Bhavya Motivation
“मैं Vikas हूँ… और मैं तुम्हें एक कड़वी सच्चाई सुनाने आया हूँ”
(एक जागरूकता का संदेश — हर समाज और हर नागरिक के नाम)
मेरा नाम Vikas है।
हर इंसान चाहता है कि उसका शहर, उसका मोहल्ला, उसका कस्बा, उसका समाज—
आगे बढ़े, तरक्की करे।
लेकिन एक कटु सत्य है—
मैं अक्सर हार जाता हूँ।
और मेरी हार की वजह सिर्फ अवसरवादी नेता ही नहीं…
बल्कि वे लोग भी हैं जिनकी एक गलत आदत मुझे हर बार कमजोर कर देती है।
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जब समाज अपना वोट अवसरवादी नेताओं को बेच देता है… तभी मैं मर जाता हूँ
चुनाव आते ही ये अवसरवादी नेता सक्रिय हो जाते हैं—
• कहीं शराब बाँटी जाती है,
• कहीं पार्टियाँ करवाई जाती हैं,
• कहीं 200–500 रुपये में वोट खरीद लिए जाते हैं।
और नतीजा?
अवसरवादी नेताओं की जीत… और मेरा हार जाना।
जैसे ही वे जीतते हैं, उसी दिन से मेरा पतन शुरू हो जाता है।
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जब अवसरवादी नेता जीत जाता है… तो असली Vikas कैसे टुकड़ों में बिखरता है?
चुनाव में जो पैसे उड़ाए जाते हैं,
वह सत्ता में आने के बाद योजनाओं, सड़क निर्माण के टेंडरों
और सार्वजनिक कार्यों से वसूले जाते हैं।
• जहाँ अच्छी गुणवत्ता का सीमेंट और लोहा लगना चाहिए—
वहाँ घटिया सामग्री लगा दी जाती है।
• जो सड़क पाँच साल चलनी चाहिए—
वह पहली ही बरसात में टूट जाती है।
• जिन भवनों को दशकभर टिकना चाहिए—
वे कुछ ही वर्षों में जर्जर नज़र आते हैं।
क्योंकि जो पैसा मुझ पर—अर्थात Vikas पर—लगना था,
वह बीच में ही निगल लिया जाता है।
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मंदिर, स्कूल, सड़क — जगह कोई भी हो… खेल एक ही है
कुछ स्थानों पर हालात और भी भयावह हैं।
मंदिर निर्माण के नाम पर सरकार से राशि स्वीकृत होती है—
मान लीजिए 10 लाख रुपये।
लेकिन वास्तविक खर्च होता है मात्र 5 लाख।
फिर जनता से कहा जाता है:
“10 लाख पूरे लग गए, अब आगे के काम के लिए चंदा दीजिए।”
श्रद्धालु जनता 2–3 लाख रुपये और जमा कर देती है।
मंदिर बनता भी है…
लेकिन उसके भव्य द्वार पर नाम लिखा जाता है उसी व्यक्ति का,
जिसने आधा पैसा लगाकर पूरा श्रेय ले लिया।
यही है वह तरीका,
जिससे मेरे नाम पर—Vikas के नाम पर—
कोई और अपना ही विकास करता है।
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लोगों को सोचना होगा – इतने वर्षों में हुआ क्या?
कई स्थानों पर नेता वर्षों तक पदों पर बने रहे—
10 साल… 15 साल…
कभी कोई मंत्री बना, कभी कोई विधायक,
कभी केंद्र सरकार में, तो कभी राज्य सरकार में।
लेकिन सोचिए—
अगर इतने लंबे समय तक वही लोग सत्ता में थे,
तो क्षेत्र की तस्वीर क्यों नहीं बदली?
तरक्की के रास्ते बंद क्यों रहे?
सड़कें आज भी वैसी ही क्यों हैं?
और अब, चुनाव आने पर फिर वही अवसरवादी नेता कहते घूम रहे हैं:
“हमें एक मौका और दीजिए, हम अगले पाँच साल में सब बदल देंगे।”
क्या हमने उन्हें पहले मौके नहीं दिए थे?
क्या यह वही लोग नहीं हैं
जो अब क्षेत्र की खराब हालत की तस्वीरें दिखाकर
हमारे मन में डर फैला रहे हैं?
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अवसरवादी नेता लोग एक-दूसरे की पोल खोलते हैं… पर सच में सब साथ ही होते हैं
चुनाव के मौसम में
एक नेता दूसरे की कमियाँ बताता है,
दूसरा पहले की।
यह लड़ाई जनता के लिए नहीं होती—
यह लड़ाई सिर्फ अपने फायदे के लिए होती है।
क्योंकि सच यह है—
इस खेल में ईमानदारी सबसे दुर्लभ गुण है।
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अब Vikas तुमसे कह रहा है — बदलाव कैसे आएगा?
① अपना बहुमूल्य वोट बेचना बंद करो
यहीं से पूरी समस्या शुरू होती है।
जब कोई व्यक्ति पैसे देकर वोट खरीदता है,
तो जीतने के बाद गर्व से कहता है:
“मैंने वोट खरीदे हैं।”
और ऐसा नेता हमेशा अपने ही लाभ के लिए काम करता है—
जहाँ उसका फायदा हो, वहीं रुचि लेता है।
फिर शुरू होता है
“खर्च की रिकवरी” का खेल—
जिसमें असली नुकसान मेरा होता है… Vikas का।
ईमानदार लोग चुनाव में पैसे नहीं उड़ाते,
इसलिए वे हर बार चुनाव में नहीं कूदते।
लेकिन जो पाँच साल में करोड़ों कमाना चाहते हैं—
वही हर बार तैयार खड़े मिलते हैं।
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② अगर कोई वादा करता है — तो उसे लिखित में लो
अगर कोई कहता है:
• सड़क बनेगी,
• स्कूल सुधरेगा,
• अस्पताल बेहतर होगा,
• पानी आएगा,
• रोज़गार बढ़ेगा—
तो उसे कागज पर लिखवाओ,
उसके हस्ताक्षर लो।
और जीतने के बाद
समय सीमा पूरी होने पर
उसे उन वादों की याद दिलाना—यह तुम्हारा अधिकार है।
अगर फिर भी काम न हो—
तो उस लिखित वादे के आधार पर
कानूनी कार्रवाई बिल्कुल संभव है।
वादे हवा में नहीं होने चाहिए—
वादों को जवाबदेही से बंधा होना चाहिए।
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अंत में – Vikas का संदेश
मेरे प्यारे भाइयों और बहनों,
मैं कोई शहर, समाज या क्षेत्र नहीं—
मैं तुम्हारा भविष्य हूँ।
जब तुम जागरूक होते हो—
मैं मजबूत होता हूँ।
जब तुम बिक जाते हो—
मैं हार जाता हूँ।
मुझे जीतना है—
तो जागरूकता को जीतना होगा,
ईमानदारी को जीतना होगा,
और जवाबदेही को जीतना होगा।
जब समाज जागरूक होगा…
तभी सच्चा Vikas जन्म लेगा।
Writer : Author Niraj Kumar ✍
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