पूरी तरह विदेशी" जैसे लेबल भाषाविज्ञान की दृष्टि से ही सरलीकरण हैं।
🫵 संक्षेप में कहें तो यह विषय भाषाविज्ञान से ज़्यादा एक वैचारिक और राजनीतिक बहस बन चुका है, जिस पर कोई एक "अंतिम सच" नहीं है।
📍 उर्दू-हिंदी का इतिहास 📍
उर्दू और हिंदी, दोनों की जड़ें उत्तर भारत की साझा बोली "खड़ी बोली" या "हिंदुस्तानी" में मिलती हैं — यह वही ज़बान है जो दिल्ली-आगरा के आसपास सदियों से बोली जाती रही।
🫵 फ़र्क़ बाद में विकसित हुआ — उर्दू ने फ़ारसी-अरबी लिपि और शब्दावली को अपनाया, जबकि हिंदी ने देवनागरी लिपि और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली की ओर रुख़ किया।
👉 19वीं सदी में अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में यह भाषाई फ़र्क़ धीरे-धीरे सांप्रदायिक रंग लेने लगा — हिंदी और उर्दू को धर्म से जोड़कर देखा जाने लगा, जबकि असल में दोनों भाषाएं भारत की साझा गंगा-जमुनी तहज़ीब की उपज हैं।
🫵 आज़ादी के बाद 1950 में हिंदी को देवनागरी लिपि में राजभाषा का दर्जा मिला, जबकि उर्दू को कई राज्यों (जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश) में दूसरी राजभाषा का दर्जा हासिल है।
👉 जावेद साहब का यह कहना कि उर्दू हिंदुस्तान में ही जन्मी भाषा है — यह ऐतिहासिक रूप से काफ़ी हद तक सही माना जाता है। विवाद वहां शुरू हुआ जहाँ उन्होंने संस्कृत को इसी बहस में "बाहरी" बता दिया।
📍बयान के पीछे मंशा — सिर्फ़ भाषा या सियासत? 📍
♦️तात्कालिक ट्रिगर: बिहार सरकार का डिग्री कॉलेजों से उर्दू हटाने का फ़ैसला। जावेद इसी का विरोध कर रहे थे, और उर्दू के पक्ष में मज़बूत तर्क देने के जोश में शायद संतुलन खो बैठे।
♦️राजनीतिक टाइमिंग: बिहार जैसे राज्य में भाषा और पहचान की राजनीति हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रही है। ऐसे बयान अक्सर एक समुदाय को लामबंद करने या "हमारी भाषा-हमारी पहचान" वाला नैरेटिव मज़बूत करने के लिए भी दिए जाते हैं — चाहे इरादतन हो या बयानबाज़ी में फिसलन।
♦️विपक्षी नज़रिया: आलोचकों का कहना है कि यह बयान "सनातन संस्कृति" और भारतीय विरासत का अपमान है, और इसे भाषाई ध्रुवीकरण की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
♦️कांग्रेस समर्थकों का पक्ष: यह सिर्फ़ शिक्षा नीति में उर्दू को हाशिये पर धकेले जाने के विरोध में दिया गया बयान था, जिसे तोड़-मरोड़कर सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।
📍 मंशा चाहे जो रही हो, नतीजा साफ़ है — भाषा जैसे संवेदनशील विषय पर एक लाइन की चूक, पूरे बयान को कई दिनों तक सुर्खियों में ला सकती है।📍
15/07/2026
📌 "हमारा DNA एक है!" — तालिबान मंत्री के बयान से पाकिस्तान में हलचल 📌
एक तालिबान मंत्री... दिल्ली के मंच से... कहता है — "भारत और अफगानिस्तान का डीएनए एक है, मुझे लगा जैसे मैं अपने ही देश में हूं।"
यह कोई मामूली बयान नहीं था। इसने इस्लामाबाद में हलचल मचा दी, सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी, और एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया — पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच आखिर हो क्या रहा है, और भारत इसमें कहां फिट बैठता है?
