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08/09/2024
जरा इसको पहचानो। ये अपने जमाने का लोकप्रिय आहार था जो भादो उतरते उतरते खाने के लिये तैयार हो जाता था। चलिये हम बताते हैं। आज से लगभग 4 दशक पहले हमारे क्षेत्र में बाढ़ हर साल आती थी। नतीजा यह होता था कि अक्सर धान की फसल या तो खराब हो जाती थी या बहुत कम होती थी। नतीजा यह होता था कि सावन बीतते बीतते लगभग हर परिवार की नजर इसी फसल पर होती थी। चूंकि यह फसल भादो उतरते उतरते भूख मिटाने के लिये तैयार हो जाती थी। इसको खाने के लिये तैयार करना भी आसान है।
इस फसल का नाम है टांगुन/सावां । यह अक्सर मक्के के खेत के चारो ओर बोई जाती थी। तब मकई के खेत में मचाना पड़ता था। मचान पर बैठने के लिये बच्चे बेहद उत्सुक होते थे। स्कूल से छूटते ही आधा तीहा खा कर मचान पर। जब मकई में बाल भूई आना शुरू होती थी तभी टांगुन/सावां में भी उसकी बाल निकल पड़ती थी। मकई के खेत में बोड़ा, सरपुतिया भी बोई जाती थी। इसी में पेंहटुल और फूट भी तैयार होता था। जैसे ही मकई में दाने पड़ते थे, खेत में ही पार्टी शुरू हो जाती थी। घर से क॔डा गोइठा आता था और आती थी लहसुन मिरचा वाली चटनी। खेत में ही अहरा सुलगता था। बाबा या पिताजी बाल (भुट्टा) भूजते थे और सबसे पहले बच्चों का ही नंबर लगता था। बच्चे सबहे पहले पेंहटुल पर जुटते थे। कच्चा पेंहटुल तो कडवा होता था लेकिन पका पेंहटुल खट्टा मीठा स्वाद देता था। जैसे ही टांगुन/सावां पकने लगती थी, रखवाली बढ़ चाती थी। इस टागुन/सावां पर सबसे पहला हमला सुग्गा (तोता) का होता था। फसल पकते ही एक ओर से बाल छपक कर घर लाकर उसे पैर से लतिया कर उसके दाने निकालै जाते थे और फिर इसका पीला चावल सीधे भदेली में।
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@फ़ॉलोअर्स@हाइलाइटडी एस तिवारी देव
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