Ashish digdiga

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Photos from Ashish digdiga's post 10/05/2026

आज यानि 10 मई को कैफ़ी ने आख़री सांस ली थी । वह कैफ़ी जिनसे हमने ज़िन्दगी की कितनी ही करवटें सीखीं । अपने गांव से मोहब्बत और ऊँचे ख़्वाब को लपकने की उनकी लगन ने हमें बहुत मुतास्सिर किया । ज़िन्दगी की हर खूबसूरती को उन्होंने बड़ी सादगी से समेटा । एक शर्मीला सा इंसान,जो जितना ख़ुद को समेटता, उतना और खुलता जाता ।

सिर्फ़ 11 साल की उम्र में नज़्म कह दी । जब पढ़ा तो बड़ों ने बहुत तारीफ़ की,तारीफ़ जानते हैं क्या थी । बच्चे की याददाश्त बहुत अच्छी है । पूरी नज़्म याद कर ली । सब खुश थे,बच्चे रो रहा था । बड़ी बहन के पास जाकर बैठ गया,रोता रहा,कहता रहा कि देखिये,यह समझ रहे हैं कि नज़्म हमारी नही हैं । हमने याद की है । बहन ने कहा कि जाओ, सबको चाय बिस्किट दे आओ,यही काम है तुम्हारा,तुम छोटे हो । वह उठा,तो बहन ने हाथ पकड़कर कहा कि तुम्हे साबित करना होगा, इन सबके सामने,तब तुम कहलाओगे शायर,मेरे भाई ।

भाई ने यह मुकाबला दिल पर दर्ज कर लिया और वालिद से कहा कि मुझे साबित करना है कि मैं खुद लिखता हूँ । बहराइच से आए बुज़ुर्ग शायर ने मुकाबला शुरू किया । यह मुकाबला किसी और से नही था,कैफ़ी का ख़ुद कैफ़ी से था । कैफ़ी दीवार की तरफ मुँह करके बैठ गए और फिर जो नज़्म पढ़ी,उसे ज़माने की मशहूर हस्ती,बेगम अख़्तर ने गाकर बता दिया,की 11 साल में कैफ़ी की क्या सलाहियत थी ।

हमसे भी किसी चीज़ का नाम नही रखा जाता । कैफ़ी तो अपने बच्चों तक के नाम नही रख पाए । लड़की को मुन्नी कहा तो लड़के को बाबा । वह तो अली सरदार जाफ़री थे,जिन्होंने मुन्नी को शबाना बना दिया । बच्चों के नाम ही नही,बल्कि ग़ज़ल की किताब बुन गई,मगर उसका भी नाम नदारद । दोस्त हसन कमाल ने उसे सरमाया कहा,तो दुनिया भर में मशहूर "सरमाया" सामने आ गई ।

दिलों में भड़कते शोले, जो कभी मज़हब,कभी किसी दूसरी वजह से दहकते । कैफ़ी उसपर ठंडा पानी डालकर बुझाने का काम करते । मुल्क में मुहब्बत और एकता के लिए वह जी जान से जुटते । कोई मौका नही छोड़ते,यहां तक 2002 में जब फिर नफरत की आग भड़की,तो कैफ़ी ने एक फ़िल्म लिखी और ख़ुद उसमें रोल भी किया । यहीं उन्होंने आख़री बार फिल्मी पर्दे को देखा और दुनिया को अलविदा कहा ।

एक अजब शख़्सियत,जब मुम्बई गोद में लिए,दुनिया की चमक में उन्हें ले जा रही थी । तब अपने गांव मिजवा की याद आ गई । लौट आए गांव और गांव के लोगों की जिंदगियां संवारने । कलम और ज़िन्दगी की अजब कशमकश लिए यह शख़्सियत हमेशा हमें लुभाती है । वह शख्स जब बीमार पड़ा,पैरालाइसिस का अटैक हुआ।

