Vyapar sandesh

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17/03/2020

किसानों की बर्बादी !
इस दौर में सिर्फ बैंक और पब्लिक सेक्टर ही नहीं डूब रहे बल्कि किसानों की बर्बादी और ज्यादा दुखी करने वाली है । ये बात अलग है कि किसानों की बर्बादी का कारण मौसम का प्रकोप है । जिन बीमा कंपनियों ने फसल बीमा के नाम पर किसानों से भारी कमाई की और वक्त पड़ने पर मुआवजे के नाम पर उन्हें 13 और 17 रुपये जैसी रकम के चेक भेज कर उनके साथ क्रूर मजाक किया ,उन्हें अगर उचित और पर्याप्त मुआवजा देने के लिए सरकार बाध्य कर सके तो किसानों के दुख को घनीभूत होने से रोका जा सकता है । बीते दिनों बे मौसम की बारिश से फसल की तबाही को देख कर झांसी में एक किसान की हार्ट अटैक से मौत हो गयी और हमीरपुर में एक किसान ने फांसी लगा कर अपनी जान दे दी । सिर्फ दो मामलों से देशभर के किसानों की बर्बादी का अनुमान लगाया जा सकता है । वैसे अब किसानों की आत्महत्या कोई मुद्दा नहीं रहा क्योंकि बेरोजगारों की आत्महत्या के भी बहुत मामले आ रहे हैं लेकिन सरकार ने किसानों की आय में दो गुना इजाफा करने का जो वादा किया था ,वो अभी जमीनी शक्ल नहीं ले सका है और उस पर मौसम की नाराजगी किसानों के लिए जानलेवा साबित हो रही है लेकिन इस दौर में जब सरकारें उखाड़ने का काम युद्धस्तर पर चालू है तो किसानों की परवाह भी कौन करे ? दरअसल किसानों की सबसे बड़ी समस्या भंडारण की सुविधाओं का अभाव है और दूसरी दिक्कत उन पर उपज की बिक्री से जुड़ी सरकारी बाधा है । कई सालों से इस बात की जरूरत अनुभव की जा रही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कोल्ड स्टोरेज की श्रृंखला बनाने से किसानों ,विशेष रूप से सब्जी उत्पादकों की स्थिति में जबरदस्त सुधार हो सकता है । इसलिए कि सब्जी तुरंत नष्ट होने वाली उपज है ,इसलिए लागत का उचित मूल्य मिले बिना भी किसानों को मजबूरी में बेचना पड़ जाता है । रंगनाथन कमेटी ने भी इस बारे में सुझाव दिया था । इसमे या तो सरकार को खुद निवेश करना था या सहकारिता क्षेत्र को आगे बढ़ाए किन्तु इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया । किसानों पर अपनी उपज को देश के अन्य हिस्सों में भेजने पर भी बाधाएं हटानी जरूरी है जिस पर सरकार को विचार करना चाहिए ।
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11/03/2020

अधनंगा ,अपाहिज ,बिकाऊ लोकतंत्र
जब देश की जनता एक दूसरे पर रंग डाल कर , गुलाल अबीर लगा कर ,गले मिलकर होली मना रही थी तो मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में ग्वालियर महाराज और कोंग्रेस नेता राहुल गांधी की निजी टीम के खासुलखास ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के साथ मिल कर कोंग्रेस के खिलाफ राजनैतिक होली खेलने की पटकथा पूरी गंभीरता और मनोयोग से लिख रहे थे ,ये बात बुधवार को प्रमाणित हो गयी जब सिंधिया ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही राज्यसभा का टिकट भी प्राप्त कर लिया । इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि भारतीय राजनीति में अब मूल्य ,सिद्धांत और जनता के प्रति जवाबदेही पर निज स्वार्थ और पद लिप्सा की भावना पूरी तरह से हावी हो चुकी है । वैसे दलबदल देश की राजनिति के लिए कोई अनोखी घटना नहीं है बल्कि इसके बिना देश की राजनीति का इतिहास लिखना संभव ही नही है । हर दल में किसी न किसी दल के लोग न सिर्फ मौजूद हैं बल्कि बड़े बड़े पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं । हरियाणा के भजनलाल और यूपी के नरेश अग्रवाल को दलबदलुओं का सम्राट कहा जा सकता है जिन्होंने पूरी पार्टी सहित दलबदल कर लिया था । लेकिन जूनियर सिंधिया का फैसला अप्रत्याशित रहा । इसलिए कि कोंग्रेस पार्टी से इनके पुराने पारिवारिक रिश्ते थे । किसी जमाने मे माता विजय राजे सिंधिया से विवाद के चलते परिवार से बहिष्कृत माधवराव सिंधिया (ज्योतिरादित्य के स्व.पिता) ने श्रीमती इंदिरा गांधी (स्व.) की शरण ली थी और इंदिराजी ने उन्हें अपने बेटे की तरह गले लगाया । कानूनी सहायता के लिए कोंग्रेस के दिग्गज वकीलों की सेवाएं उपलब्ध कराई । राजनीतिक सम्मान दिलाया । इंदिराजी की नृशंस हत्या के बाद राजीव जी ने भी उन्हें अपने भाई सा प्रेम और सम्मान दिया और विमान दुर्घटना में माधवराव जी की मृत्यु के बाद कोंग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को वही सम्मान और रुतबा दिया । 5 बार लोकसभा का टिकट दिया ,केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी और बीसीसीआई में भी महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी । इससे ज्यादा कोई भी पार्टी और क्या दे सकती थी ? इसीलिये सिंधिया का पाला बदलना मुझे अप्रत्याशित लगा । लेकिन इसे एक ऐसे कुंठित और हताश नेता के फैसले के रूप में भी देखा जा सकता है जो चुनाव में अपनी सीट भी न बचा सका । ये भारतीय लोकतंत्र का विचित्र विद्रूप है कि इसमे जनादेश को बेचने की अद्भुद शक्ति है । संभव है भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो किन्तु इतना अधनंगा , विकलांग और बिकाऊ लोकतंत्र दुनिया की किसी भी डेमोक्रैसी में नहीं मिलेगा ,ये भी मेरा दावा है ।
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08/03/2020
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