Indore working journalist.

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10/10/2019

जूते के अलावा और भी बहुत कुछ...........................................

मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव एसआर मोहंती की कल प्रेस से हुयी चर्चा..

#इंदौर 10 अक्टूबर

#मध्यप्रदेश में आयोजित होने वाली #मेग्नीफिसेन्टमध्यप्रदेश (एमएमपी) -2019 की समीक्षा बैठक लेने 9 अक्टूबर को इंदौर पहुँचे मुख्य सचिव एस आर मोहंती ने बताया "इन्वेस्टर समिट का उद्देश्य केवल 'सहमति ज्ञापन' (एमओयू) तक सीमित न रहकर, प्रदेश में धरातल पर निवेश लाना है।"

श्री मोहंती ने बुधवार को यहां ब्रिलियेंन्ट कन्वेंशन सेंटर में प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक लेने के बाद प्रेसवार्ता कर जानकारी दी। उन्होंने यहां संवाददाताओं को बताया कि हमारा उद्देश्य निवेश के लिये गम्भीर लोगों को प्रदेश के अनुकूल वातावरण से परिचित करवाना..और तय समय सीमा में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना कराना है।

उन्होंने संवाददाताओं को बताया कि दो दिवसीय समिट आगामी 17-18 अक्टूबर को यहां इंदौर में आयोजित होगी। जिसमें पहले दिन स्थानीय उद्योगपतियों और संगठनों के प्रतिनिधियों से मुख्यमंत्री कमलनाथ चर्चा करेंगे। इसी दिन यहां एक प्रदर्शनी भी आयोजित की जाएगी।

श्री मोहंती ने बताया कि अगले दिन 18 अक्टूबर को मुख्य कार्यक्रम आयोजित होगा। जिसमें देश-विदेश के उद्योगपतियों से मुख्यमंत्री चर्चा करेंगे। 8 सत्रों में होने वाले इस आयोजन का संचालन भी उद्योगपतियों द्वारा किया जाना प्रस्तवित है। मुख्य सचिव श्री मोहंती ने आगे बताया कि इन्वेस्टर समिट में सरकार दवा निर्माण (फार्मा), कृषि (एग्रीकल्चर), कृषि प्रसंस्करण, प्रद्योगिकी, सौर (सोलर) और 'फ़ास्ट मूविंग कंज़्यूमर गुड्स' (एफएमसीजी) के क्षेत्र की इकाइयों की स्थापना और विस्तारण पर विशेष ध्यान दे रही है।

उन्होंने कहा वेयर हाउस (गोदाम) के क्षेत्र में मध्यप्रदेश को 'सेंटर ऑफ द नेशन' बनाने की संभवना पर कार्य किये जाने की योजना है। उन्होंने कहा 'प्रदेश में पर्यटन के क्षेत्र में अब तक संभावित लक्ष्य हासिल नहीं किये जा सके हैं, जिस पर भी हमने ध्यान केंद्रित कर बेहतर परिणाम की दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं।'

मुख्य सचिव ने पूर्व में हुये वैश्विक निवेश सम्मेलनों के परिणामों से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में कहा 'हम फिलहाल वर्तमान और भविष्य पर फोकस कर रहे हैं।

उन्होंने मध्यप्रदेश में एक ही औद्योगिक नीति की परंपरा के संदर्भ में पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में कहा 'मुख्यमंत्री कमलनाथ का स्पष्ट मानना है कि एक ही औद्योगिक नीति, अलग-अलग प्रकार के उद्योगों के लिये कारगर नहीं हो सकती।' उन्होंने कई उदाहरण देते हुये कहा अलग-अलग प्रकृति के उद्योगों के लिए अलग-अलग नीतियां तैयार की जा रही हैं। उन्होंने कहा हम क्षेत्रवार 8-9 श्रेणियां तैयार कर औद्योगिक नीतियों पर कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने कहा समिट में शामिल होने वाले बड़े और मुख्य उद्योगपति केवल एक ही दिन 18 अक्टूबर को यहां आकर उसी दिन निकल जाएंगे। उन्होंने कहा समिट में लंबे-लंबे भाषण को स्थान नहीं देते हुये उद्देश्य की पूर्ति हेतु प्रभावी क्रियान्वयन किये जाने पर जोर दिया गया है।
सेव जर्नलिज्म एसजेएफ से जानकारी साभार..
#सेवजर्नलिज़्म #एसजेएफ