जब चलने को होते,तो कोई उन्हें सहारा दे देता,वह भड़क उठते । कैफ़ी सहारे लेने वाली नही बल्कि जूझने वाली शख़्सियत थे । वह शख्स मिजवा गांव के लिए हर उस दरवाज़े पर गया,जहां से उनके गांव तक सड़क,रेल,नालियां,स्कूल,अस्पताल आ सकें । उसने जूझकर मिजवां को मिजवां बना दिया । भला कौन मुम्बई छोड़कर गांव लौटता है । मगर वह लौटे,यही तो कैफ़ी थे,नायाब,सबसे अलग कैफ़ी ।

आज कैफ़ी की वफ़ात यानि पुण्यतिथि है । कैफ़ी आज़मी को याद कीजिये और उनकी शख़्सियत को ज़िंदा रखिये...
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All India Kafi Azmi Academy

03/05/2026

आज एक स्टूडेंट यूनियन के वॉइस प्रेसिडेंट, जामिया मिल्लिया के वीसी,लेखक,चिंतक,एएमयू के वीसी,बिहार के गवर्नर,राज्यसभा सांसद,उपराष्ट्रपति और आख़िर में राष्ट्रपति भारत रत्न डॉ ज़ाकिर हुसैन से जुड़ा दिन है । आज के रोज़ 3 मई 1969 को जिन डॉ ज़ाकिर हुसैन ने आख़री सांस ली । शुरू में उनके बारे में किसने सोचा था कि यह इस मुल्क के हर महत्वपूर्ण पद से होते हुए शिखर तक जाएंगे ।

यह उनकी क़ाबलियत थी,यह तालीम,इल्म यानि शिक्षा का सबसे जगमगाता सच था । इल्म जिसमें दाख़िल होता है, वह सिर्फ उसे ही नही निखारता, बल्कि उससे ज़माने में निखार आ जाता है । हैदराबाद में वालिद फ़िदा हुसैन की वक़ालत जम गई,तो वहीं जन्में डॉ ज़ाकिर हुसैन मगर फिर अपने वतन क़ायमगंज, फर्रुखाबाद वापसी हुई तो यहीं पढ़ाई का सिलसिला शुरू हो गया ।

लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज में बीएससी करने निकल पड़े । सोचा था साइंस पढ़ेंगे और ज़िन्दगी की गुत्थियां सुलझाएंगे मगर दिल न लगा और अलीगढ़ चले गए ।वहां उनका सामना फिलॉसफी से हुआ । सोच के दरवाज़े खुले,सियासी दिलचस्पियाँ बढ़ीं और यूनियन में वॉइस प्रेसिडेंट चुन लिए गए । वह बोलते, तो लोगों के दिल धड़क उठते । आवाज़ में ग़ज़ब का जादू और धमक,दिमाग़ से जब अल्फ़ाज़ बाहर आएं, तो रोशनी फैल जाए । ज़ाकिर हुसैन की समझ ने अपना पता यूनिवर्सिटी में ही दे दिया । धीरेधीरे वह दिन भी आया जिस यूनिवर्सिटी के वह स्टूडेंट् थे,वही के वॉइस चांसलर बन गए ।

डॉ ज़ाकिर हुसैन के भाइयों ने भी खूब तरक्की करी । जो जिधर गया,उधर शीर्ष पर पहुँचा । हमें इनकी ज़िन्दगी में इसलिए बात करनी चाहिए और घर घर बताना चाहिए,ताकि इल्म यानि पढ़ाई की अहमियत समझ में आए और सोच व फ़िक़्र की ज़रूरत लोग महसूस करें । इल्म वह ताक़त है, जो हर बन्द दरवाज़े को खोल देता है।

डॉ ज़ाकिर हुसैन ने हर पद अपनी काबिलियत से पाया,वह ज़रूरत बन गए । जब मुल्क बंटा तो एएमयू खाली होने की कगार पर आ गया । तब उसके वीसी बनकर उन्होंने एएमयू की बुनियाद को दोबारा सहेज दिया । उसकी दीवारों को दोबारा मज़बूत कर दिया । उसके सहन में खुले घूमते ज़हनो को दोबारा ताज़ा कर दिया । मायूसी को अपनी मेहनत से ख़त्म कर दिया ।

