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26/10/2025
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माटी जोड़ा माटी घोड़ा माटी दा असवार
माटी माटी नूं दौड़ाए माटी दा खड़कार

माटी कुदम करेंदी यार
माटी माटी नूँ मारन लग्गी माटी दे हथ्यार

जिस माटी पर बहुती माटी तिस माटी हंकार
माटी कुदम करेंदी यार

माटी बाग़ बगीचा माटी माटी दी गुलज़ार
माटी माटी नूं वेखण आई माटी दी ऐ बहार

माटी कुदम करेंदी यार
हस्स खेड मुड़ माटी होई माटी पायों पसार

'बुल्ल्हा' इह बुझारत बुझ्झें लाह सिरों भोएँ मार
माटी कुदम करेंदी यार

------ बुल्ले शाह--------

बुल्ले शाह के इस भजन "माटी कुदम करेंदी यार" का विस्तार से अर्थ और व्याख्या निम्नलिखित है:

पहली पंक्ति: माटी जोड़ा, माटी घोड़ा, माटी दा असवार
अर्थ: मिट्टी का घोड़ा है, मिट्टी का कपड़ा (वस्त्र/सजावट) है, और मिट्टी का ही सवार है।

व्याख्या: बुल्ले शाह यहां जीवन की नश्वरता को दर्शा रहे हैं। घोड़ा (जिस पर सवारी होती है), जोड़ा (सुंदर कपड़े या साज-सज्जा), और सवार (मनुष्य स्वयं) — सब मिट्टी से ही बने हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि जो कुछ भी हम अपना मानते हैं — हमारा शरीर, हमारी संपत्ति, हमारी पहचान — सब प्रकृति (मिट्टी) का ही हिस्सा है।

दूसरी पंक्ति: माटी माटी नूं दौड़ाए, माटी दा खड़कार
अर्थ: मिट्टी मिट्टी को दौड़ा रही है, और खड़खड़ाहट (घोड़े की टापों की आवाज़) भी मिट्टी की ही है।

व्याख्या: मनुष्य (मिट्टी) घोड़े (मिट्टी) को चाबुक (मिट्टी) से दौड़ा रहा है। यहां तक कि घोड़े की टापों की आवाज़ भी मिट्टी से ही उत्पन्न हो रही है। यह दर्शाता है कि जीवन में सभी गतिविधियां, सभी क्रियाएं, केवल प्रकृति के भीतर ही घटित हो रही हैं — यह सब प्रकृति का ही खेल है।

तीसरी पंक्ति: माटी माटी नूं मारन लग्गी, माटी दे हथियार
अर्थ: मिट्टी मिट्टी को मारने लगी, मिट्टी के ही हथियारों से।

व्याख्या: युद्ध, हिंसा, संघर्ष — सब मिट्टी का ही खेल है। मनुष्य (मिट्टी) हथियार (मिट्टी से बने) उठाकर दूसरे मनुष्य (मिट्टी) को मार रहा है। मृत्यु के बाद दोनों मिट्टी में मिल जाते हैं, तो यह सारा संघर्ष व्यर्थ है।

चौथी पंक्ति: जिस माटी पर बहुती माटी, तिस माटी हंकार
अर्थ: जिस मिट्टी पर बहुत सारी मिट्टी (संपत्ति, धन, पद) इकट्ठी हो जाती है, वही मिट्टी अहंकार है।

व्याख्या: यह पंक्ति अहंकार की जड़ को उजागर करती है। जब मनुष्य (मिट्टी) धन, संपत्ति, पद (सब मिट्टी) इकट्ठा कर लेता है, तो उसे अहंकार हो जाता है कि वह विशेष है। लेकिन वास्तव में यह सब मिट्टी पर मिट्टी का ढेर मात्र है — कुछ भी स्थायी या वास्तविक नहीं।

पांचवीं पंक्ति: माटी बाग बगीचा माटी, माटी दी गुलज़ार
अर्थ: मिट्टी के ही बाग-बगीचे हैं, मिट्टी की ही गुलज़ार (फूलों की बहार) है।

व्याख्या: प्रकृति की सुंदरता — बाग, बगीचे, फूल — सब मिट्टी से ही उत्पन्न होते हैं। जो सौंदर्य हम देखते हैं, वह भी अस्थायी और प्राकृतिक है।

छठी पंक्ति: माटी माटी नूं वेखण आई, माटी दी ऐ बहार
अर्थ: मिट्टी मिट्टी को देखने आई है, और यह बहार (खुशी, उत्सव) भी मिट्टी की ही है।

व्याख्या: मनुष्य (मिट्टी) प्रकृति (मिट्टी) की सुंदरता का आनंद लेने आता है। यह सारा उत्सव, यह सारी खुशी, मिट्टी का ही नाटक है। एक मिट्टी दूसरी मिट्टी को देख रही है और आनंदित हो रही है।

सातवीं पंक्ति: हस्स खेड मुड़ माटी होई, माटी पायों पसार
अर्थ: हंसने-खेलने के बाद फिर मिट्टी हो जाते हैं, पैर पसार कर (मृत्यु की अवस्था में) सो जाते हैं।

व्याख्या: जीवन भर हंसी-खुशी, खेल-कूद में बिताने के बाद, अंततः मनुष्य मिट्टी में मिल जाता है। पैर पसार कर सोना मृत्यु का प्रतीक है — जब शरीर निष्क्रिय हो जाता है और मिट्टी में विलीन हो जाता है।

आठवीं पंक्ति: 'बुल्ल्हा' इह बुझारत बुझ्झें, लाह सिरों भोएं मार
अर्थ: बुल्लेशाह कहते हैं, अगर इस पहेली को समझना है, तो अपने सिर से (अहंकार का) बोझ उतारकर ज़मीन पर पटक दो।

व्याख्या: यह अंतिम पंक्ति भजन का सार है। बुल्ले शाह कहते हैं कि जीवन की इस पहेली को समझने के लिए — कि सब कुछ नश्वर है और मिट्टी से आया है — हमें अपने अहंकार का त्याग करना होगा। "सिर से भार उतारना" का अर्थ है अहंकार, अज्ञान, और भ्रम को त्यागना। जब तक अहंकार है, तब तक यह सत्य समझ में नहीं आएगा।

समग्र संदेश
यह भजन जीवन की नश्वरता और अहंकार की व्यर्थता का गहरा दार्शनिक संदेश देता है। बुल्ले शाह सूफी परंपरा में यह समझाते हैं कि:

सब कुछ प्रकृति (मिट्टी) है: शरीर, संपत्ति, रिश्ते — सब अस्थायी और प्राकृतिक हैं।

अहंकार मिट्टी पर मिट्टी का ढेर है: जो हम इकट्ठा करते हैं, वह भी नश्वर है।

मृत्यु अंतिम सत्य है: सबको मिट्टी में मिलना है।

आत्मज्ञान के लिए अहंकार त्यागना आवश्यक है: जब तक अहंकार रहेगा, सत्य समझ में नहीं आएगा।

यह भजन हमें याद दिलाता है कि विनम्रता, समानता, और आत्मज्ञान ही जीवन का असली उद्देश्य है।

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