Gaurav Kumar Nigam

Gaurav Kumar Nigam

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21/12/2025

धुरंधर के लिए अक्षय खन्ना को 'अब' तारीफ मिलते देखना अफसोस की बात है।
अक्षय खन्ना बढ़िया एक्टर रहे हैं, हमेशा से ही। उनकी फिल्मों की स्क्रिप्ट को अच्छा या बुरा कहा जा सकता है लेकिन उनकी स्किल्स को बुरा कहना ज्यादती होगी।
मेरे बहुत पसंदीदा रहे हैं... आज से नहीं, दहक के वक़्त से ही।
अमूमन nice guy की भूमिका पाते अक्षय खन्ना की रेंज क्या है इसे महसूस करना हो तो फिरोज़ खान की 2007 में आयी 'गाँधी, माई फ़ादर' देखिए।
फ़िल्म में अक्षय खन्ना ने महात्मा गाँधी के बड़े बेटे, हरिलाल गाँधी, का किरदार निभाया था।
हरिलाल गाँधी... यानी द गाँधी का सबसे बड़ा बेटा... जो कभी लंदन जाकर अपने महान पिता की तरह बैरिस्टर बनना चाहता था... अंत में मुम्बई के मामूली टीबी अस्पताल में ऐसी गुमनामी की मौत मर गया जहाँ आखिरी वक्त में उसके लिए आंसू बहाने वाला घर का कोई इंसान नहीं खड़ा था।
महान पिताओं की बरगद जैसी छवि के नीचे पैदा होने, लेकिन कभी पनप ना पाने वाली दूब जैसे अभिशप्त बेटों की आत्मा को आवाज देते अक्षय खन्ना जब एक जगह खुद पर विद्रूपता से हँसते हुए कहते हैं कि... "मैं गाँधी जी का नालायक बेटा हूँ..."
यह इकलौती लाइन ही यह साबित करने को काफी है कि अक्षय क्या हैं!
पता नहीं दुनिया को अच्छी चीजों, अच्छे लोगों को पहचानने और एप्रिशिएट में इतना लंबा वक्त क्यों लगता है?
या शायद वो इंतज़ार करती है nice guy के विलेन में तब्दील होने तक का...