आज दुनिया से कूच कर जाने वाले दिन उन्हें याद कीजिये । हर रोज़ उनके किरदार पर बात कीजिये । यह ज़माने को मालूम होना चाहिए कि वह क्या शख़्सियत थे । जो सारी उम्र काम करते करते चले गए । आराम उनकी ज़िंदगी में थी नही और ठहराव जैसा अल्फ़ाज़ उनकी डिक्शनरी में नही था । जब से होश संभाला,तब से आज के रोज़ 3 मई 1969 तक उन्होंने सिर्फ काम किया और खूब काम किया...उन्हें याद कीजिये

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Photos from Ashish digdiga's post 02/05/2026

कल मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी,लखनऊ के सभागार में मशहूर समाजवादी चिंतक मधु लिमये का जन्मदिन मनाया गया । इस अवसर पर अध्यक्षता उनके साथी रहे सुरेंद्र विक्रम सिंह जी तथा मुख्य वक्ता प्रो रमेश दीक्षित जी ने किया व मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी के महामंत्री राजेश सिंह जी ने प्रमुख रूप से बात की ।

सभी वक्ताओं ने मधु लिमये के जीवन पर बात किया और उनकी संसदीय ज्ञान पर प्रकाश डाला । मधु लिमये 4 बार सांसद रहे, पेंशन नही ली । स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे मगर पेंशन नही ली । उन्होंने हमेशा संसद की गरिमा और सँविधान की सर्वोच्चता पर बल दिया।

Photos from Ashish digdiga's post 27/04/2026

नईम साहब,दानिश महल,नक्ख़ास,लखनऊ

Photos from Ashish digdiga's post 26/04/2026

लखनऊ से राष्ट्रीय समाचार पत्र में ख़बर बहुत धन्यवाद ।
Media coverage

Photos from Ashish digdiga's post 25/04/2026

दिनांक 20 अप्रैल शाम 4:00 बजे ऑल इण्डिया क़ैफ़ी आज़मी एकेडमी लखनऊ के कार्यकारिणी की बैठक एकेडमी के सद्र प्रोफ़ेसर अली अहमद फ़ातमी की सदारत में एकेडमी कार्यालय गुरुद्वारा रोड, पेपरमिल कॉलोनी, निशातगंज, लखनऊ में बुलाई गई। जिसका एजेंडा दिनांक 10 में 2026 को कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि के मौक़े पर होने वाले कार्यक्रम पर विचार विमर्श करना था ।
All India Kafi Azmi Academy

Photos from Ashish digdiga's post 18/04/2026

With
Justice syed qamar hasan rizvi ( justice allahabad high court, lucknow bench )

Dr.ammar rizvi, ex acting chief minister. Up

Syed faraheem husain

Dr. Khan ahmad farooq
Haleem p.g.college kanpur to discuss about literary and cultural work for academy.....
..At All india kaifi azmi academy, lucknow

Photos from Ashish digdiga's post 13/04/2026

कुछ लोग थे, जो चाहते थे की, उनकी हर साँस पर पहरा न बैठाया जाए । चाहते थे की उन्हें उनके मुल्क़ में सरकार जब चाहे बिना वजह बताए गिरफ्तार करने के घिनौने मंसूबे छोड़ दे । वह जानते थे की जिस दिन उनकी साँस पर पहरा बैठा दिया जाएगा, उस दिन आज़ादी का ख्वाब चकनाचूर हो जाएगा । बिना वजह गिरफ्तारितयों को अगर मंजूरी मिल जाएगी तो शासक ज़ुल्म की इंतहा कर देगा । निरंकुशता चरम पर होगी,यह कोई एक वर्ग नही,कोई एक धर्म ने बल्कि पूरा भारत सोच रहा था,वह भारत जो अपने अधिकारों के प्रति जाग गया था,जिसे केवल हुक़ूमत के प्रति कर्तव्य की नींद की गोली देकर अब सुलाया नही जा सकता था ।

ज़ाहिर है यह "रौलट एक्ट" की कहानी थी,जिसके खिलाफ महात्मा गाँधी अपने साथियों संग जूझ रहे थे । इसी कड़ी में उनके अहम साथी और आज़ादी की लड़ाई के तमाम हीरो में से एक "डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ सतपाल" को गिरफ्तार कर लिए गए । इन्हें गिरफ्तार करके कहाँ रखा गया, किसी को पता नही,अजब बेचैनी का माहौल ।
स्वर्ण मन्दिर के पास ही एक जगह पर इस गिरफ्तारी का विरोध रखा गया । लोग अपने इन दोनों लीडर्स की रिहाई और रौलट जैसे काले कानून को तोड़ डालने के लिए इक़ट्ठे होने लगे । उस जगह का नाम था "जलियाँवाला बाग़"

