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Photos from WordsofPK's post 06/11/2025

तस्वीरें दुखद हैं — और सच्चाई उनसे कहीं ज़्यादा दुखद।

अगर अपनी जातियों पर गर्व करता यह समाज ही ईश्वर का सुंदर चेहरा है,
तो वह रोता हुआ बुज़ुर्ग, भूखे बच्चे, डूबे हुए घर,
महीने में पंद्रह दिन भरपेट खाना खाकर भी मुस्कुराता अपाहिज,
और सूखे चावलों में जीवन खोजती लक्ष्मी-स्वरूप औरत —
उस चेहरे पर जमी वो कालिख हैं, जो धुलती नहीं।

मैं जानता हूँ, जातियाँ ईश्वर ने नहीं बनाईं।
मगर वे लोग नहीं मानते,
जो हर दिन एक नया ईश्वर गढ़ते हैं —
अपने स्वार्थ के, अपने गर्व के, अपनी जाति के।

मैं ईश्वर के ख़िलाफ़ नहीं हूँ,
मैं उन ईश्वरों के निर्माण के ख़िलाफ़ हूँ
जो इंसानों को तोड़ते हैं, जोड़ते नहीं।

भारत के हर राज्य में गरीबी होगी
मगर बिहार की गरीबी अलग है।
यह भूख की गरीबी है।
जो भूख की गरीबी से बाहर निकलते हैं,
वे समाज की गरीबी में फँस जाते हैं —
जहाँ इंसान को उसकी जाति,
औरत को उसकी दीवारों से,
और सोच को उसके डर से तौला जाता है।

समाज की गरीबी पैसे की कमी नहीं — सोच की जड़ता है।
यहाँ परंपराएँ धरोहर नहीं, हथकड़ी हैं।
यह समाज खाने से ज़्यादा निगलता है —
और जो कुछ निगल नहीं सकता, उसे बहिष्कार कहकर उगल देता है।

यहाँ शिक्षा डिग्रियों से मापी जाती है,
पर समझ अब भी गाँव के कुएँ में डूबी हुई है।
दहेज़ यहाँ संस्कृति है,
और स्त्रीयों की चुप्पी मर्यादा।
यहाँ औरतें देवी हैं —
जब तक बोलती नहीं।
और आदमी पूज्य है —
जब तक सोचता नहीं।

समाज की गरीबी वह दीमक है
जो विवेक को चाट जाती है।
भूख की गरीबी तो मिट सकती है —
रोज़गार, रोटी और इज़्ज़त से।
मगर समाज की गरीबी नहीं —
क्योंकि यह भूख नहीं, संतोष का भ्रम है।
यह वह दरिद्रता है जो खुद को सभ्यता कहती है,
और दूसरों की पीड़ा पर शास्त्र लिखती है।

यह गरीबी आत्मा की त्वचा पर उग आया फोड़ा है —
जिसे सब देखते हैं,
पर कोई फोड़ना नहीं चाहता,
क्योंकि मवाद में अपनी ही सूरत दिख जाएगी।

और जो इन दोनों गरीबी से आगे निकल जाते हैं,
वे ‘गरीब रथ’ में बैठकर दिल्ली या बंबई जाकर
आत्मसम्मान की गरीबी से लड़ते हैं
बिहार में दो किस्म की गरीबी है —
भूख की गरीबी, जो पेट से चिपकी है;
और समाज की गरीबी, जो आत्मा में धँसी है।

भूख वाले लोग चिल्लरों में बिकते हैं,
समाज वाले लोग जातियों में।
और जब समाज के गरीब बिकते हैं,
तो वे कालिख ख़रीदते हैं —
और जाकर ईश्वर के चेहरे पर पोत देते हैं।

- Praveen.Bhardwaj

28/07/2025

Ghazal ⤵️

बिछड़ भी जाएं तो क्या करेंगे
तुम्हारे हक़ में दुआ करेंगे

ये इश्क़ है जो सुपुर्दगी है
ग़िरफ़्त-ए-दिल में रहा करेंगे

रहा ना आँखों में ख्वाब जिनके
वो आँखें कैसे हया करेंगे

हमारी किश्मत में कुछ नहीं था
लकीरों की अपनी क्या करेंगे

ये शोर है जो अगर नहीं हो
तुम्हारी साँसे सुना करेंगे

कभी कभी मेरा हाल पूछो
‘सफर’ सही है कहा करेंगे

bichhad bhi Jaye.n to kya karenge
TuMhare haq me duaa.n karenge

Ye ishQ hai jo supurdagi hai
Giraft-e-dil me raha karenge

Raha na AanKHon me Khwab jinke
Wo Aankhe kaise haya krenge

Hamari Kishmat me kuchh nhiN tha
LakiroN ki apni kya karenge

Ye shor hai jo agar nhiN ho
Tumhari sanse suna karenge

Kabhi-kabhi mera hal puchho
‘Safar’ sahi hai kaha karenge

—— PRAVEEN BHARDWAJ ——

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