Hindu Unity Movement
30/06/2023
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06/11/2021
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चारों वर्णों के जनक,राम में क्षत्रियत्व
मित्रों,
हमने अपनी पिछली पोस्टों में यह प्रमाणित किया था कि राम परमात्मस्वरूप से चारो वर्णों के जनक हैं,अर्थात चारो वर्ण राम से ही उत्पन्न हुए,इसलिए चारो वर्ण उनमें विद्यमान थे|हमने आपका परिचय इस वास्तविकता से भी कराया कि दशरथसुतराम के रूप में अवतरित श्रीराम में न केवल ब्राह्मण के समस्त शास्त्रोक्त गुण थे बल्कि उनके जन्म के समय जो ग्रह स्थिति थी,उस समय चन्द्रमा कर्क राशि में था इसलिए ज्योतिष के अनुसार उनका वर्ण ब्राह्मण था|
आज की पोस्ट में भगवान श्रीराम में क्षत्रियत्व की विद्यमानता कैसे थी,यह आपके सामने रखा जा रहा है|
सर्वप्रथम तो यह जान लें कि मनुस्मृति के अनुसार :-
सर्ववर्णेषु तुल्य़ांसु पत्नीष्वक्षत योनिषु|
आनुलोम्येन सम्भूता जात्या ग्येयास्त एव ते||
अर्थात सभी वर्णों में सजातीय अक्षत योनि वाली स्त्रियों से अनुलोम विधि से जो संतान होगी वह उसी वर्ण की होगी|
राजा दशरथ और माता कौशल्या का वर्ण क्षत्रिय था इसलिए भगवान राम का वर्ण क्षत्रिय माना गया|
यदि गुण,कर्म और लक्षण की दृष्टि से उनके वर्ण का विचार किया जाय तो आप पायेंगे उनमें क्षत्रिय के भी सारे गुण और कर्म भी विद्यमान थे|इसको इस प्रकार से देखा जा सकता है:-
क्षत्रिय के आवश्यक गुण और कर्म जैसे शास्त्रों में वर्णित हैं वे निम्न प्रकार से हैं :-
श्रीमद् भगवत गीता के अनुसार:-
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्|
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्|
अर्थात शूरवीरता,तेज,धैर्य,चतुरता,सन्मुख युद्ध से न भागना,दान देना,सब पर स्वामिभाव,क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं |
१- श्रीराम की शूरवीरता और धैर्य से युक्त होना:-
सर्वप्रथम तो स्वयं श्रीराम ने स्वयं में इस गुण की विद्यमानता अपने श्रीमुख से लंकाकांड में विभीषणजी से कही है,जब विभीषण रावण के सम्मुख युद्ध में उन्हे पैदल देख राम से संदेह व्यक्त किया कि रावण रथ पर सवार है और आप न तो पगत्राण(जूता)पहने हैं और न रथ पर सवार हैं,जबकि रावण रथ पर आसीन है,युद्ध कैसे जीतेंगे,तब राम जी ने कहा कि मैं जिस रथ पर सवार हूँ ,उसमें शौर्य और धैर्य रूपी पहिया है:-
सौरज धीरज जेहि रथ चाका|
इस प्रकार यह दोनो गुणों की स्वयं में विद्यमानता श्रीराम ने स्वयं बतायी है|
२-श्रीराम का तेजयुक्त होना:-
यद्पि प्रभु श्रीराम को ब्रम्हरूप से परमप्रकाशरूप बार-बार कहा गया गया है,यथा;-
''जगत प्रकास्य प्रकासक रामू'' अर्थात राम परम प्रकाशरूप और जगत के प्रकाशक हैं |
अथवा भगवान शिव द्वारा यह कहा गया है''पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि''अर्थात राम प्रकाश का खजाना हैं |
फिर भी मनुष्यरूप में भी उन परमप्रकाशरूप को उनके गुरु विश्वामित्र द्वारा जो विद्या प्रदान की गयी वह उनके तन में अतुलित बल और तेज प्रकाशित करती थी|यथा:-
