Keertihas
12/01/2026
स्वामी विवेकानंद जी की जयंती तथा राष्ट्रीय युवा दिवस पर हार्दिक मंगलकामनाएँ
स्वामी विवेकानंद: भारतीय बौद्धिक परंपरा के सच्चे प्रतिनिधि
दुनिया के इतिहास में धर्म और संप्रदाय को समृद्ध करने का, उनको बचाने का और पुनर्जीवित करने का श्रेय धर्मसुधार आंदोलनों और उनके प्रणेताओं को जाता है। कट्टरपंथी लोग धर्म का छद्म रूप ही समाज के समक्ष रखते हैं, और वे प्राय: उसी धर्म का सबसे बड़ा अहित करते हैं, जिस धर्म के हितैषी होने का वो दावा करते हैं। अतः अपने धर्म एवं संस्कृति में सुधार से हम खुद को बेहतर और वैश्विक बनाते है और दूसरे धर्म के आधार पर शोषण और निंदा से संकीर्णता और कट्टरता का मार्ग प्रशस्त होता है। यह नियम सभी धर्म और संप्रदाय पर लागू होता है। आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म, दर्शन, पद्धतियों और मान्यताओं को शुद्ध कर भारतीय धर्म की मूल अवधारणा को वस्तुनिष्ठ, औचित्यपूर्ण, मानवीय और तार्किक आधार प्रदान किया। विवेकानंद उसी परम्परा का निर्वहन आधुनिक भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी करते हैं। विश्व धर्म परिषद् शिकागो के उद्घाटन सत्र में 11 सितम्बर, 1893 को उन्होंने अपना परिचय देते समय जब अमेरिकीवासियों को बहनों एवं भाइयों शब्द से संबोधित किया, तो वे उस विशाल जनसमूह में प्रत्येक हृदय को आनंदित कर गए। इस सम्बोधन में दो आदर्श भाव निहित थे, प्रथम स्त्रियों को प्राथमिकता और द्वितीय सारा विश्व एक परिवार है की भावना। स्वामी जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सभी धर्मो को मान्यता प्रदान करने की शिक्षा दी है l हम सहिष्णुता में मात्र विश्वास नहीं रखते है बल्कि समस्त धर्मो को सच्चे मन से ग्रहण करते हैं l स्वामी जी ने कहा कि मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का भी अभिमान है, जिसने इस धरती की समस्त पीड़ित और शरणागत जातियों तथा विभिन्न धर्मो के बहिष्कृत अनुयायियों को आश्रय दिया है l अपने औपचारिक उदघाटन उद्बोधन को समाप्त करते समय दुनिया के लिए उनका सन्देश था- "साम्प्रदायिकता, संकीर्णता और इनसे उत्पन्न भयंकर उन्माद इस सुन्दर धरती पर बहुत समय तक राज कर चुकी है, इनके घोर अत्याचार से पृथ्वी भर गयी है, इन्होंने अनेक बार धरती को रक्तरंजित किया है, सभ्यता नष्ट कर डाली तथा समस्त जातियों को हताश कर डाला है यदि यह सब न होता तो मानव समाज आज की अवस्था से कही अधिक उन्नत हो गया होता, पर अब उनका भी समय आ गया है और मैं पूर्णरूपेण आशान्वित हूँ कि जो घंटे आज सुबह इस सभा के सम्मान में बजाये गए है, वे समस्त कट्टरताओं, लेखनी के बल पर किये जाने वाले समस्त अत्याचारों तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं के लिए मृत्युनाद ही सिद्ध होंगे", उनके सरल किन्तु ज्वलंत शब्दों, उज्जवल मुखमण्डल एवं महान व्यक्तित्व ने श्रोताओं पर ऐसा प्रभाव डाला कि दूसरे दिन अमेरिकन समाचार पत्रों ने उन्हें धर्म महासभा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि घोषित कर दिया l 19 सितम्बर 1893 में अपने मुख्य उदबोधन में स्वामी जी ने हिन्दू धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की वैश्विक व्याख्या प्रदान कर सभी प्रतिनिधियों सहित श्रोताओं का दिल जीत लिया l हिन्दू धर्म में वेद- उपनिषद- सृष्टि- ऋषि- आत्मा-पुनर्जन्म- कर्मवाद-अहैतुक भक्ति- मूर्तिपूजा और धर्म के वास्तविक स्वरुप की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि एक