24/10/2025

क्रिकेट का मैदान खिलाड़ियों से सजा है।
स्ट्राइक एन्ड पर खड़े प्लेयर से लेकर पवेलियन में बैठे दर्शकों तक के चेहरे पर तनाव से पसीना चुहचुहा रहा है।
एक विनिंग शॉट लगता है... माथे पर पड़ी लकीरें मिटकर होठों पर मुस्कुराहट की शक्ल में वापस आ जाती हैं।
भीड़ के बीच से एक लड़की उठती है और चॉकलेट खाते हुए, नाचते हुए ये जीत सेलिब्रेट करना शुरू करती है।
टीवी पर चाकलेट सी एक मीठी धुन बज रही है... 'कुछ खास है जिंदगी में।'
ये वो खास एड था जिसने भारत में चॉकलेट को बच्चों की चीज की केटेगरी से उठाकर बड़ों के बीच लोकप्रिय बना दिया था।
इस विज्ञापन के बाद चॉकलेट और सेलिब्रेशन का जो गंठजोड़ हुआ वो आजतक कायम है।
ऐसे ना जाने कितने भुलाए ना जा सकने वाले विज्ञापनों के जन्मदाता, विज्ञापनों को भारतीय बोलियों और भावों से सजाने वाले पीयूष पांडेय आज नहीं रहे।
हो सकता है कि नब्बे के दशक को अपनी आंखों से देखे हुए एक आम हिंदुस्तानी पीयूष पाण्डेय को चेहरे या नाम से ना जानता हो, लेकिन उनके काम के असर से नावाक़िफ़ हो, ऐसा लगभग असंभव है।
इंडियन एडवरटाइजिंग, या यूं कहें तो ज्यादा ठीक होगा कि हिंदी एडवरटाइजिंग को उसकी जड़ों से जोड़कर, फिर हमेशा के लिए बदल देने वाले शख्स का नाम पीयूष पाण्डेय था।
पदम श्री और LIA के लीजेंड अवार्ड से सम्मानित पीयूष पाण्डेय विज्ञापनों की दुनिया की सबसे बड़ी एजेंसी Ogilvy के वैश्विक चीफ क्रिएटिव ऑफिसर और एग्जीक्यूटिव चेयरमैन - भारत के तौर पर कार्यरत रहे थे।
पीयूष पाण्डेय का सबसे बड़ा काम था भारतीय विज्ञापनों को पश्चिमी टेम्पलेट के प्रभाव से निकालकर इस देश के आत्मा में बसी क़िस्सागोई की कला से जोड़ देना - एक छोटी सी कहानी के माध्यम से हमारी रोजमर्रा की, आम बोलचाल की भाषा में हमारे भावों और आदतों को मोहक जिंगल्स के बीच बुन देना।
भारत के हर उस बच्चे को पीयूष का शुक्रगुजार होना चाहिए जिनके मां बाप ने 'दो बूंद जिन्दगी की' का स्लोगन सुनकर, पढ़कर पोलियो ड्रॉप्स पिलवाई थी।
हर वो नौजवान जिसने अपनी प्रेमिका को ताजमहल की जगह चॉकलेट देकर अपनी बात कहने का हौसला जुटाया, उसे देखकर पीयूष सोच रहे होंगे 'कुछ मीठा हो जाये!'
किसी बढई, किसी कारीगर को बहुत भरोसे के साथ 'फेविकोल का जोड़ है, टूटेगा नहीं' को कहते पाकर अपनी घनी मूंछों पर हौले हौले ताव दे रहे होंगे।
डोमेस्टिक वायलेंस की शिकार बन रही कोई औरत जब 'बेल बजाओ' केम्पेन की वजह से अपने आँसू पोंछ पायी होगी तो पीयूष के दिल को इत्मीनान आया होगा।
किसी बच्चे , किसी प्रियजन में गालों को खींचकर गूगली वूगली वुश करते देख उन्हें अपनी कला पर मान आया होगा।
धोखे और उदासीनता से भरी इस दुनिया में पीयूष जब भी किसी बच्चे को 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गुनगुनाते पाएंगे, ऊपर बैठे - बैठे मुस्कुरायेंगे।
ग्राहक में पहले इंसान को खोजने की कोशिश करते, किसी को प्रोडक्ट बेचने की जगह उसके दिल में एक कोना हासिल करने की कोशिश पर जोर देने वाले, इंडियन एडवरटाइजिंग के इस सबसे बड़े व्यक्तित्व को नमन रहेगा।

