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16/06/2012
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05/05/2012
Ajit Anjum, Managing Editor News 24 is known for his straight forward talk, aggressive discussions and in your face questions. Ajit is a seasoned jour...nalist with a plethora of experience and needs no introduction in the world of news
“मैं बच्चों से बहुत बातचीत करता हूं। जो न्यूकमर होते हैं, मैं उससे दस-बीस सवाल जरूर करना चाहता हूं। ऐसी सभा सेमिनारों में जो बात होती है, छन कर मेरे पास पहुंचती है कि हमलोग पापी किस्म के लोग हैं जो चैनल को पतन की गर्त में ले जा रहें हैं तो हम जानना चाहते है कि जो बच्चे आतें हैं वे क्या सीख कर आ रहें हैं। माफ करें जो बच्चे अलग-अलग पत्रकारिता संस्थान से जो पढ़ के आतें हैं, अब उनसे आप अगर राजनीतिक हालत पर सवाल करें तो बहुत बड़ी चीज होती है। न्यूक्लियर डील जब सांसद को ही नहीं पता कि ये क्या चीज है तो बच्चों का क्या कसूर है। अगर ये पूछ दें की पांच मुख्यमंत्री के नाम बताएं तो उनको ये भी पता नहीं होता। दस में आठ बच्चे नहीं जानतें हैं। आप अगर नानावती पूछें तो वे बताते हैं कि राजस्थान का कोई रेलवे स्टेशन है। अब सवाल उठता है कि ऐसे बच्चे जब आ रहे हैं तो फिर जहां से पैदा होके आ रहें हैं और जो बहुत शॉटकट पत्रकारिता में आना चाह रहे हैं और जो सिर्फ एंकर या रिपोर्टर बनने के लिए और पहले, दूसरे या छठे महीने में मारुति, आल्टो या स्विफ्ट कार का सपना लिये हुए आते हैं वे भी जिम्मेवार हैं। शुरूआत वहां से होनी चाहिए।“
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Mohalla Live » Blog Archive » माफ कीजिए, इस हमाम में हम सब नंगे हैं! बीएजी फिल्म्स की समाचार सेवा न्यूज़ 24 के मुखिया अजीत अंजुम ने यह लेक्चर आईआईएमसी में क़रीब डेढ़ साल पहले दिया था। लेक्चर में उन्होंने उस बाज़ारू पत्रकारीय स्थापना की व्याख्या की थी और समर्थन भी किया था, जिसके मुताबिक जो बिकता है, वही बचता है। यानी जो रचता है, उसके बचने की गुंजाइश इस कॉरपो...
02/05/2012
Introspection of Media by Media. Here is blog written by well known TV Journalist Punya Prasson Vajpai.
“बीते साठ बरस में हर राजनीतिक प्रयोग के साथ साथ मीडिया या कहें पत्रकारिता ने भी नायाब प्रयोग किये। पत्रकारिता ने भी आर्थिक सुधार के इस दौर में बाजार और मुनाफे का पाठ ही पढ़ना शुरु किया। जिस राजनीतिक सत्ता पर उसे निगरानी रखनी थी, उसी सत्ता की चाटुकारिता उसके मुनाफे का सबब बनी। और पत्रकारिता झटके में मीडिया में तब्दील होकर धंधे और मुनाफे का सच टटोलने लगी। धंधा बगैर सत्ता की सुविधा के हो नहीं सकता और राजनीति बगैर मीडिया के चल नहीं सकती। इस जरुरत ने बाजारवादी धंधे में मीडिया और राजनीति को साझीदार भी बनाया और करीब भी पहुंचाया।
पत्रकार भी इटंरप्नयूर बनने लगा। जो पत्रकारिता शिखर पर पहुंचकर राजनीति का दमन थामती थी और पत्रकार संसद में नजर आते उसमें नयी समझ कारपोरेट मालिक बनने की हुई। क्योंकि राजनीति बाजार के आगे नतमस्तक तो बाजार में मीडियाकर्मी की पैठ उसे राजनीति से करीबी से कहीं ज्यादा बड़ा कद देती। किसी मीडिया संस्थान में बतौर पत्रकार काम करने से बेहतर खुद का संस्थान बनाने और धंधे में सीधे शिरकत करने वाले को ही सफल मीडियाकर्मी माना जाने लगा। “
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