हिन्दू की सारी भावना प्रत्यक्ष अनुभूति या साक्षात्कार है l मूर्तियाँ, मंदिर, गिरजाघर, मस्जिद या शास्त्र-ग्रन्थ तो धर्म जीवन की बाल्यावस्था में केवल सहायक मात्र है, पर मानव को उत्तरोत्तर उन्नति करनी ही चाहिए l साधक को कहीं भी रूकना नहीं चाहिए l उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद के सूत्र "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" का प्रयोग किया जिसका अर्थ है "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए", जिसे स्वामी विवेकानन्द ने आध्यात्मिक जागृति और आत्म-साक्षात्कार के आह्वान के रूप में लोकप्रिय बनाया। स्वामी जी का मत है कि मूर्ति पूजा सबसे नीचे की अवस्था है और आगे बढ़ने का प्रयास करते हुए मानसिक प्रार्थना साधना की दूसरी अवस्था है, किन्तु सबसे उच्च अवस्था तो वह है जब परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाये l स्वामी जी के अनुसार 'हिन्दू धर्म की दृष्टि में मनुष्य असत्य से सत्य की ओर नहीं जा रहा, वह तो सत्य से सत्य की ओर अर्थात निम्न श्रेणी के सत्य से उच्च श्रेणी के सत्य की ओर अग्रसर हो रहा है l हिन्दू धर्म के मतानुसार सामान्य व्यक्ति के धर्म से लेकर वेदांत के अद्वैतवाद तक जितने भी धर्म के स्वरूप है, वे सभी अपने अपने जन्म तथा अवस्था भेद के अनुसार उस अनंत ब्रह्म के ज्ञान तथा उपलब्धि के उपाय है। आज दुनिया को पुनः धर्म के इसी स्वरुप को समझने की आवश्यकता है - धर्म वह है जो धारण करने योग्य है "धारयति इति धर्मः"l यह भारतीय ज्ञान पम्परा में धर्म का सरलतम रूप प्रस्तुत करता है, यह पूर्णतः मानवीय और नैसर्गिक संकल्पना हैं। अतः जो मानवीय नहीं है वह धार्मिक नहीं है, साथ ही यदि यह मानवता मात्र एक धर्म और सम्प्रदाय तक सीमित है तो यह संकीर्ण है, अमानवीय है। विवेकानंद अपने हर सन्देश में उसी आदर्श धर्म की संकल्पना प्रस्तुत करते हैं, जिसकी आवश्यकता शाश्वत है। वर्तमान विश्व को इसी शाश्वत धर्म की नितांत आवश्यकता है। विवेकानद दुनिया के युवाओं के सच्चे प्रतिनिधि हैं क्योंकि वह अपने गुरु से भी प्रासंगिक प्रश्न निःसंकोच पूछने का साहस रखते हैं। आलोचनात्मक दृष्टिकोण का विकास शिक्षा, ज्ञान, प्रज्ञा का आधार और प्रस्थान बिंदु हैं। शिक्षा के सम्बन्ध में विवेकानंद यह विश्वास करते हैं शिक्षा मनुष्य में मौजूद पूर्णता का प्रकटीकरण है, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अपने सैद्धांतिक परिपेक्ष्य में विवेकानंद, गाँधी, टैगोर और भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर बना शानदार ड्राफ्ट है, विधायिका भी इसको समयानुसार लागु कर अपने दायित्व का निर्वहन कर चुकी है, कार्यपालिका का कार्य अद्यतन प्रक्रियागत है और इसके अनुपालन की चुनौती ऐसे ही है कि भारत दुनिया में सबसे बेहतर नीतियां बनाने वाला देश है, परन्तु हमें नीतियों को सही परिपेक्ष्य में लागु करना हमें सीखना होगा। आज भारतीय नौकरशाही को विशेषज्ञों के निर्देशन की नितांत आवश्यकता है, तभी हम विवेकानंद के सपनो का भारत बना पाएंगे और शिक्षा उसकी पहले कुंजी है। विवेकानंद पश्चिम के लिए आधुनिक भारत के पहले अनौपचारिक राजदूत हैं जो भारतीय उत्कृष्ट प्रतिभा का परिचय पश्चिम को करते हैं। हार्वर्ड प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट अगस्त 1893 में बोस्टन में विवेकानंद से मुलाक़ात करने के बाद स्वामी जी बारे में धर्म संसद के आयोजकों को लिखते हैं - "यह एक ऐसे व्यक्ति हैं जो हमारे सभी विद्वान प्रोफेसरों