04/09/2019

महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक और बालकृष्ण गोखले के प्रेरणा श्रोत दादा भाई नौरोजी की आज जन्म जयंती है..उन्हें नमन..
ग्रीटिंग क्रिएशन - साभार बीबीसी..

03/09/2019

सनक के लक्षण !
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(चन्द्रशेखर शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार)

यातायात नियमों को लेकर केंद्र सरकार का नया कानून आया है। इसमें नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने के कहरबरपा प्रावधान हैं। ये डरावने प्रावधान आमजन को आतंकित करते हैं। बेशक हमारे देश में सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या भी भयावह है। देश के सबसे साफ-सुथरे शहर इंदौर में ही अखबारों में रोज ऐसी मौतों की कई खबरें होती हैं। इसके बावजूद ये शहर हेलमेट पहनने को तैयार नहीं। पहनने से ज्यादा नहीं पहनने के तर्क हैं इस शहर के पास। आप इस शहर को सुधारोगे ? वो भी डंडे के जोर पर ? जुर्माने के कहर के जोर पर ?
भले ही प्रदेश सरकार ने इस कानून को अपने यहां लागू नहीं किया है, लेकिन केंद्र सरकार की मंशा तो साफ यही है। बोले तो सबको एक लकड़ी से हांकना। इसका विरोध होना चाहिए। इसके विरोध में सबसे पहला तर्क ये है कि नागरिकों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। बेशक सरकार के बनाये नियमों का पालन नागरिकों की जिम्मेदारी है। तो क्या इसका मतलब ये कि नियम या कानून बनाने के बहाने आपको लोगों की जेब काटने का अधिकार मिल गया ? वो भी पूरे देश में और सबकी ? आप कहेंगे, नियम से चलो तो कोई दिक्कत नहीं। बिलकुल, नियम से चलने में कोई दिक्कत नहीं, लेकिन सरकार साहब, व्यवस्था ऐसी भी होना चाहिए कि नियमों का पालन आसान या कष्ट रहित हो। इसे यूँ समझें कि व्यवस्था ऐसी हो कि नागरिकों को नियम के उल्लंघन की नौबत ही न आये या आये तो कम से कम आये। जाहिर है ऐसी व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी है।
नमूने के लिए इंदौर को ही लेते हैं। कोई 35 लाख की आबादी वाला ये शहर बहुत तेजी से बढ़ा है और वैसे ही बढ़ रहा है। इस शहर की मेगा या सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है यहां सस्ती और सुलभ लोक परिवहन सेवा का बड़ा और सुव्यवस्थित नेटवर्क। अलबत्ता इस शहर का जो भी बहुआयामी फैलाव, विस्तार या विकास हुआ है उसमें ऐंड-बेंड विकास ज्यादा है। ऐंड-बेंड से आशय है मनमाना, अंधाधुंध और अनियोजित विकास। सो यहां वैसी कारगर, सस्ती-सुलभ लोक परिवहन सेवा टेढ़ी खीर। इसीलिए यहां पर निजी क्षेत्र की सिटी बसों से लेकर कार-टैक्सी आदि के बावजूद उससे कई गुना और हजारों की तादाद में लोक परिवहन के अन्य वाहन भी चल रहे हैं। जमा इस पूरे नेटवर्क के होते शहर में निजी वाहनों की संख्या अचंभे में डालने वाली है। यहीं इंदौर की लोक परिवहन व्यस्वस्था पर सवाल उठता है कि वो अपने मकसद में कामयाब क्यों नहीं ? लोक परिवहन सेवा का मकसद ही ये होता है कि एक बड़े शहर में सस्ते और सुविधाजनक मूवमेंट का लाभ लोगों को मिले। ऐसा कि शहर में उन्हें अपने निजी वाहन को चलाने की जरूरत न पड़े या कम से कम पड़े। इससे शहर की सड़कों से निजी वाहनों का दबाव कम होता है। इसका मतलब ये कि लोग उस सेवा-सुविधा का उपयोग करते हैं और नतीजे में लोगों से नियमों के पालन या उल्लंघन की संभावना भी कम होती है। अब लोग निजी वाहन कम चलाएंगे और लोक परिवहन वाहनों में चलेंगे तो नियमों के उल्लंघन के मामले भी कम होंगे न। सो ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करे। इसके बजाय उसका जोर जनता को जबरन मानसिक और आर्थिक त्रास देकर ऐसे निदान के उपाय पर है जिसमें हींग लगे न फिटकरी, रंग आए चोखा।
