Quantum Reiki
15/10/2025
https://youtu.be/nIJEdmsxDkQ?si=JGee1JMjVwLRQ_s3🌅मां अजस्ता जी के संचालन में हाटपिपल्या अद्भुत ओशो ध्यान शिविर परस्पर गार्डन फूटी कोठी इंदौर*
ध्यान शिविर में विभिन्न स्थानों से ओशो मित्रो की उपस्थिति ने हमारे दिलो में एक नई रोशनी का संचार किया है।आपके चरणों की धूल ने हमारे आयोजन को एक अद्वितीय और अविस्मरणीय बना दिया है।आपकी अभिसिंचित ऊर्जा,आपकी मुस्कान ने हमारे बीच एक नई ऊर्जा का स्त्रोत खोलकर हमे मजबूत और एक जुट बनाया हे।
आपके सकारात्मक सहयोग और समर्थन के लिए🥀फ्रेंड्स ऑफ ओशो हाटपिपल्या 🥀आपको हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करता है। आपकी उपस्थिति ने हमें यह महसूस कराया है, की हम एक दूसरे के साथ जुड़े हुवे है।हमारे बीच एक अद्वितीय संबंध हैं,जिसे कभी भुला नहीं सकते है।
आपकी गरिमामय उपस्थिति ने,,ओशो शिविर,को सुंदर सूर्योदय की तरह बना दिया।आप लोगो की कृपा से एक नई आशा की किरण के साथ उत्साह का संचार हुआ है।
आपकी सुंदर मुस्कान से हमारे मुरझाए चेहरों को सुंदर फूल की तरह खिला दिया है।
*इस अद्भुत और सुंदर आयोजन में समस्त ओशो प्रेमियों व मा प्रेम अजास्ता जी की भागीदारी ने ,,ओशो शिविर,,को सफल विस्मृणीय बनाया इस हेतु आपके लाड़,दुलार,प्यार,स्नेह,ओर समर्थन के लिए हम हमेशा कृतज्ञ रहेंगे,ओर आशा करते हे की भविष्य में हमारा आमंत्रण स्वीकार करने में संकोच नही करेगे।*
*👣👏गलती हमसे 100% हुई होगी,इसलिए सुझाव,मार्गदर्शन स्वीकार्य है।*
*आपका*
*शुभचिंतक*
*✍️वीतराग*
🌅🌎🌠
ये सारी घटनाएं 1960 से 1989 तक के बीच की होगी
तो इस में घुसने से पहले पढ़ने से पहले
❌दिमाग और जूते बाहर ही उतार दे❌
“भगवान श्री रजनीश ईसा मसीह के बाद सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति हैं। "
(हालांकि इसमें मेरी अस्वीकृति है)
ये भविष्यसूचक शब्द इस वर्ष के प्रारंभ में कहे थे टॉम रॉबिन्स ने, जो “अमरीका के सर्वश्रेष्ठ जीवित साहित्यिक
लेखकों में एक” गिने जाते हैं। उस समय उन्हें इस बात का पता नहीं था लेकिन भविष्य में कुछ
ऐसी घटनाएं घटनेवाली थीं, जो इस अतिशयोक्तिपूर्ण दिखाई देनेवाले वक्तव्य का समर्थन करने
वाली थीं। वे आगामी घटनाएं दिखानेवाली थीं कि विश्व का हर प्रमुख शासन भगवान श्री
रजनीश से भयभीत था ।
क्यों?
भगवान श्री रजनीश कौन हैं?
और वे इतने असामान्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय विवादास्पद व्यक्ति किस तरह बन गए?
