Chambal Rescue Force
13/05/2024
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Chambal River
13/04/2024
हर जगह की एक अपनी कॅहानी और या गाथा होती हे, जो जन मानस में सदियों से सुनी और सुनाई जा रही हे, ऐसी ही कहानियाँ चम्बल नदी पर अनेको अनेक हे, और जिसके लिए चम्बल नदी कई दशको तक प्रसिद्ध रही, वह हे चम्बल के डाकू यानी बीहड़ो के दस्यु सरगना जिन्होंने चम्बल के बीहड़ो पर बेरोक टोक अपना साम्राज्य चलाया हे इतना ही नहीं जब उन लोगो ने अपनी बन्दूको को छोड़ा तो फिर पहुचे संसद के गलियारों तक .और जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध वह थे पानसिंह तोमर, निर्भय सिंह गुज्जर ,फूलन देवी , मान सिंह ऐसे कितने ही लोग थे जो गाहे बजाये चम्बल को अपने अपने समय पर बताते रहे की हम चम्बल से हे |
कितने ही लोग और कितने ही जीवो की जीवन रेखा हे चम्बल जो महू के जनापाव से शुरु होकर यमुना नदी में मिल जाती हे वेसे तो चम्बल की बहुत सारी सहायक नदिया हे जिनमे बनास नदी, क्षिप्रा नदी,मेज , ब्राह्मणी नदी, सीप, काली सिंध, पार्वती, छोटी कालीसिंध, कुनो, ब्राह्मणी, अरु नदी ,परवन नदी, आलनिया, गुजाली इत्यादि ।
और आज समय इन डाकुओ का बीहड़ का नहीं हे आज समय से ज्ञान का खोज का ताकि वर्तमान की जो चुनोतिया हे उससे निपटने का, चम्बल नदी के तट पर जो गाँव ,शहर हे यह उनकी ही जीवन रेखा नहीं हे अपितु विलुप्त होती अनेको प्रजातियों का घर भी हे जो इसके किनारों और जंगल में बसे हे ,उन्ही में से एक हे तेंदुआ जो भारत में संकटग्रस्त प्रजाति हे जिसे बचाने की बहुत अधिक जरुरत हे , वह तो शुक्र हे की यह जाती अपने शर्मीले और छुपे हुहे हुनर के कारण मानवीय बस्तियों में चतुराई से रह लेती हे नहीं तो सबसे ज्यादा मानव और वन्यजीव संघर्ष में इसी को देखा जाता हे, कारण सीधा सा भी हे लोगो को रहने के लिए जगह चाहिए व शहर लोगो की भीड़ से भरा जा रहा हे अब वह जाये तो कहा जाये तो वह जंगल और जंगल के आसपास की जमीने पर घर बना कर रहने लगता तो जिससे जंगल भी सिमट रहे और जंगली जानवरों के रहने का दायरा भी सिमटता जा रहा हे , अब किसी मोहल्ले कॉलोनी या सोसायटी में तेंदुआ रात के समय अपने भोजन के लिए शिकार पर आ जाता हे व तेंदुआ रात को शिकार पकड़ कर भी ले जाता तब तक कोई बात नहीं लेकिन किसी रात को उसकी शिकार करते हुहे उसकी फोटो या विडियो आजाती हे या कोई उसे देख लेता हे तब उसकी श्यामत आजाती हे अगले दिन तो लोगो द्वारा तेंदुए को पकड़ने की माग हो जाती हे , लोग यह नहीं देखते की हम उसके इलाके में घर बना कर रहने आये हे वह तो सदियों से यही रह रहा हे और अपना रोजाना का काम कर रहा हे, जीवित रहने के लिए उसे भी कुछ खाना पड़ेगा और वह यही कर रहा हे समझना हमें पड़ेगा की इस धरती पर सभी का अधिकार हे और सभी को मिल बाट कर रहना भी हे और इसका संरक्षण भी करना हे ताकि प्रकर्ति का कोई नियम ना टूटे |
एक बात और हे जो हम लोग कुछ समय से देख रहे हे की चम्बल नदी के जो तेंदुए हे फिर चाहे वह गाँधी सागर अभ्यारण की चम्बल की सीधी कराईया हो या जवाहर सागर डेम की डाउन स्टीम की कोटा तक की सीधी खड़ी पहाड़िया हो मैदानी तेन्दुओ की अपेक्षा चम्बल के तेन्दुओ ने एक अलग ही गुण विकसित कर लिया हे और वह हे 90 डिग्री की सीधी खड़ी पहाडियों पर चलना और उन पर अपना घर बनाना , जिन पर चलना मुश्किल होता हे उनपर यह बड़े आसानी से अपनी दिनचर्या पूरी कर लेते हे, आज पुरे भारत में मानव व बड़ी बिल्लियों का संघर्ष बढता जा रहा हे लेकिन हम कह सकते हे की चम्बल नदी की बिल्लिया बिना संघर्ष के अपने अस्तित्व को बनाये हुहे हे और हम सभी को मिलकर इनके इस प्रयास को बनाये रखना होगा तभी आगे आने वाली पीड़ियो को इनकी कहानिया नहीं सच में इनके साक्षात्कार देखने को मिलेगा |
आज चम्बल नदी गुलजार हे अपने वन्यजीवों और प्राक्रतिक सोंदर्य से कालांतर में जिस विभिसिखा की वहज से कभी यह बदनाम हुआ करती थी आज उतनी ही प्रसिद्ध हे अपने वन्य खजाने से जो अपने आप में दिखाई देता हे , चम्बल में आने वाला पर्यटक जब इन तेन्दुओ और इनके बच्चो को देखता हे तो उसके मुह से बस एक ही बात निकलती हे की क्या अद्भुत नजारा हे चम्बल नदी और इसके वन्यजीवों का जो हमने आज तक नहीं देखा |
अगर समय मिले तो यह जरुर पढिये धन्यवाद
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