Vivek Mishra
06/05/2025
मिलिऐ कुछ अजीब दाढ़ी मूछ वालों से
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24/08/2023
रामचरितमानस में वर्णित,रहस्यमई “चूडामणि” का अदभुत रहस्य !!!!!!!
आज हम रामायण में वर्णित चूडामणि की कथा बता रहे है। इस कथा में आप जानेंगे की- कहाँ से आई चूडा मणि ? किसने दी सीता जी को चूडामणि ? क्यों दिया लंका में हनुमानजी को सीता जी ने चूडामणि ? कैसे हुआ वैष्णो माता का जन्म?
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥
भावार्थ:-पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा सा रूप धारण कर हनुमान्जी श्री जानकीजी के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए॥
* मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
भावार्थ:-(हनुमान्जी ने कहा-) हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिए, जैसे श्री रघुनाथजी ने मुझे दिया था। तब सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्जी ने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥
चूडामणि कहाँ से आई?
सागर मंथन से चौदह रत्न निकले, उसी समय सागर से दो देवियों का जन्म हुआ –
१– रत्नाकर नन्दिनी
२– महालक्ष्मी
रत्नाकर नन्दिनी ने अपना तन मन श्री हरि ( विष्णु जी ) को देखते ही समर्पित कर दिया ! जब उनसे मिलने के लिए आगे बढीं तो सागर ने अपनी पुत्री को विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य रत्न जटित चूडा मणि प्रदान की ( जो सुर पूजित मणि से बनी) थी।
इतने में महालक्षमी का प्रादुर्भाव हो गया और लक्षमी जी ने विष्णु जी को देखा और मनही मन वरण कर लिया यह देखकर रत्नाकर नन्दिनी मन ही मन अकुलाकर रह गईं सब के मन की बात जानने वाले श्रीहरि रत्नाकर नन्दिनी के पास पहुँचे और धीरे से बोले ,मैं तुम्हारा भाव जानता हूँ, पृथ्वी को भार- निवृत करने के लिए जब – जब मैं अवतार ग्रहण करूँगा , तब-तब तुम मेरी संहारिणी शक्ति के रूपमे धरती पे अवतार लोगी , सम्पूर्ण रूप से तुम्हे कलियुग मे श्री कल्कि रूप में अंगीकार करूँगा अभी सतयुग है तुम त्रेता , द्वापर में, त्रिकूट शिखरपर, वैष्णवी नाम से अपने अर्चकों की मनोकामना की पूर्ति करती हुई तपस्या करो।
तपस्या के लिए बिदा होते हुए रत्नाकर नन्दिनी ने अपने केश पास से चूडामणि निकाल कर निशानी के तौर पर श्री विष्णु जी को दे दिया वहीं पर साथ में इन्द्र देव खडे थे , इन्द्र चूडा मणि पाने के लिए लालायित हो गये, विष्णु जी ने वो चूडा मणि इन्द्र देव को दे दिया , इन्द्र देव ने उसे इन्द्राणी के जूडे में स्थापित कर दिया।
शम्बरासुर नाम का एक असुर हुआ जिसने स्वर्ग पर चढाई कर दी इन्द्र और सारे देवता युद्ध में उससे हार के छुप गये कुछ दिन बाद इन्द्र देव अयोध्या राजा दशरथ के पास पहुँचे सहायता पाने के लिए इन्द्र की ओर से राजा दशरथ कैकेई के साथ शम्बरासुर से युद्ध करने के लिए स्वर्ग आये और युद्ध में शम्बरासुर दशरथ के हाथों मारा गया।
युद्ध जीतने की खुशी में इन्द्र देव तथा इन्द्राणी ने दशरथ तथा कैकेई का भव्य स्वागत किया और उपहार भेंट किये। इन्द्र देव ने दशरथ जी को ” स्वर्ग गंगा मन्दाकिनी के दिव्य हंसों के चार पंख प्रदान किये। इन्द्राणी ने कैकेई को वही दिव्य चूडामणि भेंट की और वरदान दिया जिस नारी के केशपास में ये चूडामणि रहेगी उसका सौभाग्य अक्षत–अक्षय तथा अखन्ड रहेगा , और जिस राज्य में वो नारी रहे गी उस राज्य को कोई भी शत्रु पराजित नही कर पायेगा।
उपहार प्राप्त कर राजा दशरथ और कैकेई अयोध्या वापस आ गये। रानी सुमित्रा के अदभुत प्रेम को देख कर कैकेई ने वह चूडामणि सुमित्रा को भेंट कर दिया। इस चूडामणि की समानता विश्वभर के किसी भी आभूषण से नही हो सकती।