13/10/2025

साहित्य में, खासकर हिंदी साहित्य में, जैसे ही कोई ढंग का काम होने लगता है, कोई लेखक चमकने लगता है, कोई चार पैसे ज्यादा कमा लेता है तत्काल ही एक धड़ा कुर्ताफाड़, छातीपीट मार्का विलाप शुरू के देता है।
इस बार निशाने पर विनोद कुमार शुक्ल हैं।
हिन्दी का एक लेखक, जो जिंदगी भर हिंदी में लिखने के बाद जाकर कहीं तीस लाख की रॉयल्टी का चेक थाम सका है... उसकी उपलब्धि को नकारना, संशय पैदा करना, हिंदी भाषा और लेखन को तिरस्कृत करने का यह प्रयास कुत्सित है।
यही विनोद कुमार शुक्ल जब कुछ वक़्त पहले रॉयल्टी ना मिलने की व्यथा साझा कर रहे थे तब उनकी हालिया कमाई के कितने आलोचकों ने उनकी मदद के लिए एक उँगली भी हिलायी थी?
अगर तीस लाख के एक चेक से ही इतना हाहाकार मचा हुआ है तो वस्तुतः तो यह हिंदी के मठाधीश बने बैठे झंडाबरदारों की गर्दन शर्म से झुका देने वाला वाकया है कि इतने सालों में, हिंदी भाषी देश में तीस लाख जैसी मामूली रकम की रॉयल्टी नहीं पच पा रही है।
अपने दिल पर हाथ रखकर कहिए... क्या तीस लाख रुपये आज के जमाने में वाकई इतनी बड़ी रकम है कि इस पर इतना ज्यादा विवाद पैदा किया जाये!
तीस लाख पास रखकर आप एक ठीक ठाक कस्बाई इलाके में एक हज़ार स्क्वायर फ़ीट का, ढंग का मकान नहीं खरीद पायेंगे... एक मामूली से जरा बड़ी मेडिकल इमरजेंसी पड़ गयी जिंदगी में, तो एकाउंट खन्न खन्न बज उठेगा।
आज जिस देश में कदम रखने के बाद बड़े से बड़े देश का राजनयिक या प्रधानमंत्री हिंदी भाषा का प्रभाव भाँप कर, टूटी फूटी ही सही, हिंदी बोलने की कोशिश करता दिखता है, वहाँ हिंदी में लिखने वाले के चार पैसों पर यूं नज़र लगायी जायेगी?
पैसे का लोभी ना होना अच्छी बात है, लेकिन फटेहाली को ही ओढ़ना - बिछौना बना लेना और उस पर इतराना भी... यह धूर्तता है या परम मूर्खता, पढ़ने वाले स्वयं तय करें।
कुछ आलोचनाएं इससे भी बढ़कर निगाह के सामने पड़ी...
- अराजनैतिक रचना कोई रचना नहीं होती। .. हर बात में पॉलिटिक्स घुसेड़ना ठीक नहीं पार्टनर। जिंदगी वहाँ भी है, कहानियाँ वहाँ भी हैं जहाँ राजनीति नहीं है।
- जिस रचना में समाज को दिशा देने की बात ना हो, नैतिकता और आचरण के मापदंड ना बने उसे साहित्य कहे जाने का अधिकार नहीं। ... फिर तो तथाकथित साहित्य की नब्बे प्रतिशत रचनाएँ इस पैमाने पर अपनी प्रासंगिकता खो देंगी। ऐसी कौन सी नैतिकता, शिक्षा और दर्शन की बात लिखी जा सकती है, जो पहले से हर धर्म की पुस्तकों में मौजूद नहीं है।
- हिंदी साहित्य में चेतन भगत वाली प्रवृत्ति आ गयी है। .. तो इसमें आपत्तिजनक क्या है! चेतन ने देश के श्रेष्ठ संस्थानों से पढ़ाई की है। उनके लिखे को लाखों ने बार - बार पढ़ा है। चेतन भगत ने जब लिखना शुरू किया तब वह युवा थे। अपने देश काल परिस्थितयों की कहानी को उन्होनें सरल, बोलचाल की शैली में लिखना शुरू किया जिसको समझने के लिए शब्दकोश की ज़रूरत नहीं पड़ती। उन्होंने आधुनिक जीवन की, जवान होती मध्यमवर्गीय पीढ़ी की कहानी अपनी जुबान में लिखी।
इसमें क्या समस्या है?
क्या साहित्य में सृजन का पहला उद्देश्य पाठक से सहज संवाद स्थापित करना नहीं है!
- यह सोशल मीडिया पर प्रचार की आंधी से उपजा मुनाफा है। .. सोशल मीडिया अपनी बात त्वरित गति से कहने, फैलाने का माध्यम भर है। आपकी समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर मौजूद नयी पीढ़ी हर फैसला आपकी लाइन टो करके नहीं लेती।