चलिए, इस लेख में पूरी कहानी को शुरू से समझते हैं। 👇
📍"हमारा DNA एक है" — आखिर क्यों बदल रहे हैं भारत-अफगानिस्तान के रिश्ते? 📍
पिछले हफ्ते अफगानिस्तान के कृषि, सिंचाई और पशुपालन मंत्री मौलवी अताउल्लाह ओमरी अपनी पहली आधिकारिक भारत यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे। यह दौरा विदेश मंत्रालय और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स के साझा आयोजन "इंडिया-अफगानिस्तान ट्रेड अपॉर्च्युनिटीज इंडस्ट्री इंटरैक्टिव सेशन" के तहत हुआ।
इसी दौरान उन्होंने वह बयान दिया, जो अब वायरल हो चुका है — भारत और अफगानिस्तान के लोगों का "डीएनए एक जैसा" है, और भारत आकर उन्हें अपने ही देश जैसा एहसास हुआ।
🫵 लेकिन यह सिर्फ एक भावुक बयान भर नहीं था। इसी हफ्ते नई दिल्ली में भारत-अफगानिस्तान संयुक्त समिति की चौथी उच्च-स्तरीय बैठक भी हुई, जिसमें कृषि सुधार, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और क्षमता-निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग की रूपरेखा तय हुई। ओमरी ने भारतीय कंपनियों को कृषि मशीनरी, बीज, फूड प्रोसेसिंग और सिंचाई क्षेत्र में निवेश का न्योता भी दिया — क्योंकि अफगानिस्तान की करीब 80% आबादी सीधे तौर पर खेती-किसानी पर निर्भर है।
👉 यानी बयान भावनात्मक था, लेकिन पीछे की मंशा पूरी तरह रणनीतिक और आर्थिक थी।
📍 भारत-अफगान रिश्ते इतने गहरे क्यों हैं? 📍
इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना जरूरी है।
भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते सदियों पुराने हैं — व्यापारिक रास्तों, बौद्ध और मुगलकालीन विरासत, भाषा और संस्कृति के आदान-प्रदान तक जाते हैं। आधुनिक दौर में भी भारत अफगानिस्तान का एक भरोसेमंद साझेदार रहा — संसद भवन (काबुल), सलमा डैम, जरांज-देलाराम हाईवे जैसी दर्जनों विकास परियोजनाओं में भारत ने निवेश किया।
🫵 2021 में जब तालिबान सत्ता में लौटा, तो भारत ने औपचारिक राजनयिक मान्यता नहीं दी लेकिन रिश्ते पूरी तरह खत्म भी नहीं हुए।
👉 भारत ने मानवीय सहायता जारी रखी — गेहूं, दवाइयां, कोविड वैक्सीन भेजी — और काबुल में अपना तकनीकी मिशन भी दोबारा सक्रिय किया। यह एक सधी हुई, व्यावहारिक नीति थी। सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं, लेकिन अफगान जनता से जुड़ाव बरकरार।
👉 दूसरी तरफ, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का इतिहास कहीं ज्यादा उलझा हुआ है। दोनों के बीच की सीमा — जिसे "डूरंड रेखा" कहा जाता है — 1893 में ब्रिटिश भारत के समय खींची गई थी। किसी भी अफगान सरकार ने, चाहे वह राजशाही हो, गणराज्य हो या तालिबान — इसे कभी पूरी तरह वैध सीमा के तौर पर स्वीकार नहीं किया। यह मतभेद आज भी हर तनाव की जड़ में रहता है।
📍अभी पाकिस्तान-अफगानिस्तान में तनाव क्यों है? 📍
हाल के महीनों में यह तनाव और गहरा हुआ है। इसकी मुख्य वजहें:
♦️ डूरंड रेखा विवाद — सीमा पर बाड़बंदी और सैनिकों की तैनाती को लेकर बार-बार झड़पें होती रही हैं।
♦️TTP (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) — पाकिस्तान का आरोप है कि अफगान तालिबान सरकार TTP के आतंकियों को अपनी जमीन पर पनाह दे रही है, जो पाकिस्तान के अंदर हमले करते हैं। काबुल इससे इनकार करता रहा है।
♦️सीमा पार सैन्य कार्रवाई — पाकिस्तान की तरफ से अफगान सीमा में हवाई हमलों की खबरें आती रही हैं, जिनका अफगान तालिबान सरकार कड़ा विरोध करती है और इसे "संप्रभुता का उल्लंघन" बताती है।
♦️शरणार्थी मुद्दा — पाकिस्तान द्वारा लाखों अफगान शरणार्थियों को वापस भेजे जाने से भी कड़वाहट बढ़ी है।