उधर, इंदौर में मेट्रो लाने की बात हो रही है। भगवान का शुक्र है कि बीआरटीएस टूटने से बचा हुआ है। मालूम हो कि बड़े शहरों में यातायात सुधार का सबसे सस्ता उपाय बीआरटीएस है। मेट्रो और बाकी सब इससे खूब महंगे। ये सारे लोक परिवहन के आजमाए हुए टूल हैं। मुंबई में लोकल ट्रेन की महिमा और महत्ता सब जानते हैं। बसें और अन्य वाहन वहां भी चलते हैं। दिल्ली में मेट्रो की माया है। सो इंदौर में अभी जो लोक परिवहन की व्यवस्था है, उसमें या खोट है या वो नाकाफी है। या फिर निजी वाहन चलाना इस शहर में मजबूरी है। यदि कोई किफायती, सुविधाजनक और सुव्यवस्थित विकल्प सुलभ हो तो लोग निजी वाहन के बजाय उसे तरजीह भी दें। भूले नहीं कि इंदौर में बहुत बड़ी तादाद में लोग लोक परिवहन के साधनों का उपयोग करते भी हैं। बस इसे मुक्कमल और व्यवस्थित करने की जरूरत है। हालांकि यह भी सच है कि यहां के लोगों का वाहन चालन का स्तर आदतन बदतर है। इस मामले में वो पढ़े-लिखे निरक्षर हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जुर्माना या उसके डर से सब साक्षर हो जाएंगे। उलटा डर ये है कि इससे दूसरी गड़बड़ियां पैदा होंगी। अभी ही हम अखबारों में पढ़ते हैं कि हमारी पुलिस देशी-विदेशी शराब दुकानों के बाहर मोर्चा जमाती है और वहां से शराब पीकर लौटते लोगों के चालान काटती है। कितनी सयानी है न हमारी पुलिस। सोचो नए कानून में उनको मिलने वाला टारगेट और उनका निजी लालच क्या गुल खिलाएगा। हालांकि वो साल में कई बार लोगों को नियम से चलने की समझाइश के फूल भी देती है और अपनी कथित गांधीगीरी का पूरा मजा भी लेती है। लोग फिर भी नहीं सुधरे। यानी आपके जुगाड़ के फूलों की गांधीगीरी भी नकली और फिजूल साबित। कोई दो मत नहीं कि यातायात सुधार के कई बहुत खर्चीले उपाय भी पुलिस और नगर निगम ने आजमाए हैं, लेकिन बात बनी नहीं है। असल में एक निरुपायता और असहायता की स्थिति है। ऐसे में केंद्र सरकार का ये उपाय ऐसा है गोया भीड़ नहीं संभल रही है तो लाठी चार्ज कर दो। यों
केंद्र सरकार ने यह किया है कि कानून बनाकर अपनी बला राज्यों पर डाल दी है। हैरत की बात ये है कि इसमें उन सौ शहरों को भी शुमार किया है, जो केंद्र के ही स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में चयनित हैं और स्मार्टाधीन हैं। क्या इसका मतलब ये माना जाए कि केंद्र ने इन सौ शहरों से भी अपने हाथ ऊंचे कर दिए हैं ? कायदे से तो उसे इन सौ शहरों में यातायात की और अन्य सारी आवश्यक व्यवस्थाएं पहले जुटानी चाहिए। इंदौर की बात करें तो हकीकत यही है कि यहां लोक परिवहन को सस्ता, सुलभ और सुव्यवस्थित करने में अभी बहुत गुंजाइश है। दरअसल इसके लिए योग्य और विशेषज्ञ दिमाग दरकार हैं। अभी तो ये हालत है कि किसी जुलूस, यात्रा या वीआईपी मूवमेंट से आये दिन शहर के यातायात का कचूमर निकलता है, जिसमें शहर की कानून-व्यवस्था संभालने वालों का दम भी शामिल होता है। खैर।
उम्मीद है जुर्माने वाले कानून को परे कर राजनीतिक और व्यवहारिक तौर पर सही निर्णय लेने वाली राज्य सरकार इस दिशा में भी अपने विवेक का इस्तेमाल करेगी। अभी इस कानून को लागू करना वैसे भी उचित नहीं है कि देश का बड़ा भूभाग अभी तोड़फोड़ से लेकर बाढ़ आदि विपदा से दो-चार है। फिर मंदी अलग मातम कर रही है। ऐसे में साफ दिख रहा है इस कानून को लागू करने से पहले या इस पर ठीक से विचार नहीं हुआ या फिर कानून के जरिए निजाम का संदेश है कि वो आपको इस तरह भी ठीक करने के लिए कृत संकल्पित और तत्पर है और पीछे नहीं हटेगा। यदि ऐसा है तो ये व्यवस्था निर्माण का नहीं, अपितु सनक का लक्षण है।

