Common man
जहाँ ज़िंदगी की असली खुशी न दौलत में है...
न शोहरत में…
बस अपनों के साथ बैठकर दो पल हँसने हैं
फुर्सत में हो तो पढ़ लो..
असम में कांग्रेस की सरकार थी । देश में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी ( 2011 की जनगणना के अनुसार 34.22%) असम में है । छुटपुट घटनाएं या सांप्रदायिक दंगे असम में होते रहते थे , उसके बावजूद वहाँ बीजेपी का कोई ख़ास वजूद नहीं था ।
बदरुद्दीन अजमल साहब वहाँ के बड़े उद्योगपति है । अजमल परफ़्यूम की पहचान पूरी दुनिया में है । अजमल साहब ने कांग्रेस को कोसते हुए पार्टी बनायी और पार्टी के तीन सांसद और 18 विधायक तक जीते । उनकी पार्टी पूरी तरह मुसलमानों की पार्टी थी और वो केवल मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में ही चुनाव लड़ते थे ।
जब वहाँ ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू हुई तो बीजेपी का भी उरूज शुरू हो गया । हेमंता बिस्वा सरमा जो तरुण गोगोई को हटाकर मुख्यमंत्री बनना चाहता था , उसने सही वक़्त पर हालात को भांप लिया और बीजेपी में शामिल हो गया ।
असम में हाशिए पर पड़ी बीजेपी सत्ता में आ गयी । मुसलमानों को मुख्यमंत्री का ख्वाब दिखाने वाले अजमल साहब कभी किसी सरकार में तो शामिल नहीं हुए लेकिन जो राजनीति उन्होंने असम में की उससे मुसलमानों की थोड़ी बहुत आवाज़ सुनने वाली सरकार भी चली गयी और हिस्सेदारी भी ।
पिछले लोकसभा चुनाव में वहाँ के मुसलमानों को होश आया तो अजमल साहब को 10 लाख से ज़्यादा वोट से हार मिली, यह भारतीय लोकतंत्र में किसी भी उम्मीदवार की सबसे बड़ी हार है । जो था वो भी गँवाने के बाद मुसलमान होश में आयें लेकिन अब ध्रुवीकरण की राजनीति वहाँ इतने भयानक मुकाम पर पहुँच चुकी है कि वापसी मुश्किल है ।
इस राजनीति से बहुसंख्यक ( हिंदू ) समाज को भी वहाँ आर्थिक नुक़सान हो रहा है लेकिन वो धर्म का नशा जो वहाँ पर दोनों तरफ़ चढ़ा था , वो उतर नहीं पा रहा है । बहुसंख्यक समाज आर्थिक तंगी से गुज़र रहा है और अल्पसंख्यक समाज वहाँ डर के साये में जी रहा है । मुसलमानो की कांग्रेस से शिकायतें हेमंता बिस्वा सरमा ने दूर कर दीं ।
असम में मुस्लिम समाज की आबादी 2011 में 34.22% प्रतिशत थी । वहाँ पर हिस्सेदारी के नाम पर कामयाबी नहीं मिली तो उत्तर प्रदेश , बिहार , महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों में कहाँ से मिल जाएगी ??
ध्रुवीकरण की राजनीति में केवल वो ही फ़ायदे में रहेगा जो बहुसंख्यक है । 2-4 सीट पर बहुसंख्यक होने का फ़ायदा आप उठा सकते हो लेकिन उससे आप पूरे प्रदेश को धर्म आधारित ध्रुवीकृत करने में सहयोगी बनोगे ।
मैंने पहले भी लिखा है और फिर लिख रहा हूँ , धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण होने में हमेशा अल्पसंख्यक घाटे में रहेगा । इससे हमेशा बहुसंख्यक समाज को आर्थिक नुकसान होगा लेकिन सत्ता उसके पास ही रहेगी जो अल्पसंख्यक समाज के लिए विलेन के रोल में दिखे ।
अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है,
शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात।
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