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शुरु से ही मनुष्य अपनी इच्छाओं का दास रहा है। आदिकाल में उसकी इच्छाएं और आवश्यकताएं सीमित थीं। लेकिन सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान के विकास के साथ-साथ उसकी आवश्यकताएं बढ़ती गईं। इससे संसार में उपयोगितावाद, उपभोक्तावाद और भौतिकवाद का जन्म हुआ। भौतिकवाद जीवन की ऐसी पद्धति है जो सुख-सुविधाओं, भोग-विलास और आधुनिक संसाधनों से परिपूर्ण होती है।आज मनुष्य का जीवन यंत्रों और उपकरणों पर निर्भर हो गया है। मनुष्य को आवश्यकताओं के अनुकूल ग्रहण करना चाहिए। सादगी को अपनाए बिना सुख-शांति प्राप्त नहीं की जा सकती। जब तक और अधिक पाने की लालसा बनी रहेगी, तब तक मनुष्य अन्य जीवों का हितैषी नहीं बन सकता।लेकिन जैसे ही वह सादगी अपनाकर अपनी आवश्यकताओं को समेट लेता है, उसके लिए संरक्षक की मूल भूमिका निभाना संभव हो जाता है। इस प्रकार यह प्रयास ही आध्यात्मिक विकास है। अध्यात्म मानव जीवन में संतुलन लाता है,घर-गृहस्थी में तालमेल बैठाना सिखाता है। आध्यात्मिक ज्ञान मानव को पतन की ओर अग्रसर होने से रोकता है। भौतिकता के कारण इंसान के अंदर जो अंधकार उत्पन्न हुआ है, उसे अध्यात्म के प्रकाश से ही दूर किया जा सकता है। आध्यात्मिक ज्ञान ही उसे यह समझाने में सहायक हो सकता है कि इस जगत का असली सृष्टिकर्ता और सर्वेसर्वा ईश्वर ही है। मानव तो उसकी एक रचना मात्र है। यहां तक कि उसका जीवन भी नश्वर है और एक न एक दिन सब नष्ट हो जाएगा।अध्यात्म स्वयं को सुधारने, जानने और संवारने का मार्ग है। यह स्वयं का अध्ययन है और भाव संवेदनाओं का जागरण है, आत्म तत्व का बोध है, धर्म का मर्म है और स्व का ध्यान है। इसलिए धर्म कोई भी हो, लेकिन सभी को आध्यात्मिक अवश्य होना चाहिए। वही जीवन का मूल है।
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