DYUS IAS

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08/04/2026

*केंद्रीय बलों में आईपीएस की तैनाती का सवाल*
(आरके विज)
(साभार दैनिक जागरण)




इन दिनों संसद की ओर से पारित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक चर्चा में है। इस विधेयक का उद्देश्य आईपीएस अधिकारियों की केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती का नियमितीकरण करना है।
इसमें यह प्रविधान है कि पुलिस महानिरीक्षक स्तर के 50 प्रतिशत पद आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। इसी प्रकार अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के न्यूनतम 67 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। जहां तक विशेष महानिदेशक एवं महानिदेशक के पदों का प्रश्न है, समस्त अर्थात सौ प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए प्रतिनियुक्ति हेतु आरक्षित रहेंगे।
चूंकि उप-महानिरीक्षक एवं कनिष्ठ स्तर के पदों के संबंध में विधेयक मौन है, इसलिए यही लगता है कि इन पदों के संबंध में नियम पूर्व अनुसार ही लागू रहेंगे। प्रस्तावित नियम पांच प्रकार के केंद्रीय बलों क्रमशः सीआरपीएफ, बीएसएफ, आइटीबीपी, सीआइएसएफ और सशस्त्र सीमा बल पर लागू होंगे।
दशकों से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आईपीएस अधिकारी तैनात रहकर अपना योगदान देते आ रहे हैं। केंद्रीय बलों की मुख्य भूमिका आंतरिक सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और औद्योगिक सुरक्षा है। ये बल राज्य पुलिस बलों की सहायता के लिए तैनात किए जाते हैं। केंद्र और राज्यों के बलों में बेहतर समन्वय के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बलों में आईपीएस अधिकारी तैनात रहें।
भारत में संघीय प्रणाली लागू है। संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत अखिल भारतीय सेवाओं का प्रविधान इसी उद्देश्य से किया गया था ताकि केंद्र और राज्यों में वे अपनी जिम्मेदारियों का निष्पादन कर सकें। केंद्रीय सशस्त्र बल माओवाद प्रभावित इलाकों, जम्मू कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकवाद से निपटने के लिए राज्यों की सहायता के लिए तैनात हैं।
उक्त विधेयक को सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के संबंध में मई 2025 में दिए गए निर्णय के खिलाफ समझा जा रहा है। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विसेज मानते हुए कुछ वित्तीय लाभ देने के आदेश दिए थे और केंद्रीय बलों के अधिकारियों की पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाने के लिए पुलिस महानिरीक्षक स्तर तक प्रतिनियुक्ति को आगामी दो साल में धीरे-धीरे कम करने का कहा था।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के आधार पर केंद्रीय बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने यह मांग रख दी कि उनकी सर्विसेज संगठित प्रकार की होने से प्रतिनियुक्ति को समाप्त किया जाए और उन्हीं के अधिकारी उनके बलों को नेतृत्व प्रदान करें। केंद्रीय बलों के कुछ अधिकारियों ने भी प्रतिनियुक्ति के खिलाफ मोर्चा सा खोल दिया। यह किसी भी अनुशासित बल को शोभा नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के अपने आदेश में कहा था कि केंद्रीय बलों के काडर की समीक्षा की जाए और उनके भर्ती नियमों और सेवा शर्तों में आवश्यक बदलाव किया जाए। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय बलों को एक संगठित ग्रुप मानते हुए यह नहीं कहा था कि आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति न की जाए। इसके बजाय सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि केंद्र एवं राज्यों में बेहतर तालमेल के लिए आईपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर इन बलों में तैनात करना एक नीतिगत निर्णय है, जो सरकार को लेना है।
केंद्रीय बलों को आईपीएस अफसरों द्वारा नेतृत्व प्रदान करने और वरिष्ठ पदों पर तैनात होने पर न तो सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कहा और न ही यह विवाद का मुद्दा था। इसलिए महानिदेशक सहित वरिष्ठ पदों पर तैनाती के मुद्दे पर किसी बहस का प्रश्न नहीं उठता। वैसे भी राज्यों में आपरेशन संबंधी गतिविधियों के समन्वय के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक या विशेष पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी तैनात रहते हैं।
आईपीएस अधिकारी अति कठिन राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के माध्यम से सर्विस में दाखिल होते हैं। उनके विशिष्ट प्रशिक्षण और मैदानी अनुभव के कारण उनकी केंद्रीय सशस्त्र बलों में तैनाती एक उचित निर्णय है। अखिल भारतीय सेवाओं के जनक और स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा भारतीय पुलिस सेवा का गठन इस उद्देश्य से किया गया था, ताकि संघीय प्रणाली सुचारु रूप से चल सके।
आईपीएस अफसरों ने बीते दशकों में सरदार पटेल के सपनों को साकार किया है। उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन अफसरों ने केंद्रीय बलों को सींचा है और उन्हें सक्षम नेतृत्व प्रदान किया है। जहां तक महानिरीक्षक स्तर तक प्रतिनियुक्ति को कम करने का प्रश्न है, यह सरकार का एक नीतिगत निर्णय है और सुप्रीम कोर्ट का इसमें दखल देना उचित प्रतीत नहीं होता।
न्यायपालिका का क्षेत्राधिकार कानून की व्याख्या करना है, न की नीति बनाना या उसमें हस्तक्षेप करना, जब तक कि वह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करे या वह मनमानी हो। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि कोर्ट को नीतिगत निर्णय में दखल देने की आवश्यकता नहीं है और न ही वह अपने को अपीलीय प्राधिकार के रूप में रख सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंडियन एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट बनाम यूनियन आफ इंडिया’ (2022) मामले में भारत सरकार की ‘वन रैंक-वन पेंशन’ सिद्धांत को नीतिगत निर्णय कहते हुए उसमें दखल देने से मना किया था। अतः केंद्र का केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आईपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर आपरेशनल और फंक्शनल आवश्यकता के अनुसार तैनात करने का अधिकार एक नीतिगत निर्णय है।
संसद में केंद्रीय मंत्री द्वारा बताया गया कि केंद्रीय पुलिस बलों के अफसरों के पदोन्नति के चार अवसर लगभग सुनिश्चित हैं। इसके अलावा उनकी बड़ी संख्या में एक साथ भर्ती करने के बजाय प्रत्येक वर्ष भर्ती कर पदोन्नति के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। इस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा उपरोक्त विधेयक द्वारा आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के संबंध में समस्त पुराने विवादों को समाप्त करने के उद्देश्य से यह एक स्वागतयोग्य कदम है।
(लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी हैं)