क़रीब बीस पच्चीस हज़ार लोग जलियाँवाला बाग़ में इक़ट्ठे हुए और उनकी मांग थी की बिना शर्त डॉ सैफुद्दीन किचलू को रिहा किया जाए । दिनभर चले इस धरने को रोकने के लिए ब्रिगेडियर डायर को भेजा गया । जब शाम हो चली तो डायर सैनिक लेकर जलियाँवाला बाग़ की तरफ चल पड़ा । यह ऐसी जगह थीं जहाँ से निकलने का एक ही रास्ता था । वहीं उसी रास्ते पर फ़ोर्स लगाकर अन्धाधुन गोलियां चलवा दीं । देखते ही देखते पूरा मैदान लाशो में बदल गया । हम यह नही कहेंगे की तुम इसे सोचकर दर्द से चीखने लगो ।न कहेंगे की बहुत अफ़सोस करो । बस इतना कहेंगे की जलियाँवाला बाग़ को भूलो मत । देश लम्बे वक़्त से जो मांग कर रहा था की अँगरेज़ उससे जलियांवाला बाग के लिए माफ़ी मांगे । आखिर ब्रिटेन ने देश से जलियाँवाला बाग़ कांड के लिए माफ़ी मांग ली । कैमरून 2013 में ही इसकी भत्सर्ना लिखकर गए थे,जिससे उनके माफी मांगने का रास्ता बना ।

अब सोचिये की जो लोग शहीद हुए थे उस दौर में,वह भी किसके लिए,हमारी आज़ादी और डा सैफुद्दीन के लिए । एक मैदान के अंदर उन्होंने शहादत तो चुनी मगर धर्म के नामपर बँटना नही चुना । लाशो में बिखर जाना तो पड़ा मगर दिल ओ दिमाग़ से एक होना चुना । वह जो जलियाँवाला बाग़ में खून बहा था वह हिन्दू,सिख,मुसलमान का नही था ,असली भारत का खून था । जिससे तड़पकर पूरा देश एक हुआ था । हम कितने बेगैरत लोग हैं जो ज़रा ज़रा से फ़ायदे और बहक़ावे में आकर आपस मे बंटने लगते हैं । वह कितने घिनौने और देशद्रोही लोग हैं जो हिन्दू और मुसलमान को नफ़रत में बाँटकर अपने लिए चमक़ता रास्ता बनाते हैं । हम क्यों नही कहते की हम डा किचलू और डा सत्यपाल के लोग हैं । जलियाँवाला बाग़ में शहीद हुए खून की उपज हैं हम भारतीय ।

जलियाँवाला बाग़ की यादें और सबक़ हमेशा सामने रखो और हमेशा सतर्क रहो । पता नही कब कौन जनरल डायर बनकर साथ मिलजुलकर प्रेम से चलने वालों को लाशों का ढेर बना दे । हमेशा सतर्क रहो, जो तुम्हे बाँटने आ रहा है, वह लाख छिपाए मगर उसका मंसूबा तुम्हे वापस गुलाम बनाने का ही है, यह आज मानो या कल गुलाम बनकर मानना मगर यह तय है, नफ़रत घोलकर बर्बादी ही आती है ।

जलियाँवाला बाग़ में हुए हर शहीद के सामने सर झुकाकर कहता हूँ की आपके ही रक्त से उपजे हुए आज़ाद भारत का नागरिक हूँ । अपनी आख़री साँस तक आपके दिए एकता,प्रेम,न्याय,भाईचारा और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की रक्षा करूंगा । सभी शहीदों को नमन,आपकी शहादत हमारे लिए एकजुट रहने की मशाल है, जो सदा जलती रहेगी । हममें से जो भी हिन्दू मुस्लिम एकता और भाईचारे का पक्षधर है, वही जलियांवाला बाग़ के संघर्ष का उत्तराधिकारी है और जो इन्हें तोड़ने की इच्छा रखता है, वह डायर का उत्तराधिकारी है, आप देख लें किसके प्रति श्रद्धा रखते हैं, हमारी जलियांवाला बाग़ के हमारे शहीद पूर्वजों को श्रद्धांजलि कि हम कभी उनके रास्ते से रत्तीभर नही डिगेंगे,चाहे सारा ज़माना डायर बन जाए.....
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12/04/2026