प्रसंगवश, बीते दिनों मैं अपने नॉवेल के सिलसिले में, लखनऊ के गोमती बुक फेयर में था जहाँ मैंने एक दस साल की बच्ची को अपने पिता से दीवार में एक खिड़की दिलवाने की जिद करते देखा, एक लड़की को प्रेमी से यही किताब लेने के लिए मचलते देखा। ऐसे कम से कम दर्जन भर प्रसंग मेरे सामने हुए जिसमें नई, जवानी की दहलीज पर कदम रखती पीढ़ी ने दीवार..., रश्मिरथी और गुनाहों के देवता को खोजकर खरीदते देखा। एक बड़े बुकसेलर ने निःसंकोच स्वीकारा कि इन तीनों की माँग इस बार सबसे ज्यादा है और दीवार... की आठ दिन में केवल उसके स्टाल से 300 कॉपी निकल चुकी थी।
सोशल मीडिया ने नए लड़कों को किताब पढ़ने, खरीदने के लिए प्रेरित किया है।
आपने क्या किया है!
- लोकप्रियता, श्रेष्ठता का पैमाना नहीं होती।.. फिर किस बात का पैमाना होती है! एक किताब जो हज़ारों, लाखों प्रतियों में बिक रही हो, जिस पर कोई व्यक्ति अपनी मेहनत से कमाये पैसे खर्च कर रहा हो, अपना समय और ऊर्जा खर्च कर रहा हो, और पढ़ने के बाद इस अपराधबोध से भी मुक्त हो कि इतनी देर किताब पढ़ी या झक मारी... ये फिनॉमिना किस बात का पैमाना है?
आपकी अपनी किताब की सरकारी और लाइब्रेरी खरीद को अगर बाहर कर दिया जाये तो कुल जमा कितने लोग आपकी किताब पर अपने श्रम की कमाई न्यौछावर करने को तैयार होंगे?
- पुरस्कार, श्रेष्ठता का पैमाना नहीं होता। .. फिर किस बात को एकनॉलेज करने के लिए पुरस्कार दिया जाता है! अगर आपके कहे से यह मान भी लिया जाये कि हर पुरस्कार जुगाड़ की चीज है तो महोदय, आपको उसी समय यह भी तो मानना ही पड़ेगा कि अगला जुगाड़ करने में आपसे श्रेष्ठ सिद्ध हुआ और आप फेलियर साबित हुए!
- यह साहित्य में लुगदी साहित्य के बढ़ते प्रभाव का नतीजा है। .. यह बरसों से बने आभामंडल की दरकती दीवारें देख उपजी झुंझलाहट है जो पल्प फिक्शन लिखने वालों को हेय दृष्टि से देखने को उकसाती है।
आपकी जानकारी के लिए एक जमाने में पल्प फिक्शन जिस काग़ज़ पर छपता था, वह काग़ज़ सस्ते अखबारी काग़ज़ जैसा होता था जिसे लुगदी भी कहते थे।
लुगदी - काग़ज़ के लिए इस्तेमाल हुआ विशेषण था, ना कि लेखन या लेखक के लिए।
क्या इस खास किस्म के कागज़ के अलावा कोई और ठोस पैमाना है जो तथाकथित साहित्य और लुगदी साहित्य में अंतर रेखांकित कर सके?
क्या कोई बता सकता है कि हिंदी के नवरसों में से कौन सा रस 'लुगदी साहित्य' की किताबों में नहीं है?
या, लुगदी साहित्य कही जाने वाली किताबों में मौजूद अपराध या यौनिक टिप्पणियां क्या तथाकथित साहित्य में मौजूद इन्हीं तत्वों से ज्यादा है?
वाकई!
- साहित्य वही, जो कालजयी हो। .. इस बात की जाँच के लिए कम से कम कालखंड बीतने भर का इंतज़ार तो कर लेंगे ना!
बिना लिखे, बिना छपे, बिना पढ़े इस बात का फैसला कैसे हो सकता है? कौन माई का लाल यह गारंटी दे सकता है कि इस बार जो लिख रहा वह कालजयी सिद्ध होगा ही होगा।
चंद्रकांता, भूतनाथ, व्योमकेश, बेताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी को आप किसमें रखेंगे? क्या इब्ने सफी, शरदेंदु, कृशन चन्दर, गुलशन नंदा, ओमप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक की किताबों का वाकई कोई नामलेवा नहीं बचा?
अगाथा क्रिस्ट्री, मारिया पूजो, आर्थर कानन दयाल, जेम्स हेडली चेइज, जे के रॉलिंग आगे आने वाले सौ पचास सालों में बिसरा दिए जायेंगे?
जवाब है,... नहीं।
किसी के चाहने भर से ऐसा नहीं होने वाला।

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किसी इलाके में यदि झोपड़पट्टी के बीच कोई चार मंजिला मकान बनवा भी ले तो भी उसका मूल्यांकन झोपड़ी से ही शुरू होगा... वहीं, कोठियों से भरी सड़क पर अगर कोई जमीन खाली भी पड़ी हो तो भी उसका मूल्य कोठियों के मानक पर लगता है।
हिंदी में नई अट्टालिकाएं बन रही हैं... बनने दीजिए।
हिन्दी का भला होगा... और, आपका भी।

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