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही|विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही|
जाते लाग न छुधा पिपासा|अतुलित बल तन तेज प्रकासा|
सीतास्वयंवर प्रसंग में जब श्रीराम की धनुषभंग करने को चले तो माता सुनयना को उनकी सामर्थ्य पर शंका होने पर एक चतुर सखी ने उनसे कहा कि:-
बोली चतुर सखी मृदु बानी|तेजवंत लघु गनिअ न रानी|
अर्थात एक चतुर सखी ने सुनयना जी से कहा कि हे रानी राम तेज से युक्त हैं उन्हे छोटा न समझो|
३-श्रीराम में दान और चतुरतारूपी गुण:-रामकथा को यदि जरा भी ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्टरूप से परिलक्षित होता है श्रीराम दान और चतुरतारूप गुण से परिपूर्ण थे|चतुरता के लिए आवश्यक है बुद्धिमान होना|क्यों कि चतुरता तो बुद्धि का एक श्रेष्ठ गुण है|श्रीराम ने स्वयं मे अतितीव्र बुद्धि का होना कहा है|विभीषण को यह बताया कि वे जिस अध्यात्मिक रथ पर सवार है,उसमें दानरूप फरसा है और बुद्धिरूप प्रचंड शक्ति है|यथा:-
''दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा''
४-श्रीराम का युद्ध से न भागने का गुण:-सूर्पणषा की नासिकाभंग के पश्चात जब खर-दूषण ने राम और लक्षमण को नृपबालक जानकर यह सोचकर कि वे वध के योग्य नही हैं,दूत भेजकर श्रीराम से कहलवाया कि सीता देकर जीवन की रक्षा कर चले जाओ तो श्रीराम ने उत्तर दिया कि:-
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं |एक बार कालहु सन लरहीं |
अर्थात हम बलवान शत्रु देखकर हम डरते नही और काल के सामने होने पर उससे भी युद्ध करते हैं |
राम जी के संपूर्ण चरित्र को देखने से स्पष्ट है कि उन्होने बार-बार शत्रु को अवसर दिया कि शत्रु भूल सुधार ले और युद्ध न करे परन्तु युद्ध सन्मुख होने की अवस्था में युद्ध से हटे नही और न ही कभी युद्ध से पलायन किया|
५- श्रीराम का स्वामिभाव:-यद्यपि यह निर्विवाद है कि श्रीराम सारे जगत के स्वामी हैं|समस्त ऋषिगण ने बार-बार उन्हे स्वामीरूप से संबोधित किया है|उदाहरण के महर्षि अत्रि ने उन्हे संबोधित करते हुए कहा कि:-
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी|कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी|
श्रीराम ने सुतीक्ष्ण ने भी श्रीराम को संबोधित करते हुए कहा था:-
जे जानहि ते जानहुँ स्वामी|सगुन अगुन उर अंतरजामी|
उन्हे वर देकर अपना स्वामिभाव प्रदर्शित किया|लक्षमण को यह कहते हुये कि मैं भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होता हूँ और|शबरी जी को नवधाभक्ति का उपदेश देते हुए यह कहते हुए कि नौ मे से भक्ति का एक भी रूप रखने वाला मुझे अत्यधिक प्रिय है,अपने स्वामिभाव का ही प्रदर्शन किया और उनके पूरे जीवन में बारंबार इस भाव का प्रदर्शन मिलता है|
मित्रजन,उपरोक्त प्रकार से यह स्पष्ट है प्रभु श्रीराम में एक क्षत्रिय के सम्पूर्ण गुण अपनी सर्वश्रेष्ठ अवस्था में विद्यमान थे|
अगली पोस्ट में श्रीराम में बाकी दो वर्णो की विद्यमानता से आपका परिचय कराने का प्रयास करूंगा |
धन्यवाद।
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