04/04/2026

*विचार: लैंगिक समानता को बल देने वाली पहल*




विश्व जल दिवस के अवसर पर यह लेख वैश्विक जल संकट और महिलाओं पर इसके प्रभाव पर प्रकाश डालता है। दुनिया भर में करोड़ों लोग पेयजल से वंचित हैं, और पानी लाने की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं व लड़कियों पर पड़ती है, जिससे उनकी शिक्षा और अवसरों में बाधा आती है

By Ritu Saraswat

ऋतु सारस्वत। गर्मियां शुरू हो चुकी हैं और इसी के साथ जल संकट के दिन आने वाले है। ऐसे ही माहौल में बीते दिनों विश्व जल दिवस मनाया गया। 1993 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जा रहा यह दिवस जल को जीवन, विकास और मानव अधिकार के रूप में स्थापित करने के वैश्विक प्रयासों का प्रतीक है, किंतु इस औपचारिकता के पीछे एक कठोर सच्चाई आज भी यथावत है। यह सच्चाई केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देती है।

फिजी के एक तटीय गांव में रहने वाली छह वर्षीय लैसानी घर के पास पानी के टैंक से वर्षा जल एकत्र करती है। वह प्लास्टिक की बोतलों में पानी भरकर घर लाती है, जहां पीने से पहले उसे उबाला जाता है। उसके परिवार के लिए वर्षा जल ही सुरक्षित पानी का मुख्य स्रोत है। इसे उपयोग योग्य बनाए रखना उनके दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि तथ्य बताते हैं कि विश्व में लगभग 1.8 अरब लोगों के घरों में पेयजल उपलब्ध नहीं है।

हर तीन में से दो परिवारों में पानी लाने की जिम्मेदारी मुख्यतः महिलाओं और लड़कियों पर होती है। पानी लाने और उसके प्रबंधन में खपने वाला समय अक्सर लड़कियों की शिक्षा में बाधा, स्वास्थ्य जोखिमों में वृद्धि और सीमित अवसरों का कारण बनता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार वैश्विक स्तर पर महिलाएं और लड़कियां प्रतिदिन लगभग 25 करोड़ घंटे पानी एकत्र करने में व्यतीत करती हैं। यह केवल समय का आंकड़ा नहीं, बल्कि वे असंख्य अवसर हैं, जो शिक्षा, कौशल विकास, मनोरंजन या आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में परिवर्तित हो सकते थे। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि 15 वर्ष से कम आयु की लड़कियों (7 प्रतिशत) के पानी लाने की संभावना समान आयु के लड़कों (4 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है। यह लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