तुम खामोश थे,यह कहना झूठ होगा मगर जब तुम चीख़ रहे थे तब भी तुम्हारी चीखों में आवाज़ नही थी।जब तुम्हारे बीच से सबसे उपजाऊ हिस्से को ऊसर किया जा रहा था । तब तुम बिना आवाज़ की चीखें लगा रहे थे।आज तुम उसकी ढपली टाँगे उसके जैसा बनने की कोशिश करते हो । नाटक तो करते हो मगर एसी हॉल में,नाटको से बदलाव के लिए भीड़ जुटाते हो मगर शहर की क्रीम इकट्ठी करने के अलावा कुछ नही कर पाते

ज़रा जिनका नाम सुबह शाम लेते हो उस नौजवान की ज़िन्दगी पर नज़र डालना की तुम हॉल की बंदिश नही तोड़ पाए और वोह लोगों में उतर गया।"हल्ला बोल" किया और वही क़त्ल हो गया।34 साल के नौजवान का ख़ून भी यह ज़मीन पी गई मगर उससे निकली गर्माहट ने बहुतों के बच्चों को उसके जैसा बना दिया।इस अप्रैल में आँख खोलकर देखना रेणु, राहुल संक्रत्ययन,अम्बेडकर,कस्तूरबा,ज्योतिबा कौन कौन ज़मीन पर आया।सब अपने हिस्से का काम करके चले गए।

उन्ही में से एक हैं सफ़दर हाशमी,12 अप्रैल 1954 सफ़दर हाशमी जैसे हिमालयन किरदार का आना।वह जन नाट्य मंच समेत कई संगठनो के नीव की ईंट हैं।सफ़दर हाशमी ने एक पूरा ज़माना जिया अपने संघर्षो में,नाटको में,लेखन में,सभाओं में।उनकी आवाज़,उनका किरदार,उनकी कलम लोगों के दिलों पर नक्श हो जाती थी।बहुतों की ज़बरदस्त मुखालफत हो सकती है सफ़दर से मगर इससे उनकी खूबियां कम नही हो जाती।

सफ़दर हर संघर्ष में ज़िंदा हैं।एक वक़्त आता है जब आपका त्याग आपको झंडो,दलों, समूहों,संघो से आज़ाद करके सबका कर देता है।वैसे ही अब सफ़दर सबके हैं।हर टूटती, बिखरती,मचलती,कसकती,चीखती सबकी आवाज़ हैं सफ़दर।वोह जिसके नुक्कड़ नाटक सरकारों की चूले हिला देते।वोह जिसकी ढपली से निकली आवाज़ तानाशाही के सुर कमज़ोर कर देती थी।वोह जिसका प्रतिरोध का नाटक इस क़दर चुभता की उसे वहीं 34 की उम्र में शहीद कर दिया।

मैं सोचता हूँ यह कौन से लोग थे जो इतनी कम उम्र में इतना बड़ा कुछ कर गए।मुझे इनकी परम्परा को ढोने वालों को देख गहरी निराशा होती है।सफ़दर जो गाँवो,कस्बो,शहरो में नुक्कड़ नाटक करते रहते उनको मानने वाले अमीरों की चौखट पर ही संघोष्ठीय करते नही इतराते।सफ़दर के जनता के नाटक अब प्रतिष्ठित लोगों के नाटक हो चुके हैं।मुझे ऐसा होने से ज़रा भी फ़र्क नही पड़ता।

