AmitVerma53
14/05/2026
हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव में 'सोमदत्त' नाम का एक मूर्तिकार रहता था। उसे काम सौंपा गया कि वह एक विशाल शिला को तराशकर उसे मंदिर के गर्भगृह के लिए शिव स्वरूप प्रदान करे। महीनों की मेहनत के बाद, जब वह विशाल पत्थर तैयार हुआ, तो उसे एक बड़े ट्रक पर लादकर ले जाया जाने लगा।
पूरे रास्ते लोग उस पत्थर पर फूल बरसा रहे थे, भजन गा रहे थे और हाथ जोड़कर खड़े थे। उसी भीड़ में एक बूढ़ा फकीर खड़ा मुस्कुरा रहा था। सोमदत्त ने उस फकीर से पूछा, "बाबा, सब लोग भगवान के आगे नतमस्तक हैं, आप मुस्कुरा क्यों रहे हैं?"
फकीर ने शांति से उत्तर दिया, "बेटा, ये लोग पत्थर को देख रहे हैं, और तुम अपनी कला को। लेकिन महादेव कहाँ हैं, ये कोई नहीं देख रहा।"
सोमदत्त उलझ गया। उसने पूछा, "क्या इस शिला में महादेव नहीं हैं?"
फकीर ने पत्थर की ओर इशारा करते हुए कहा, "महादेव इस पत्थर में तब तक नहीं आएंगे, जब तक इसे ले जाने वाला ड्राइवर थके हुए राहगीर को रास्ता न दे दे, जब तक इसे पूजने वाला अपने पड़ोस के भूखे बच्चे को रोटी न खिला दे। महादेव 'इग्नोर' (अनदेखा) करने से रुष्ट नहीं होते, महादेव तब रुष्ट होते हैं जब इंसान इंसानियत को इग्नोर कर देता है।"
कहानी की सीख:
सच्ची भक्ति किसी पत्थर को फूल चढ़ाने में नहीं, बल्कि शिव के गुणों—धैर्य, करुणा और परोपकार—को अपने जीवन में उतारने में है। जिस दिन हम दूसरों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं, उसी दिन हमारे भीतर का शिव जागृत होता है।
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