यूएन वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट 2026 यह रेखांकित करती है कि जल संकट केवल संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न नहीं, बल्कि समान अधिकारों और अवसरों से जुड़ा हुआ एक गहरा सामाजिक प्रश्न है। घरों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता के अभाव का सबसे अधिक भार महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है, जो अधिकांश परिवारों में पानी लाने की प्राथमिक जिम्मेदारी निभाती हैं। जब सुरक्षित जल घर के निकट उपलब्ध होता है, तो लड़कियों के स्कूल में बने रहने की संभावना बढ़ती है और महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए समय मिलता है।

शहरी झुग्गी बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों तथा मासिक धर्म स्वच्छता के लिए पर्याप्त जल का अभाव न केवल शारीरिक असुविधा का कारण बनता है, बल्कि महिलाओं और किशोरियों के लिए शर्मिंदगी, असुरक्षा और सामाजिक बहिष्करण की स्थिति भी उत्पन्न करता है। विडंबना यह है कि 50 से कम ही देशों में ऐसी नीतियां हैं, जो ग्रामीण स्वच्छता और जल संसाधन प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी का स्पष्ट उल्लेख करती हैं।

जहां वैश्विक स्तर पर नीतिगत असंतुलन अब भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, वहीं भारत ने इस चुनौती का समाधान खोजने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है। जल जीवन मिशन के माध्यम से भारत ने न केवल जल उपलब्धता के प्रश्न को संबोधित किया है, बल्कि जल प्रबंधन में व्याप्त लैंगिक असमानता को भी दूर करने का प्रयास किया है। 2019 में प्रारंभ जल जीवन मिशन, जिसे ‘हर घर जल’ के रूप में भी जाना जाता है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार तक नल से स्वच्छ जल पहुंचाने का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है।

इसे दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया गया है। मार्च 2026 तक इस मिशन के अंतर्गत लगभग 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवारों को उनके घरों में पाइप जल कनेक्शन उपलब्ध कराया जा चुका है, जो कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 81 प्रतिशत से अधिक है। इस तरह जल जीवन मिशन ने लैंगिक समानता की दिशा में एक अभूतपूर्व और अनुकरणीय कार्य किया है।

घर या घर के निकट जल उपलब्ध होने से महिलाओं का समय शिक्षा, आजीविका और अन्य उत्पादक गतिविधियों में लगता है। भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, ‘जल जीवन मिशन के परिणामस्वरूप लगभग नौ करोड़ महिलाओं को पानी लाने के दैनिक श्रम से मुक्ति मिली है। यह केवल श्रम में कमी नहीं, बल्कि उनके समय और ऊर्जा के पुनर्संयोजन का संकेत है। महिलाओं की कृषि एवं अन्य उत्पादक गतिविधियों में भागीदारी में वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह स्पष्ट करती है कि जल तक आसान पहुंच सीधे तौर पर महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ती है।

इस मिशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका लैंगिक दृष्टिकोण है। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी को अनिवार्य कर सरकार ने महिलाओं को केवल जल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की निर्णयकर्ता के रूप में स्थापित किया है।

जल समाधान में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को केंद्र में रखा जाना आवश्यक है, ताकि वे केवल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और नीति निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भागीदार बन सकें। भारत ने जल जीवन मिशन के माध्यम से इस विचार को व्यवहार में रूपांतरित करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, परंतु यह केवल आरंभ है और इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

(लेखिका समाजशास्त्री हैं)

27/03/2026

*कम उम्मीदें, गहरी मतभेद: डब्ल्यूटीओ सम्मेलन से निरंतरता की ओर संकेत*
(अजय श्रीवास्तव)
(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड)




विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी14) के लिए 166 देशों के व्यापार मंत्री 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंडे में मिल रहे हैं। यह सम्मेलन वैश्विक व्यापार नियमों के लिए प्राथमिकता तय करने और उन पर बातचीत करने के लिए संगठन का सर्वोच्च मंच है।
वैश्विक व्यापार के 98 फीसदी हिस्से (35 लाख करोड़ डॉलर से अधिक मूल्य) को नियंत्रित करने वाली संस्था से इस बार उम्मीदें कम हैं, क्योंकि इसकी दिशा को लेकर गहरे मतभेद हैं। भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के नेतृत्व में एक समूह आम सहमति, समावेशिता और विकास एवं व्यापार के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता है। दूसरी ओर विकसित देशों के नेतृत्व में दूसरा समूह त्वरित निर्णय और छोटे समूह समझौतों पर जोर दे रहा है, जो अक्सर डब्ल्यूटीओ के मूल सिद्धांतों की कीमत पर होता है।
पहला समूह चेतावनी देता है कि यह बदलाव डब्ल्यूटीओ की बहुपक्षीय नींव को कमजोर कर सकता है और विकास संबंधी चिंताओं को दरकिनार कर सकता है, प्रभावी रूप से उस सीढ़ी को हटा सकता है जिसने कभी समृद्ध देशों के औद्योगीकरण में मदद की थी। यह मतभेद डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में अधिकांश असहमति का मूल कारण है।
सम्मेलन के छह प्रमुख मुद्दे और उनके संभावित परिणाम इस प्रकार हैं:
कृषि: यह भारत के डब्ल्यूटीओ एजेंडा का प्रमुख हिस्सा बना हुआ है, जिसमें खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडार को डब्ल्यूटीओ के अनुरूप मानने की प्रमुख मांग शामिल है। मुख्य समस्या डब्ल्यूटीओ के दोषपूर्ण सब्सिडी फॉर्मूले में निहित है, जो 1986-88 की संदर्भ कीमतों का उपयोग करता है और भारत के समर्थन अनुमानों को सात से आठ गुना बढ़ा देता है, जिससे यह कृत्रिम रूप से सीमा उल्लंघन के करीब पहुंच जाता है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ इस फॉर्मूले में संशोधन करने में रुचि नहीं रखते और व्यापार विकृति के जोखिमों का हवाला देते हुए व्यापक छूटों का विरोध करते हैं, जिसके चलते भारत के पास 2013 से केवल एक अस्थायी ‘शांति खंड’ ही बचा है। कुछ देशों द्वारा पिछली प्रतिबद्धताओं को फिर से खोलने की कोशिश और मतभेदों के चलते, सम्मेलन में किसी सफलता की संभावना बहुत कम है।
ई-कॉमर्स पर छूट: इस पर पहली बार 1998 में सहमति बनी। यह इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन, जैसे डाउनलोड और डिजिटल सामग्री पर सीमा शुल्क को प्रतिबंधित करता है। अमेरिका के नेतृत्व में विकसित देश इसे स्थायी बनाना चाहते हैं, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के डेटा और सेवाओं की ओर बढ़ने के साथ-साथ शुल्क-मुक्त डिजिटल व्यापार सुनिश्चित हो सके।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के बल पर डिजिटल अर्थव्यवस्था के आज के लगभग 16 लाख करोड़ डॉलर से बढ़कर अगले दो दशकों में लगभग 50 लाख करोड़ डॉलर होने का अनुमान है। इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन के लिए यह सीमा शुल्क-मुक्त व्यवस्था मुख्य रूप से उन अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को लाभ पहुंचाती है जो सीमा पार डिजिटल व्यापार पर हावी हैं।
भारत और अन्य विकासशील देशों का तर्क है कि व्यापार के भौतिक वस्तुओं से डिजिटल प्रारूपों में स्थानांतरित होने के कारण यह स्थगन उनके भविष्य के कर आधार को कमजोर करता है। वे इसके दायरे पर भी सवाल उठाते हैं। अधिकांश विकासशील देशों का मानना है कि डिजिटल रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाएं इस स्थगन से बाहर हैं, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी इन्हें इसमें शामिल करना चाहते हैं। सम्मेलन में इस पर एक और अस्थायी विस्तार होने की संभावना है, जिससे असहज समझौते को बरकरार रखा जा सके।