आप अमीरो को मनोरंजन दे इसमें कोई बुराई नही,कीजिये।आप उनके सामने ही अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें,उनमे आपको सराहने की कुदरती सलाहियत मौजूद है।हाँ वहाँ सफ़दर नही होंगे।जो खुद इस चमक को तोड़ गलियों में कूद गया।जो खूबसूरत,मदमस्त,चमकदार खाल वाला लड़का खुद को धूल में झोककर निकल गया।खैर आज अगर सफ़दर हाशमी को याद कीजियेगा तो उनका किरदार देखिएगा।अपनी अवाम के लिए तड़प को देखिएगा।सेमिनारों में जब तक सफ़दर का ज़िक्र होगा।जब तक कुछ जाने हुए लोगों के सामने ही सफ़दर के नाटको का मंचन होगा,तब तक सफ़दर की रूह यूँहीं बेचैन करती रहेगी।

जब तुम्हारी ढपली सुर देने का काम करे तो यह कमज़ोर होगी।जिस दिन यह ढपली पापियों के कान के पर्दे हिला दे उस दिन वोह सफ़दर के हाथ की ढपली होगी।यूँहीं नही कोई 34 की उम्र के नौजवान पर वक़्त बर्बाद करता है।उन्होंने जी कर और मरकर दिखा दिया की इंसानियत और मोहब्बत उनमें सबसे ऊपर है, बाकि सब घुटनों के नीचे।सफ़दर मेरे दिल की हलचल हैं।हो सके ढूंढ कर पढ़ना,पढ़कर उतारना और वक़्त से बिना डरे आँख में आँख डालकर बात करने की हिम्मत पैदा करना जैसे सफ़दर में थी।
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11/04/2026

नमन..... शिक्षा की ज्योत जगाने वाले सामाजिक न्याय के प्रतीक महान योद्धा को।

07/04/2026

करवट करवट जिन्हें याद करते हैं, साल दर साल उनकी कमी महसूस करते हैं । हमें नही पता था कि वह जो नेपाल की तरफ़ मुड़ गई थीं,वह बेगम नही बल्कि हमारी क़िस्मत थी,जो हमसे मुँह मोड़ रही थी । वह आज ही का तो दिन था जब अवध की शान, ताक़त,हौंसला और उम्मीद मोहम्मदी खानम यानि महक परी यानि बेगम हज़रत महल दुनिया को छोड़ गई थी। आज उनकी पुण्यतिथि है,7 अप्रैल 1879 उनकी यौम ए वफ़ात का दिन है ।

अवध की वह बेगम जिसने लपक कर 1857 की आग थामी थी। जिसने लखनऊ में अंग्रेज़ों के झण्डे को दुनिया में सबसे पहले ज़मींदोज़ किया था।नवाबो के किस्से तो खूब ज़बानों पर हैं, उनपर तो खूब बाते होती रही हैं मगर उनके ही बीच से उनकी नाज़ों में पली बढ़ी बेगम ने जब क्रांति की सख़्त तपिश सही उसका ज़िक्र कम ही होता है।

बेगम ने हर ओर मोर्चा लिया।सल्तनत की खूबसूरत ठण्डी हवाओं को सख़्त लू के थपेड़ो में बदलते देखा।अपनी नाक के नीचे खड़े पियादों को बदलते देखा।जब ज़मीन की वफ़ादारी की बात आई तो पल पल यही लखनऊ से नेपाल तक वफादारों को बालिश्त बालिश्त भर जागीरों में बिकते हुए देखा।अवध के नफीस तख्त से काठमांडू की तंग गालियों में ज़िन्दगी से लड़ने वाली मज़बूत,संवेदनशील,सहनशील और जुझारू बेगम का ज़िक्र आज तो कर ही लें।

जिस तरह 1857 में बहादुर शाह ज़फ़र को हिंदुस्तान से बाहर बर्मा में दफनाया गया,उनकी यही तड़प थी कि अपने मुल्क में दो गज ज़मीन नही मिली । उसी तरह बेगम को भी दूर नेपाल में जगह मिली ।अपने मुल्क अपने अवध की ज़मीन इतनी तंग हो गई कि उसमें बेग़म के लिए जगह ही नही बची। बेगम ने चाहा ही क्या था,अपने अवध को अंग्रेज़ जकड़न से बचाना । इस जकड़न के खिलाफ उठती आवाज़ तो कल भी चुभती थी और आज भी चुभती है । वह टूटकर, मिटकर, जूझ गई अवध को इन ज़ंजीरो से मुक्त देखने के लिए....