को मिलाकर भी उनसे ज़्यादा ज्ञानी हैं।" जो भी दुनिया में विवेकानंद से मिला वह उनका मुरीद हो गया, यह उनकी प्रतिभा और पवित्रता का प्रभाव था। विवेकानंद आधुनिक युग में उत्तर आधुनिक युग के प्रतिनिधि थे, महान लोग अपने समय से आगे के व्यक्ति होते हैं। सामान्य व्यक्ति सैद्धांतिक रूप में अपने को वैश्विक नागरिक मानते हैं पर इस पर प्राय: पूर्णतः विश्वास नहीं रखते, इसीलिए आंतरिक सदभाव उनके अंदर नहीं आ पाता है, जो परम आवश्यक है। विवेकानंद महोपनिषद के सूत्र पर पूर्णत विश्वास रखते हैं जो इस प्रकार है- अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम्।। यह श्लोक एक विस्तृत और गहन समझ प्रदान करता है कि जिनकी सोच और समझ व्यापक होती है, वे दुनिया को एक परिवार की तरह देखते हैं, इसके विपरीत, संकीर्ण सोच वाले लोग "ये मेरा है, और ये दूसरों का है" जैसे वर्गों में बांट देते हैं। स्वामी विवेकानंद के अनुसार प्रत्येक आत्मा में दिव्यता निहित है और सामाजिक समानता की नींव इसी सिद्धांत पर टिकी होनी चाहिए। नव वेदांत कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति में वही दिव्यता निहित है चाहे उसकी जाति धर्म या नस्ल कुछ भी हो, अतः किसी भी प्रकार का जातीय अथवा नस्लीय भेद आत्मिक दृष्टि से निरर्थक है और यह ही सामाजिक समानता की नींव है, विवेकानंद के अनुसार धर्म का उद्देश्य केवल आत्मा की मुक्ति ही नहीं है अपितु समाज की सेवा एवं प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा का भी है। विवेकानन्द द्वारा प्रस्तुत यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है कि किसी भी धर्म, संप्रदाय या समुदाय का मर्म उसकी बाह्य पहचान में नहीं, बल्कि उसमें निहित आध्यात्मिक मूल्य और सत्य की खोज में है। धार्मिक मतभेदों की सतही सीमाओं से ऊपर उठकर, मनुष्य को यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि सत्य की प्राप्ति और जीवन का अंतिम उद्देश्य सभी के लिए समान है। यही विचार समस्त मानवता के कल्याण की दिशा में एक सकारात्मक और सार्वभौमिक मार्ग प्रदान करता है। राष्ट्रीय युवा दिवस पर भारत सरकार प्राय एक थीम निश्चित करती है जिससे युवाओं को सही दिशा मे निर्देशित किया जा सके । भारत की 50% से ज़्यादा आबादी 25 साल से कम उम्र की है और 65% से ज़्यादा आबादी 35 साल से कम उम्र की है। 2020 में, एक भारतीय की औसत उम्र 29 साल थी, जबकि चीन में यह 37 साल और जापान में 48 साल थी। स्वामी विवेकानंद ने भारत को बदलने के लिए 100 समर्पित युवाओं की आवश्यकता की बात कही थी, काश भारतीय युवा इस दिशा में सोचकर स्वामी जी के विचारों का भारत बनाने का सार्थक प्रयास करें जो छद्म एवं सतही चेतना के स्थान पर जीवन के सभी क्षेत्रों में वास्तविक चेतना का विकास करें। विवेकानंद के लिए, दर्शन केवल ग्रंथों और विमर्श तक सीमित अमूर्त चिंतन का विषय नहीं था; यह कर्म करने का आह्वान था। उन्होंने ज्ञान, कर्म, और राज योग एक साथ मिलाकर एक एकीकृत मार्ग बनाया—एक सशक्त और समग्र ढाँचा जिसका लक्ष्य मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास और पूरे समाज का उत्थान था। मै अपने शब्दों के माध्यम से स्वामी जी सादर श्रद्धांजलि ज्ञापित करता हूँ, विश्व में विवेकानंद अपने जन्म के 163 वर्ष और ब्रह्मलीन होने के 123 वर्ष पश्चात आज भी उतने ही प्रसांगिक हैं।
प्रो. किशोर कुमार कीर्तेश@ https://www.facebook.com/kishorkumarkeertesh
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