palash ke phool
पितृ दिवस पर....
आज पितृ दिवस पर
एक बात मन में आई है।
माँ तो अपनी ममता की
दे देती कभी- कभी दुहाई हैं
पर पिता मूक रहकर भी
कभी देते नहीं गवाही है।
वे
भले प्यार का सागर न दिखते हों
पर मूक प्रेम की परछाईं हैं।
घर के कोने – कोने में
अप्रत्यक्ष उनकी हस्ती छाई है।
शब्दों में कभी बयां न करते
कड़ी जिम्मेदारियों का बोझ उठाते
ऐसे पिता की क्या बात करें
बच्चों को देते वे
सारी खुशियाँ हो मौन
ऐसा भला इस दुनिया में
कर सकता है कौन?
माना वे रोटी नहीं सेंकते
पर घर की रीढ़ वो बनते
अदृश्य रहकर हर फर्ज निभाते
अपना दर्द किसी को न दिखाते
घर- परिवार की है शान
मुझे अपने पिता पर है अभिमान
माना अब वो नहीं हैं साथ
परछाईं उनकी है मेरे हाथ
उनके त्याग – बलिदान का मैं
आज करती हूँ गुणगान
आज उनके नक्शे कदम पर
चलती हूँ इस दुनिया में सीना तान
नमन तात! नमन
तुम पर मेरी सारी खुशियाँ कुर्बान
भर आते हैं नयन
जब- जब करुँ तुम्हारा सुमिरन।।
- मीरा ठाकुर
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