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25/12/2020

बचपन , अटल और नॉस्टैल्जिया

नब्बे के दशक का हर आदमी जो आज आदमी बन चुका है वो तब बच्चा था। 2000-2001 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार थी , देश में प्राथमिक शिक्षा के उन्नयन के लिए बहुत सारे विचारो के अमली जामा के रूप में बहुत से कार्यक्रम और योजनाएं शुरू की जा रही थी ।उसी के तहत एक योजना शुरू की गई सन 2001 में जिसका नाम ' सर्व शिक्षा अभियान ' रखा गया जिस योजना का उद्देश्य देश के हर बच्चे को शिक्षा देना तथा प्रारंभिक शिक्षा (प्राथमिक शिक्षा) का सार्वभौमिकरण करना था ।
जैसे कहते है ना किसी भी योजना को पूर्ण रूप से लागू था सर्वसुलभता प्रदान करने के लिऐ एक ऐसे मोटो यू कहे तो ध्येय वाक्य की जरूरत होती है जो उस कार्यक्रम की जान होती है , तो सर्व शिक्षा अभियान का ध्येय वाक्य था
" स्कूल चले हम "
कहे तो अटल जी ने 90s के दौर के बच्चों को दिया था नॉस्टैल्जिया 'स्कूल चलें हम' जो जेहन में ऐसे बसा की उसके किस्से याद कर के आज भी मन के कोने में छुपा बचपन कहता है कि बस जिम्मेदारियों का बोझ उतार तितलियों से पंख उधर ले मन भर उड़ ले । यह 90s में बड़े हो रहे बच्चों के लिए संजीवनी बना।
हर प्राइमरी स्कूल की दीवार पर ऑयल पेंट से बने एक बालक और बालिका दिखते थे जो पेंसिल पर बैठे हुए होते । पेंसिल हैरी पौटर की जादुई झाड़ू का अहसास दिलाती थी जिस पर बैठकर उड़ान भरी जाती थी , मानो जैसे दीवाल पर बने पेंसिल पर हम बैठ दुर आकाश की सैर करने चल जाते तो कितना अच्छा होता

उसी दौरान टेलीविजन पर एक कालजयी एड आने लगी , जिसमे बच्चे बस्ते पीठ पर लादे स्कूल के तरफ ऐसे जा रहे थे कि मानो स्कूल का कोई खौफ नहीं हुआ है उन्हे , और एक तरफ हम सब की तरह वाले बच्चे थे वो घर पर शक्तिमान देखने की जिद पर कई चपेट खा लेते फिर , आचार्य जी के कुटाई के डर से ना स्कूल जाने कि इच्छा को त्याग कर बस्ता उठा कर स्कूल की तरफ चल देते थे ।
तब उस दौर में ऐसा विज्ञापन सच मे इम्यून बूस्टर की तरह था जहा कश्मीर से केरल तक हर धर्म जाति, वेश भूसा वाले बच्चे स्कूल जाते दिखते , जिनके स्कूल जाने कि इच्छा और खुशियां देख स्कूल ना जाने वाला भी पिघल जाए स्कूल जाने के लिऐ ।

वीडियो के शुरुवात में जब अटल जी कहते है

सबेरा हो चुका है , चिड़िया घोसलो से निकल रही हैं
स्कूल की घंटी बज गई है , बच्चे सब स्कूल जा रहे है
हम भी तैयार है

" स्कूल चले हम "

सवेरे सवेरे यारों से मिलने बन ठन के निकले हम
सवेरे सवेरे यारों से मिलने घर से दूर चलें हम
रोके से न रुके हम, मर्जी से चलें हम
बादल सा गरजें हम, सावन सा बरसे हम
सूरज सा चमकें हम, स्कूल चलें हम.

आज ये देखते हुए बचपन का बच्चा जो आज आदमी बन चुका है उसके आंख के कोने में आंसुओ के कुछ बूंद ऐसे टपक रहे है कि अटल जी ने जब ये बात कही थी तब दिमाग इतना नादान था कि उनकी आवाज के मिठास को महसूस करने में नासमझ था ,
जिसे वीडियो मे बस्ते लिऐ स्कूल की घंटी सुन स्कूल की तरफ भाग रहे बच्चों को हसी दिख रही थी ,

वो उस शख्स से अंजान था जिसने उसे उस कालजयी विज्ञापन के माध्यम से स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया।
आज जब हम 90s के बच्चे आदमी बन चुके है तो हम स्कूल चलो अभियान के पीछे किए गए अटल जी के पुरुषार्थ को जान सके क्योंकि आज वीडियो के शुरू की चंद पंक्तियां का अर्थ हम जान चुके है ।
की
सबेरा हो चुका है , चिड़िया घोसलो से निकल रही हैं
स्कूल की घंटी बज गई है , बच्चे सब स्कूल जा रहे है
हम भी तैयार है
" स्कूल चले हम "
का क्या अर्थ है ।
ये वो विज्ञापन था जिसने हमारे देश के प्राथमिक शिक्षा के नीव को ऐसा मजबूती प्रदान की जिसके आगे आज की सारी नवीन योजनाएं मुंह के बल औधे गिर जाएंगी ।

दूसरी चीज बहुत सी चीजे है जिसे देख सुनकर हम आप जैसा कोई भी शख्स इमोशनल हो सकता है। अगर आप थोड़े भी इमोशनल नहीं हो पा रहे है तो न हो तो कान पर हेडफोन लगाइए फिर ये गाना प्ले कीजिए , यकीनन आप इस वीडियो के अंत में अपने आप को अपने बस्ते वाले बच्चे के रूप में देख पाएंगे बचपन में स्कूल जाते हुए बस्ते से लेकर रास्ते तक को कैसे हम अपनी आडी तिरछी चाल से नाप दिया करते थे । दोस्ती से मिलने से लेकर छोटी मोटी नोक झोंक कैसे किया करते ,

शुक्रिया अटल बिहारी वाजपेई जी ,
स्कुल चलो अभियान के लिए

शायद आपने ये नहीं किया होता तो हम 90s के बच्चो के लिए नॉस्टैल्जिया के लिऐ कुछ नहीं बचता

© आशीष कुमार गुप्ता ( Ashisharc Gupta )

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