Journalist Ashutosh
15/10/2022
शहर-ए-ख़ास (बनारस)
“उत्तर प्रदेश की काशी पवित्रता इसकी रूह हैं
जिस्म इसकी संस्कृति,श्रृंगार इसका सुकून हैं
घाटो से संवरती है यह, लहरों से निखरती हैं
महादेव के आशीर्वाद से ये नगरी हर पल चमकती है”॥
जी हां हम बात कर रहे हैं भारत के सुप्रसिद्ध शहर बनारस की। जिसे देश ही नही बल्कि दुनिया के सबसे प्राचीनतम शहरों की फ़ेहरिश्त में शुमार किया जाता है । भारत की सबसे पवित्र नदी गंगा के किनारे बसे होने के कारण और शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक “विश्वनाथ या विश्वेश्वर”जी मंदिर की वजह से यह स्थान समूचे विश्व में हिंदुओं की आस्था का एक प्रमुख केंद्र रहा है।इसलिए इसे अध्यात्म नगरी के नाम से भी जाना जाता है। तो चलिए हमारे साथ इस आध्यात्म नगरी की एक छोटी यात्रा पर और देखते हैं इस शहर के रूप और रंग की एक झलक।
बनारस नगरी का नाम सुनते ही जैसे मन में अलग ही आस्था उत्पन्न हो जाती है, यह पावन नगरी कितनी पौराणिक और धार्मिक है इसकी कल्पना मन में एक रोमांच पैदा कर देती है, हमारे आदि पुराणों में भी इस शहर का उल्लेख किया गया है, पहले काशी फिर बनारस और फिर वाराणसी और भी कई नामो में इसे जाना जाता है। बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद से यह नगरी महादेव की नगरी भी कही जाती है ।
दरअसल वनारस को उसका नाम यहां बहने वाली दो नदियों की वजह से मिला। यहां वरुणा और अस्सी नदियां प्रवाहित होने से दोनों नदियों के नाम को मिलाकर संयुक्त रूप से इस नगरी को वाराणसी कहा जाता है।
माँ गंगा का पावन मोक्ष्दायनी जल और शांत आनंदमयी धाटों का अनुभव कितना मनमोहक होता है शायद यहाँ आने वाले सभी लोग जानते होगे….बनारस की कुछ अलग ही बात है, जो हर शहर से भिन्न है, बनारस की साड़ियाँ, यहाँ का प्रशिद्ध पान, पुरानी विरासतों का शहर, चार विश्वप्रसिद्ध विस्वविध्यालय और भी बहुत कुछ है जो बनारस को ख़ास बनाता है।
जब बात हो रही हो बनारस की तो यहां की गलियों के ज़िक्र के बिना इस शहर की बात अधूरी सी लगती है, यह गालियां अनायास ही यहाँ आने वाले लोगों का दिल जीत लेती हैं, रंग बिरंगी मालाओं, आभूषणों और रामनामी कपड़ो से भरी दुकानें इन गलियों को हमेशा गुलज़ार रखती हैं
बनारस शहर अपने आप मे ही कई विरासत समेटे हुए है, फिर चाहे वो बनारसी पान ,बनारसी साड़ी या बनारसी शास्त्रीय संगीत क्यों न हो ।
यूँ तो बनारस में कुल 84 घाट हैं और काशी के सभी घाट बहुत मनोरम हैं,लेकिन इनमे से भी कुछ घाट ऐसे हैं जिनका पौराणिक दृष्टि से विशेष महत्व है । यहां हर घाट की अपनी एक अनोखी और रोचक कथा है।
इन घाटों पर बनारस एक अलग ही रंग रूप में नज़र आता है जिधर भी नज़र जाती है चारों तरफ रंग बिरंगे नांव, छोटी छोटी दुकाने और इंन सबके साथ यहां आने वाले श्रद्धालु और साधु संत सब मिलकर गंगा किनारे इन घाटों की सुंदरता को और बढ़ा देते हैं।
यूँ तो इन घाटों पर हमेशा ही लोगों की भीड़ होती है
लेकिन शाम के समय यह घाट लोगों की भीड़ से गुलज़ार नज़र आते हैं और लोगों को अपनी चकाचौंध व डमरू की आवाज़ से अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
क्योंकि हर रोज़ शाम के समय इन घाटों पर माँ गंगा की आरती का वृहंगम दृश्य देखने को मिलता है, आरती के इस मनमोहक दृश्य को देखने के लिए रोजाना यहां लगभग 20 हज़ार से भी ज़्यादा लोग आते हैं।
वाराणसी(काशी) जिसे भगवान शिव की नगरी भी कहा जाता है। मान्यता है कि वह काशी भगवान भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी है, वैसे तो यह कथन बहुत प्राचीन है, लेकिन आज भी कहा जाता है कि काशी इस पृथ्वी पर नहीं, बल्कि भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है। वे जटा में जहां गंगा को धारण करते हैं, वहीं अपने त्रिशूल पर काशी को स्थान देते हैं।
पौराणिक ग्रंथों में त्रिशूल और काशी के बीच बहुत निकट के संबंध को बताया गया है। त्रिशूल से भगवान शिव भक्तों को अभय रहने का वरदान देते हैं और इसी से दुष्टों को दंड भी देते हैं।
त्रिशूल पर काशी को धारण करने का अर्थ है- काशी की प्राचीनता, पवित्रता की स्वयं भोलेनाथ रक्षा करते हैं। विभिन्न ग्रंथों में कहा गया है कि काशी में भगवान शिव अखंड वास करते हैं। यह बाबा विश्वनाथ की नगरी है जो संपूर्ण विश्व के नाथ हैं।
मनुष्य के जीवन में तीन तरह के कष्ट माने जाते हैं- दैविक, दैहिक और भौतिक। काशी के कण-कण में भगवान शिव का वास है। यहां शिव के दर्शन करने से ये तीनों ताप दूर होते हैं तथा जीवन में शीतलता का आगमन होता है। शिव के त्रिशूल से इन तीनों का शमन होता है। इसलिए कहा जाता है कि काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है।
ऐसी मान्यता है कि जो बनारस (काशी) में देहत्याग करता है, भगवान शिव स्वयं उसके कान में मुक्ति का मंत्र फूंकते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि यहां प्राण त्यागने पर आत्मा इस नश्वर शरीर को त्याग कर सीधा स्वर्गलोक में प्रवेश करती है, शायद इसीलिए यहां विश्व का सबसे बड़ा शमशान मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट स्थित है इन दोनों घाटों की मान्यता है कि यहां आजतक कभी भी चिता की आग कम नही हुई, यहाँ रोज़ाना आम की लकड़ियों के अलावा चंदन की लकड़ियों से भी हज़ारों की संख्या में दाह संस्कार किया जाता है, और इन दाह संस्कारों को केवल डोम जाति के ही लोग कराते हैं, आग की इन लपटों में जलकर यह नश्वर शरीर भस्म में तब्दील हो जाता है जिसे गंगा की इस पवित्र और अविरल धारा में प्रवाहित करके मानव जीवन की इस लीला का अंत होता है यह दृश्य देख कर यह मन मे यही एहसास होता है कि जीवन का असली और अंतिम पड़ाव यही है ।
…..,,.✍🏻आशुतोष कुमार दुबे
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