Apbhrams Sahitya Academy
अपभ्रंश भाषा का महत्व
जयपुर में स्थित अपभ्रंश साहित्य अकादमी विश्व में अकेली एक ऐसी अकादमी है जहाँ से अपभ्रंश भाषा का पत्राचार के माध्यम से अघ्ययन किया जा सकता है। वर्तमान में विद्यमान सभी क्षेत्रीय भाषाएँ किसी न किसी भाँति अपभ्रंश का ही विकसित रूप है। इन क्षेत्रीय भाषाओं को सुचारु रूप से समझने के लिए अपभ्रंश भाषा का ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। इतना ही नहीं यदि हमंें अपनी प्राचीन भाषा संस्कृत व प्राकृत के माध्यम से हमारी प्राचीन विरासत से अवगत होना है तो भी हमको अपभ्रंश भाषा का ज्ञान होना परम आवश्यक है।
अपभ्रंश भाषा के महत्व को हिन्दी साहित्य के प्रमुख विद्वानों ने इस प्रकार दर्शाया है -
1 अपभ्रंश के माध्यम से ही संस्कृत व प्राकृत भाषाओं की भाषागत तथा साहित्यगत विशेषताएँ हिन्दी एवं अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं को विरासत में मिली है। अतः आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की आदिकालीन स्थिति को समझने के लिए अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य का ज्ञान होना अति आवश्यक है।
2 ंअपभ्रंश भाषा और साहित्य से ऐसी अनेक भाषागत और साहित्यगत परम्पराएँ आदिकाल व मध्यकाल के हिन्दी, गुजराती, मराठी तथा बाँगला भाषा और साहित्य में आई हैं कि इन्हें नजरन्दाज कर देना भाषा और साहित्य की प्रवहमान धारा के सही विश्लेषण में बाधक होगा।
3 19वीं सदी से पहले अपभ्रंश की जानकारी मात्र इसके नाम निर्देश तक ही सीमित थीं संस्कृत वैयाकरणों के यहां यह शब्द संस्कारहीन ग्राम्य शब्द के अर्थ में प्रचलित था। हेमचन्द्र ने अवश्य इसके नमूने शब्दानुशासन के अष्टम अध्याय के चतुर्थ पाद में देकर इस भाषा का कुछ विस्तार से विवेचन किया है।
4 वैसे देखा जाय तो अपभ्रंश का खजाना या तो गुजरात और मरुभूमि के जैन भण्डारों में और कारंजा की विन्ध्य पर्वतमालाओं के बीच छिपा हुआ था। सबसे पहले पिशेल ने इसके नमूनों का परिचय विश्व को दिया। उसके बाद तो याकोबी और आल्सदोर्फ जैसे जर्मन विद्वान ही नहीं, दलाल जैन, वैद्य, मुनिविजय, भायाणी ने अनेक अज्ञात जैन पुराणकाव्यों आदि को प्रकाश में लाकर भारतीय भाषा और साहित्य की महत्वपूर्ण अनुपलब्ध कड़ी को खोज निकाला।
5 वस्तुतः वास्तविक आधुनिकता वह है जो अतीत के प्रति जागरूक रहकर वर्तमान के प्रति पूर्ण सजग रखती है। इसके लिए हमारा प्राचीन रिक्थ हमें बहुत कुछ सिखाता है वर्ततान को गढकर भविष्य के लिए मार्ग दिखाता है। इन रिक्थों में हमारी प्राचीन भाषाएँ अमूल्य निधि है।ं इनमें भी वह अपभ्रंश भाषा है जो प्राचीन और नवीन भारतीय भाषा का सेतुबन्ध है।
6 जर्मन विद्वान डा. रिचार्ड पिशेल ने बडे दुख के साथ कहा कि जिस भाषा में हेमचंद्राचार्य द्वारा संकलित अप्रतिम दोहे हो उसका भरापूरा भंडार होना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे विद्वान हरमन याकोबी को जब धनपाल की भविष्यत कहा मिली तो उसे देखकर वे भावविभोर हो उठे। डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी की तीव्र भावना थी कि इस अन्धकार युग को प्रकाशित करने योग्य जो भी मिल जाय उसे सावधानी से जिलाये रखना हमारा कत्र्तव्य है क्योंकि यह बहुत बडे आलोक की सम्भावना लेकर आई है। उसके पेट में केवल उस युग के रसिक हृदय की धडकन का ही नहीं और न ही केवल सुशिक्षित चित्त के संयत और वाक्पाटव का बल्कि उस युग के सम्पूर्ण मनुष्य को उद्भाषित करने की क्षमता है। साहित्य, भाषा या सामाजिक दृष्टि से उसमें किसी न किसी महत्वपूर्ण तथ्य के मिल जाने की सम्भावना है। इसकी महत्ता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जबतक इस भाषा का साहित्य उपलब्ध नहीं था तब तक यह 600 वर्षों का समूचा काल अन्धकारयुग के नाम से सम्बोधित कर दिया गया था।
7 शंभूनाथ पाण्डेय कहते है कि पहले अपभ्रंश पढने में रूखा लगा किंतु बाद में डा.नामवर सिंह की मनोहर एवं प्रखर शैली से उसमें कुछ गति होने लगी। तब मुझे लगा कि अपभ्रंश साहित्य कागजी बादाम की भाँति अपने भीतर अद्भुत् पौष्टिक तत्व छिपाये हुए है। यह बल, वीर्य, ओज और शक्ति का संपुंज है। उन्मुक्त और स्वच्छंद प्रेम का ऐसा अक्षय भंडार है जिसमें से निकले बहुतेरे झरने इसे रिक्त नहीं कर सकते। यह भाषा धर्म, नीति, सत्व, संयम के विजयश्री की पताका फहरा रही है। यह संस्कृत की भाँति सुजन की भाषा न होकर जन की भाषा थी। यह लोकजीवन के ताजे रस से सरोबार और लोकशक्ति से ओतप्रोत थी।
8 अपभ्रंश अपनी अन्तर्निहित विशेषताओं के कारण ही देशी-विदेशाी विक्षनों के आकर्षण का केन्द्र बन गई।
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