नतीजा यह हुआ कि जो तालिबान कभी पाकिस्तान की मदद से सत्ता में आया माना जाता था, वही तालिबान सरकार अब इस्लामाबाद से सबसे ज्यादा दूरी बना चुकी है — और भारत की तरफ हाथ बढ़ा रही है।
📍 पाकिस्तान में गुस्सा और अफगान एक्टिविस्ट का जवाब📍
जैसे ही ओमरी का "डीएनए" वाला बयान वायरल हुआ, पाकिस्तान में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई। कई पाकिस्तानी सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे तालिबान सरकार का "कृतघ्न" रवैया बताया — यह याद दिलाते हुए कि पाकिस्तान ने दशकों तक अफगान शरणार्थियों को शरण दी और तालिबान आंदोलन को समर्थन भी दिया था।
🫵 इसी बहस के बीच एक अफगान सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्हें फजल अफगान के नाम से जाना जाता है, ने पाकिस्तान की आलोचना का जवाब दिया। उनका कहना था कि पाकिस्तान भारत-अफगान रिश्तों को हमेशा धर्म के चश्मे से — मुस्लिम बनाम हिंदू — देखने की कोशिश करता है, जबकि आम अफगान नागरिकों के लिए यह मसला धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक-सांस्कृतिक जुड़ाव और भरोसे का है।
👉 यह प्रतिक्रिया इस बात को दिखाती है कि यह विवाद अब सिर्फ सरकारी स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि आम जनता और सोशल मीडिया तक फैल चुका है — जहां हर पक्ष अपनी-अपनी कहानी गढ़ रहा है।
📍 इसका बड़ा मतलब क्या है? 📍
अब जरा बड़ी तस्वीर देखते हैं।
तालिबान सरकार के लिए भारत की तरफ झुकाव के पीछे ठोस व्यावहारिक वजहें हैं — आर्थिक तंगी से जूझते अफगानिस्तान को निवेश, कृषि तकनीक और व्यापार के नए रास्ते चाहिए, और भारत एक बड़ा, सक्षम साझेदार है जिसने पहले भी मदद की है।
🫵 भारत के लिए भी यह मौका क्षेत्रीय संतुलन साधने का है — बिना औपचारिक मान्यता दिए, अफगान जनता और वहां के संसाधनों तक पहुंच बनाए रखने का।
🫵 लेकिन इसे सिर्फ "भारत बनाम पाकिस्तान" या "हिंदू बनाम मुस्लिम" जैसे सरल खांचों में देखना गलत होगा। असल कहानी कहीं ज्यादा जटिल है — सीमा विवाद, आतंकवाद के आरोप-प्रत्यारोप, आर्थिक मजबूरियां और क्षेत्रीय भू-राजनीति, यह सब मिलकर इस पूरे घटनाक्रम को आकार दे रहे हैं।
📍तो एक मंत्री का भावुक बयान असल में एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव की झलक भर है — जहां दशकों पुराने समीकरण बदल रहे हैं, और दक्षिण एशिया की सियासत नए मोड़ पर खड़ी है।
आने वाले महीनों में देखना दिलचस्प होगा — क्या यह नजदीकी सिर्फ बयानों तक सीमित रहती है, या ठोस आर्थिक और कूटनीतिक नतीजों में बदलती है।📍
14/07/2026
📌 पवार की पार्टी में सेंध? 5 विधायक NDA की तरफ, सुले का सीधा इनकार 📌
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आया हुआ है। सवाल यह है — क्या शिवसेना (UBT) के बाद अब शरद पवार की पार्टी NCP-शरदचंद्र पवार में भी टूट होने वाली है? क्या उनके विधायक कांग्रेस के बजाय NDA का दामन थामने की तैयारी में हैं? पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने इन सभी अटकलों को सिरे से खारिज किया है, लेकिन सवाल है — आग के बिना धुआं कैसे उठा? आइए, इस लेख में पूरी कहानी को सिलसिलेवार समझते हैं।
📍 NCP SP में टूट की अटकलें शुरू कहां से हुईं 📍
यह सारी चर्चा शुरू हुई जून महीने में, जब शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में जाने की खबरें सामने आईं। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें तेज हो गईं कि अगला नंबर NCP-शरदचंद्र पवार का हो सकता है।
👉 इस बीच पार्टी विधायक धर्मराव अत्राम ने दावा किया कि पार्टी के पांच सांसद विरोधी खेमे यानी NDA में जाने की तैयारी में हैं। शरद पवार और सुप्रिया सुले ने तुरंत इस दावे को झूठा बताया। सुले ने तो अत्राम को चुनौती तक दे दी कि वे उन पांच सांसदों के नाम सार्वजनिक करें।
लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी।
📍 शिंदे-पवार मुलाकात ने आग में घी डाला 📍
8 जुलाई को महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद पर विधान भवन में हुई एक बैठक के बाद, शरद पवार अपनी पार्टी के विधायकों के साथ डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के कक्ष में मिले। यह मुलाकात सामान्य लग सकती थी, लेकिन इससे पहले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े और NCP-SP के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल के बीच भी एक गुपचुप मुलाकात की खबर आई थी।
🫵 इन दोनों मुलाकातों ने कयासों को और हवा दे दी। सूत्रों की मानें तो पार्टी के कुल 10 विधायकों में से पांच अब NDA यानी सत्ताधारी महायुति गठबंधन के साथ जाने की तैयारी में हैं।
📍 विधायक NDA क्यों चाहते हैं — असली वजह 📍
यहां सबसे दिलचस्प और व्यावहारिक पहलू आता है। जो विधायक NDA के पक्ष में बताए जा रहे हैं, उनका तर्क राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा जमीनी जरूरतों पर टिका है👇
♦️विपक्ष में रहकर काम कराना मुश्किल है — फंड और मंजूरी दोनों अटकते हैं
♦️अगर पार्टी महायुति यानी सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बनती है, तो अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों के लिए डेवलपमेंट फंड और एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रूवल आसानी से मिल सकेंगे
♦️2027 के आने वाले स्थानीय निकाय और अन्य चुनावों को देखते हुए विधायक अपने क्षेत्र में विकास कार्य दिखाना चाहते हैं
🫵 यानी यह सिर्फ विचारधारा की लड़ाई नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में बने रहने और अपने मतदाताओं को जवाबदेह होने की व्यावहारिक राजनीति भी है।
📍 पार्टी नेतृत्व का पक्ष — सुप्रिया सुले का खंडन 📍
पार्टी नेतृत्व की तरफ से इन सभी अटकलों को बार-बार नकारा गया है। 10 जुलाई को सुप्रिया सुले ने स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी का न तो NDA में शामिल होने का कोई इरादा है, और न ही कांग्रेस में विलय की कोई योजना है। उन्होंने इसे "अफवाह" करार दिया।
👉 वहीं, पार्टी नेता रोहित पवार ने भी इन खबरों को बेबुनियाद बताते हुए खारिज किया — उनके मुताबिक, न कांग्रेस में विलय, न NDA में शामिल होना, न ही बाहर से समर्थन देने का कोई सवाल है।
🫵 शरद पवार खुद भी सख्त लहजे में कह चुके हैं कि उनकी पार्टी का एक भी सांसद या विधायक पाला नहीं बदलेगा।
📍 तो असलियत क्या है? 📍
यहां पर स्थिति साफ तौर पर दो कहानियों में बंटी नजर आती है:
🔶 पहली कहानी (सूत्रों और अटकलों की): पार्टी के अंदर बेचैनी है, कुछ विधायक सत्ता के करीब जाना चाहते हैं, और शिंदे-तावड़े जैसी मुलाकातें इसी दिशा में इशारा करती हैं।
🔶 दूसरी कहानी (पार्टी नेतृत्व की): यह सब सिर्फ राजनीतिक अफवाहें हैं, पार्टी पूरी तरह एकजुट है, और विपक्षी खेमा जानबूझकर ऐसी खबरें फैला रहा है ताकि पार्टी कमजोर दिखे।
🫵 जब तक कोई विधायक खुद खुलकर सामने नहीं आता या औपचारिक रूप से पाला नहीं बदलता, तब तक इसे पुख्ता तौर पर "टूट" नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि बार-बार हो रही मुलाकातें और खंडन का यह सिलसिला बताता है कि महाराष्ट्र की सियासत में कुछ न कुछ पक रहा जरूर है।
📍आने वाले हफ्तों में, खासकर महाविकास अघाड़ी की बैठकों और आगामी चुनावी हलचल के बीच, यह साफ हो सकता है कि यह सिर्फ अटकलें थीं या वाकई NCP-SP में कोई बड़ी टूट होने वाली है।📍
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