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अस्सलातो खैरून मिन्न नोम।
उठ मोमिन सोने से सलात बेशुमार बेहतर होती है।
या,इलाही रहम फरमा शाहिद ए करबला के वास्ते।
या रसूलल्लाह करम कीजिए शाहिद ए कर्बला के वास्ते।
मुश्किलें हल कर शहीद ए मुश्किल कुशा के वास्ते।
कर बलान ए रद्द शहीद ए कर्बला के वास्ते।आला हजरत।आमीन।
यह देख कर आंखों को ठंडक पहुंच ती हे के नौजवान मुसलमान मोहल्लों में जवान मुस्लिम औरतोंको मोहब्बत से,शोख से,हस हस कर खिला ते पिलाते है ।लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये खाने, खिलाने वाले नौजवान लड़के,लड़कियां नमाज भी अदा करते है???क्या शहीदों के नाम दो रकात नवाफिल भी अदा करते है???की "नौजवान औरतों को" खिलाने में ही सवाब समज ते है।क्या यह शरीयत हे कि जहालत???"काम के साथ तरीका जानो।"अल आमालों बिन निय्यत "।
" हम तो समझे थे कि लाएगा फ़्ररागत इस्लाम।
क्या खबर थी चला आएगा लहाब भी साथ".(अल्लामा इकबाल.)
"सोने वालो जागते रहियो चोरों की रखवाली है"।(आला हजरत).
मौलाना साहिब,आप नाबिना ओ की तरह क्यों खामोश हो?????
सोने वालो रब को सजदा कर के सो।
क्या खबर उठें ना उठें सुबह को।
या हसनैन दस्तगीर दस्ते मोरा बगिर।
दस्तम चुना बगैर के गोयन्द दस्तगीर।
या हसनैन दस्तगीर तूं हाजत ए मोरा बराद।
या हसनैन दस्तगीर तूं सरमन निगाह दार।
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