Chandan Kumar Singh
29/10/2022
कौन हैं 'छठी मईया' ?
मेरा अल्पज्ञान कहता है कि "पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था, प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने हेतू विष्णु भगवान द्वारा रची गयीं माया हैंl"
लोक - आस्था के महापर्व छठ का वैज्ञानिक रहस्य.....।
आलोक-पर्व (दीपावली) की समाप्ति के साथ ही सूर्योपासना के महापर्व छठ की शुरुआत हो चुकी है, आईए इस महापर्व की विवेचना विज्ञान को संदर्भ में रख करें...
हमारे देश में सूर्योपासना का प्रसिद्ध पर्व है छठ । मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है । यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है । पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में । चैत्र शुक्ल- पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल- पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है । पारिवारिक सुख- समृद्धि तथा मनोवांछित फलप्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है । इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं । छठ व्रत के संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं; उनमें से एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा । तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया । लोकपरंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है । लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी ।
छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है । इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (ultra violet rays) पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं । उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है । पर्वपालन से सूर्य प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है । पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिल सकता है ।सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं । सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुंचता है, तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है । वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है । पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है । इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है । पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुंच पाता है । सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुंचनेवाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है । अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पडता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ ही होता है ।
छठ जैसी खगौलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं , वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है । ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरांत आती है । ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम कुछ और नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है...।
नहाय - खाय के साथ कार्तिक मास के महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान प्रारंभ होता है.....।
ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते
अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:
भगवान मार्तण्ड सम्पूर्ण जगत को आलोकित करें, इसी प्रार्थना के साथ सभी छठ - व्रतियों को मेरा सादर प्रणाम .....🙏🙏🙏
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