बहुपक्षीय समझौते: ये समझौते डब्ल्यूटीओ के लिए एक प्रणालीगत चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। भारत इनका विरोध करता है। उसका तर्क है कि ये कुछ देशों को ऐसे समझौते करने की अनुमति देकर सर्वसम्मति-आधारित नियम निर्माण को कमजोर करते हैं जिन्हें बाद में डब्ल्यूटीओ में लाया जाता है। इससे विकसित अर्थव्यवस्थाएं विकासशील देशों के लिए महत्त्वपूर्ण मुद्दों, जैसे कृषि सब्सिडी और विशेष एवं भेदभावपूर्ण व्यवहार, को नजरअंदाज करते हुए अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा सकती हैं, जिससे कुछ देशों के प्रभुत्व वाली दो-स्तरीय प्रणाली का खतरा पैदा हो सकता है।
सम्मेलन में भारत पर विकास के लिए निवेश सुविधा (आईएफडी) समझौते का विरोध न करने का दबाव है, जो अधिक बहुपक्षीय समझौतों को अपनाने के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है। इससे पहले के सम्मेलन में भारत को दक्षिण अफ्रीका का साथ मिला था लेकिन अब भारत अकेला पड़ सकता है क्योंकि चीन की बेल्ट ऐंड रोड पहल से जुड़े अन्य अफ्रीकी देशों के दबाव में दक्षिण अफ्रीका का रुख बदलता दिख रहा है।
विशेष एवं विभेदक व्यवहार (एसडीटी): इस पर बहस डब्ल्यूटीओ में मौजूद एक गहरी दरार को उजागर करती है। विकासशील देशों ने 1995 में बौद्धिक संपदा और सेवाओं पर कड़े नियमों को स्वीकार किया था, जिसके बदले उन्हें संक्रमण काल की लंबी अवधि और नीतिगत स्वतंत्रता जैसी लचीली व्यवस्थाएं मिली थीं। अब यह समझौता तनाव में है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ का तर्क है कि बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अब ऐसे लाभ नहीं मिलने चाहिए और वे चाहते हैं कि एसडीटी मुख्य रूप से सबसे कम विकसित देशों तक ही सीमित रहे। भारत का कहना है कि विकास में अंतर अभी भी बहुत अधिक है और मूल समझौते पर पुनर्विचार किए बिना एसडीटी को हटाने से व्यवस्था और भी अधिक असमान हो जाएगी। यह विवाद निष्पक्षता और वैधता के मूल में है, और इस बार के सम्मेलन में इसका कोई समाधान संभव नहीं लगता है।
डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान प्रणाली: कभी इसका सबसे मजबूत स्तंभ रही यह प्रणाली अब कमजोर हो चुकी है। अमेरिका द्वारा नए सदस्यों की नियुक्ति पर रोक लगाने के बाद दिसंबर 2019 से अपील निकाय निष्क्रिय पड़ा है। हालांकि पैनल फैसले जारी करते रहते हैं, लेकिन अपीलें निरर्थक बनी रहती हैं, जिससे अंतिम निर्णय लेने में बाधा आती है और प्रवर्तन कमजोर हो जाता है। अंतरिम व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन वे आंशिक और खंडित हैं। भारत पूर्णतः कार्यशील दो-स्तरीय प्रणाली को बहाल करने का समर्थन करता है, लेकिन सुधारों पर व्यापक असहमति अभी भी अनसुलझी है। सम्मेलन से इसमें कोई बदलाव आने की संभावना नहीं है।
निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार: यह भी उतना ही विवादास्पद मुद्दा है। विकसित देश तर्क देते हैं कि सर्वसम्मति का सिद्धांत प्रगति को धीमा करता है और वे अधिक लचीले दृष्टिकोणों की वकालत करते हैं, जिसमें बहुपक्षीय संगठनों पर अधिक निर्भरता शामिल है। भारत और अन्य देश सर्वसम्मति को इस प्रणाली की नींव मानते हैं, जो यह सुनिश्चित करती है कि सभी सदस्य देशों, चाहे वे बड़े हों या छोटे, उनको समान अधिकार प्राप्त हों। इसे कमजोर करने से शक्ति प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की ओर स्थानांतरित हो जाएगी और डब्ल्यूटीओ के विकास संबंधी आयाम कमजोर हो जाएंगे। इस मुद्दे पर भी चर्चा बिना किसी समाधान के जारी रहेगी।
सम्मेलन में सबसे संभावित परिणाम निरंतरता ही हो सकती है, न कि कोई क्रांतिकारी बदलाव। सत्र का विस्तार और अधिक वार्ताएं हो सकती हैं तथा कुछ ही निर्णय लिए जा सकते हैं। भारत के लिए नीतिगत स्वतंत्रता को बनाए रखने और तेजी से विभाजित हो रही व्यवस्था में प्रभावी गठबंधन का निर्माण करने की चुनौती होगी।
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(लेखक जीटीआरआई के संस्थापक हैं)

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