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17/10/2021

संतमत का अर्थ है - संतो का मत 🌻
इसलिए संत तुलसी साहब ने कहा है-
"संत गुरु और पंथ न जाना। ये ही संत पंथ हित माना।।"
संतों के ज्ञान से अनजान जन का कथन था - "संतो का ज्ञान वेद बाह्य है।" और वेद-ज्ञान-विहीन जन का वचन था कि 'संतों के उच्चतम ज्ञान वेद से हीन है ।' इस भाँति अपनी हीन भावना के कारण वे एक- दूसरे को हीन दृष्टि से देखा करते थे। इस हेतु दोनों के बीच जो हृदय की दूरी बढ़ गई थी - बढ़ती जा रही थी, संतमत इस दूरी को भरपूर दूर करता है अर्थात् उभय के वैमनस्य को मिटाकर परस्पर सामंजस्य स्थापित करता है।
संतमत का उद्घोष है कि संतो और वेदों का आध्यात्मिक-ज्ञान अभिन्न है। अर्थात् पूर्व के संतगण ईश्वर संबंधी ज्ञान जो दे गए हैं और वर्तमान काल में जो संत उस आधार पर ज्ञान दे रहे हैं, वह वेद में विद्यमान है। आवश्यकता है उसकी खोज की। संत कबीर साहब की वाणी में -
जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।
मैं बौरी बूड़न डरी, रही किनारे बैठ॥
ऋषियों एवं संतों की वाणी का अध्ययन और अनुशीलन करने पर परस्पर अद्भुत साम्य का बोध होता है। संत दादू दयाल जी की उदात्त भावना में हम कह सकेंगे -
जे पहुँचे ते कहि गये, तिनकी एकै बाति।
सबै सयाने एक मत, तिनकी एकै जाति।।
परम प्रभु सर्वेश्वर ने देखने के लिए सबको दृष्टि दी है। देखते सभी हैं; किंतु अपनी-अपनी दृष्टि से। अर्थात् अपने अर्जित ज्ञान के आधार पर ही देखते हैं - देख सकते हैं।
मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों के दृष्टिकोण में भिन्नता हो सकती है; परंतु वस्तुतः तत्व एक ही है । इसी तरह संतों एवं ऋषियों का ज्ञान एक ही है, आज भले ही हम उसे भिन्न-भिन्न दृष्टियों से देखें; किंतु मैं तो दृढ़तापूर्वक कहूँगा कि संतों एवं ऋषियों का ज्ञान एक है और उन्हें देखने के लिए हमको उनकी ही दृष्टि अपनानी आवश्यक है अर्थात् उन ऋषियों एवं संतो की पूत वाणी की अभिज्ञता के लिए हमारी दृष्टि पवित्र होनी चाहिए। हम विवेक-विलोचन प्राप्त कर ही उनकी वाणियों के यथार्थ रूप का अवलोकन कर पाएँगे, अन्यथा नहीं।
अतएव आवश्यकता है हम उनकी वाणियों का अध्ययन, श्रवण और मनन करें। उनके शब्दार्थो और गूढ़ाशयों को जानें। साथ ही संतों के परिभाषिक शब्दों, उनके रहस्य वाणियों और तत्संबंधी साधना का परिज्ञान कर नित्य नियमित रूप से निदिध्यासन भी करें।
- संत सद्गुरु महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज

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