SID
#बुद्धपूर्णिमा
काम धाम कुछ न करो,
मूर्ति करेगी नौका पार ❌
बुद्ध सम कर्मठ बनो,
अन्य प्रयोजन सब बेकार।✅
-- मरासिम
खुद इंसां ही इंसां का दुश्मन
दुश्मन पर नीर बहाए कौन?
मार्मिकता क्या,बस थोथी बातें
थोथेपन पर शोक मनाए कौन?
मरासिम क्या सीखा क्या जाना
सच कह कर सीस कटाए कौन?
तू बैठ किनारे देखा कर मंज़र
दानवों संग वक्त गंवाए कौन?
पी चिल्लम और दिख कुछ पागल
व्यर्थ समझदार कहलाए कौन?
मरासिम घूम बन कर बेगाना
बंसी बजा हो जाएं मौन।
-- मरासिम
ड्रोन पर भारी पतंग, देख सारे रह गए दंग, किसान नेता का निराला है ढंग, जंग में भी पंजाबी मस्त मलंग।
पर है खेद मुझको देख सत्ता के बेशरम रंग, भारत की धरती पर ये कैसा छाया हुड़दंग, है अश्रुपूर्ण मेरा अंग अंग, सत्ता के नशे ने काटी अन्नदाता की स्वच्छंद पतंग।
जनता भी है अवाक बैठी है राम संग, देख कर कर रही अनदेखा राम छल संग।
-- मरासिम
_injustice
मूर्तियाँ बोलती हैं।
खुद पर हुए अनंत दर्द की बात
खुद बनती हैं कई जुल्मों का हिसाब
बताती हैं उनके बनने से हुए जनता के कष्ट की दास्तां
कोसती हैं अपने वक्त के राजा को
कहती हैं जनता के पैसे के दुरुपयोग की कहानी
दिखाती हैं युगों युगों की मूर्खता का दर्पण
खोजती हैं कई सवालों के जवाब
बसती है एक रूह उनमें भी
जो करती हैं रुदन बेहिसाब
रोती हैं फफक फफक कर हर युग की देख दशा
कौन कहता है मूर्ति में नहीं दिखते जज़्बात?
मूर्तियाँ सच में बोलती हैं।
मरासिम
दोहा
शिक्षित अनपढ़ जो रहें,देते पैसे घूस।
कैसे फिर अंतर करें,सम जैसे महसूस।।
शिक्षित अनपढ़ मानते,ढोंग और पाखण्ड।
देते दोनों सत्य को,करनी के बल दण्ड।।
पशु जैसे कुछ आदमी,करते हैं व्यवहार।
दोनों में अंतर नहीं,करते अत्याचार।।
पढ़े लिखे अनपढ़ सभी,पीते खूब शराब।
समझदार किसको कहें,दोनों अगर ख़राब।।
शिक्षित अनपढ़ हैं बहुत,कैसे उनमें फ़र्क़।
चलें अन्धविश्वास में,करे नहीं जब तर्क।।
भूत-प्रेत को मानते,शिक्षित सब इंसान।
अनपढ़ शिक्षित नित यहाँ,लगते एक समान।।
माना करते आदमी,जीवन भर भगवान।
रिश्वतखोरी त्यागते,कभी नहीं इंसान।।
शिक्षित अनपढ़ मानते,सभी टोटके रोज़।
दोनों में अंतर नहीं,करले कितनी खोज।।
राजकिशोर धिरही
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