जब श्री राम जी का व्याह माता सीता के साथ सम्पन्न हुआ । सीता जी को व्याह कर श्री राम जी अयोध्या धाम आये सारे रीति- रिवाज सम्पन्न हुए। तीनों माताओं ने मुह दिखाई की प्रथा निभाई।
सर्व प्रथम रानी सुमित्रा ने मुँहदिखाई में सीता जी को वही चूडामणि प्रदान कर दी। कैकेई ने सीता जी को मुँह दिखाई में कनक भवन प्रदान किया। अंत में कौशिल्या जी ने सीता जी को मुँह दिखाई में प्रभु श्री राम जी का हाथ सीता जी के हाथ में सौंप दिया। संसार में इससे बडी मुँह दिखाई और क्या होगी। जनक जीने सीता जी का हाथ राम को सौंपा और कौशिल्या जीने राम का हाथ सीता जी को सौंप दिया।
राम की महिमा राम ही जाने हम जैसे तुक्ष दीन हीन अग्यानी व्यक्ति कौशिल्या की सीता राम के प्रति ममता का बखान नही कर सकते।
सीताहरण के पश्चात माता का पता लगाने के लिए जब हनुमान जी लंका पहुँचते हैं हनुमान जी की भेंट अशोक वाटिका में सीता जी से होती है। हनुमान जी ने प्रभु की दी हुई मुद्रिका सीतामाता को देते हैं और कहते हैं –
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा,जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा।
चूडामणि उतारि तब दयऊ,हरष समेत पवन सुत लयऊ।
सीता जी ने वही चूडा मणि उतार कर हनुमान जी को दे दिया , यह सोंच कर यदि मेरे साथ ये चूडामणि रहेगी तो रावण का बिनाश होना सम्भव नही है। हनुमान जी लंका से वापस आकर वो चूडामणि भगवान श्री राम को दे कर माताजी के वियोग का हाल बताया।
23/08/2023
*औषधियों में विराजमान है 9 दुर्गा*
1 - माँ शैलपुत्री - (हरड़ ) = कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है यह आयुर्वेद की प्रदान औषधि है यह पथया, हरितिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी, सात प्रकार की होती है !
2 - माँ ब्रह्मचारिणी - ( ब्राह्मी ) = ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर रक्त विकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है !
3 - माँ चंद्रघंटा - ( चंदू सुर ) = यह एक ऐसा पौधा है जो धनिया के समान है यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभदायक है इसलिए इसे चर्म हन्ति भी कहते है !
4 - माँ कुष्मांडा - ( पेठा ) = इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है इसलिए इस रूप को पेठा कहते है इसे कुम्हड़ा भी कहते है जो रक्त विकार दूर कर पेट साफ़ करने में सहायक है मानसिक रोगों में यह अमृत समान है !
5 - माँ स्कंदमाता - ( अलसी ) = देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विराजमान है यह वात , पित , व कफ रोगों की नाशक औषधि है !
6 - माँ कात्यायनी - ( मोइया ) = देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामां से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका इसके अलावा इन्हें मोइ या भी कहते है यह औषधि कफ, पित व गले के रोगों का नाश करती है !
7 - माँ कालरात्रि - ( नागदौन )= यह देवी नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती है यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी है और मन एवं मष्तिष्क के विकारो को दूर करने वाली औषधि है !
8 - माँ महागौरी - ( तुलसी ) = तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुठे, रक, अर्जक और षट् पत्र यह रक्त को साफ कर ह्रदय रोगों का नाश करती है !
9 - माँ सिद्धिदात्री - ( शतावरी ) = दुर्गा माँ का नोवां रूप सिद्धिदात्री है जिसे नारायणी शतावरी कहते है यह बल, बुद्धि, एवं विवेक के किये बहुत लाभदायक है !
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