31/08/2019

13 मार्च 1949---31 अगस्त 2019

वरिष्ठ पत्रकार जलधारी का निधन

इंदौर: वरिष्ठ पत्रकार शशीन्द्र जलधारी का आज 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।वे लंबे समय से अस्वस्थ्य चल रहे थे। श्री जलधारी की अंतिम यात्रा 1 सितंबर को सुबह 11 बजे उनके निज निवास संवाद नगर से आरंभ होकर पिपलियापाला रीज़नल पार्क मुक्तिधाम पहुंचेगी ।

संक्षिप्त जीवन वृत्त
स्मृति शेष

13 मार्च 1949 को इंदौर में जन्में श्री जलधारी ने महज 20 वर्ष की युवा आयु में पत्रकारिता कार्य प्रारम्भ कर दिया था। अपने चार दशक के मैराथन पत्रकारिता जीवन में श्री जलधारी ने इंदौर के विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों को अपनी सेवाएँ दीं , जिनमें प्रमुख मांलवा समाचार, स्वदेश, विश्व भ्रमण, अपनी दुनिया, दैनिक भास्कर और नई दुनिया शामिल हैं।
उन्हें सकारात्मक पत्रकारिता के लिये वर्ष 2015 में राज्य स्तरीय पत्रकारिता पुरुष्कार से सम्मानित किया गया। बहुप्रतिभा के धनी श्री जलधारी ने अपने अनुभवों को 'स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म' में अध्यापन कार्य कर साझा किया।
श्री जलधारी अपने सरल , सहज , सौम्य व्यवहार की वजह से इंदौर के वरिष्ठ एवं युवा पत्रकारों के बेहद करीब थे। यही वजह है कि आज इंदौर के समूचे प्रेस जगत में उनके देहवासन के समाचार से शोक की लहर फैली है। इंदौर प्रेस क्लब के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री जलधारीकिडनी और लीवर की समस्या के चलते पिछले दो वर्षों से जीवन से संघर्ष कर रहे थे। अपनी सर्व जिम्मेदारियों को पूर्ण कर चुके श्री जलधारी अपने पीछे धर्मपत्नी, एक बेटा और एक बेटी का परिवार छोड़ गये हैं।
सेव जर्नलिज़्म फाउंडेशन परिवार श्री जलधारी को श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। इस दुखद घड़ी में ईश्वर उनके परिवार को संबल प्रदान करे।
#एसजेएफ

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