उन्हें पेंशन ऑफर हुई वह भी 60 रुपये माहवार से कई सौ गुना ज़्यादा मगर उन्होंने न पेंशन ली,न ईनाम लिए,न जागीरें ली ।।अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ ग़रीबी और बदहाली को चुना और अपने मुल्क से दूर आज 7 अप्रैल को ही काठमांडू में आखरी सांस ली ।

अफसोस तो तब होता है जब महिलाओं पर बराबरी और उनको आगे लाने वाले समाजसेवियों के बैनर में बेगम हजऱत महल नही होती हैं। अवध पर जान छिड़कने वालो की ज़बान पर बेगम हज़रत महल नही होती हैं।कवियों,लेखकों की गोष्ठियों में हज़रत महल नही होती हैं। हज़रत महल की ज़िन्दगी की कशमकश और मिट्टी के लिए तड़प और कभी जिस सल्तनत का सूरज न डूबता हो,उससे भिड़ जाना,कहाँ याद रहता है।

अपने घोड़े की लगाम पकड़ कर,अवध के सिपाहियों संग, अंग्रेजों को हराने वाली,कुछ वक़्त ही सही,छीनकर अपनी सत्ता वापिस लेने वाली बेग़म हमारे सर का ताज हैं ।
यही वह हैरतअंगेज़,जुझारू बेगम थी जो बिरतानियो से लड़ती हुई अपने दिल की सबसे पसंदीदा सुकून गाह से निकली। अवध की खूबसूरत सरज़मीन से रुखसत होकर नेपाल के काठमांडू में आज भी सो रही है।

ज़रा सा बेगम हज़रत महल को याद कर लीजिये शायद उनका जूझना नज़र ही आ जाए और उनके दामन में ख़ुशी का एक पल ही आए की उनके बाद के लोगों ने उन्हें याद तो रखा । शायद उनका काँटों पर चलना मखमल में बदल जाए।उनके दिल की धड़कन महसूस कीजिये वह आज भी हर बोलने वाले में ज़िंदा हैं।हर आज़ाद ख्याल में ज़िंदा हैं। बेगम मिट्टी से मोहब्बत और वफ़ादारी की एक कभी न मिटने वाली मोहर हैं । आज उनकी कब्र की तस्वीर लगाकर बस इतनी ही दुआ की जितनी तक़लीफ़,धोखे और ज़ुल्म आपने ज़िन्दगी में सहे, सब क़ब्र में फूल बनकर आपके इर्द गिर्द बिखरे रहें ।

आज हमारे लिए भी मुश्किल वक़्त है, हमारी वफाओं पर भी सवाल है, हमने भी धोखे खाए हैं मगर आपसे इतना तो सीखा ही है कि मिट जाएँगे मगर माटी से मोहब्बत और वफ़ादारी में रत्ती भर कमी नही आने देंगे, आपके पीछे चलने वाले हम लोग आपको आज खिराज ए अक़ीदत पेश करते हैं । गंगा जमुनी तहज़ीब की डोर हैं आप,जिससे हम सब बंधे हैं, नमन है आपको,कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से,आप देखिये,उस अवध की चौखट को,जो आपके जाने से इतनी उदास हुई कि कभी।पलट कर वैसे नही मुस्कुरा सकी, जैसे मुस्कुराती थी ।

बेगम का कठिनाई भरा कदम,इस मुल्क के लिए था,ग़ुलामी से लड़ने का कदम था। रानी लक्ष्मीबाई झांसी और बेगम हज़रत महल अवध और बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र और मौलवी अहमद उल्ला शाह,नाना जी,तात्या टोपे और मंगल पांडे समेत हर सेनानी,एक तरह ही सम्माम से याद किया जाएगा । यह सब एक लक्ष्य के लिये लड़े और मिट गए मगर देखिये,हमारे दिलों में आज भी ज़िन्दा हैं ।

ज़ुल्म,अन्याय,अधर्म और गुलामी के खिलाफ लड़ने वाले हमेशा ज़िन्दा रहते हैं और रहेंगे...

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