वस्तुतः उन्हें खतरनाक कहने वाले टॉम रॉबिन्स पहले व्यक्ति नहीं थे। यह ख्याति उन्हें बहुत
पहले छठे दशक में भारतीय पत्रकारों द्वारा प्राप्त हुई थी, जब वे विश्वविद्यालय में दर्शन के
एक
प्राध्यापक थे और सेक्स, धर्म तथा राजनीति संबंधी अपने क्रांतिकारी और स्पष्टवादी विचारों से
अतिशय रूढ़िवादी भारतीय जनता को क्रुद्ध कर चुके थे।
सातवें दशक के उत्तरार्ध में पाश्चात्य पत्रकार उनकी ओर आकृष्ट हुए और उन्होंने भी अपने
विशेषण जोड़ दिए। लेकिन, लगभग निरपवाद रूप से, उनमें से जो भी पूना के उनके आश्रम में
गए और उन्हें सुना, वे लोग अपने भारतीय समकक्षों से कहीं अधिक विवेकपूर्ण थे। जब वे
पश्चिम वापिस लौटे तो “असाधारण”, “विलक्षण", "गहन रूप से प्रभावित करने वाले",
“अत्यंत विचलित करने वाले" और "अत्यंत चित्ताकर्षक" जैसे विशेषण अपने साथ ले गए।
पाश्चात्य प्रसार-माध्यम के सारे रूप यहां आए, और समीक्षाएं कीं। 1977 में “वोग” पत्रिका
की जीन लिएल ने उनके लिए कहा, “वे एक सौम्य, करुणामय और समूचे अखण्डित व्यक्ति...
अत्यंत अनुप्राणित, अत्यंत सुशिक्षित... और विशद व गहन जानकारी रखनेवाला ऐसा वक्ता मैंने
पहले कभी और कहीं नहीं सुना। जर्मन "कॉस्मॉपॉलिटन' मैगजीन की फ्लॉरेन्स गाल ने उनका
वर्णन “करिश्मापूर्ण” कहकर किया, ऐसे जैसे एविता पेरॉन, मार्टिन लूथर किंग, जॉन एफ. केनेडी
और पोप जॉन-तेईसवें। 1979 में दूरदर्शन के निष्ठुर आलोचक अलन विकर ने अपने कार्यक्रम
"
"विकर्स वर्ल्ड" में कहाः "वे बहुत सुंदर हैं... बोलते वक्त वे बहुत ही प्रभावशाली लगते हैं
डच "पैनोरमा" मेगजीन के मार्सेल मियेर, जो 1978 में पूना आए थे, की दृष्टि में वे "मनोविज्ञान
के आचार्य और परम बुद्धिमान" थे। उन्होंने आगे कहा, "ऐसा व्यक्ति मैंने सिर्फ किताबों में देखा
था, वास्तव में नहीं।
"अरगेंटिनिशेस टेल्लाट" की मेरीलुइज़ एलेमन ने 1980 में लिखा,
“पूरबेतर देशों के लोगों के मन में "भारत" अथवा "गुरु" शब्द सुनते ही बेखटके जो छवि
उभरती है, स्पष्टतः उस सौम्य पवित्र व्यक्ति नामक लहर पर सवार होना उन्होंने स्वीकार नहीं किया
है, और न ही सर्वज्ञ, करुणामय सद्गुरु वाली छवि की नकाब उन्होंने ओढ़नी चाही है।
"
रोनाल्ड कॉनवे, जो कि ऑस्ट्रेलिया में प्राध्यापक, लेखक, केथलिक तथा वहां के एक
अस्पताल में वरिष्ठ परामर्शक मनोवैज्ञानिक हैं, 1980 में पूना के आश्रम में आए थे। वे अपनी
रिपोर्ट में कहते हैं, “उनके आसपास कुछ मीटर की दूरी पर होना मात्र कुछ विलक्षण परिणाम लाता
है। उसका स्रोत कुछ भी हो, लेकिन रजनीश में कोई विलक्षण शक्ति और चुम्बकत्व है, जो इतनी
स्पर्शगोचर है कि महसूस की जा सके... उनको देखकर मुझे लगा कि शायद ईसा मसीह इसी
तरह के रहे होंगे।
"और “लंडन टाइम्स” के बर्नार्ड लेविन जिन्हें रूढ़िवादी सामाजिक समीक्षकों में तीखे वाग्बाणों
का प्रयोग करनेवाले वरिष्ठ सदस्य कहा जाता है, जब 1980 में रजनीश आश्रम देखने आए तो
उनके उद्गार इस प्रकार थेः "उस व्यक्ति से मैं एकदम सम्मोहित हो गया... और उनके आसपास
रहनेवाले लोगों से भी। रजनीश एक अनूठे शिक्षक हैं... और एक असाधारण चुंबक ।
"जिन लोगों के बहुत संदेहवादी होने की अपेक्षा थी, उनके ये उद्गार देखकर लगता है कि उन
तुलनात्मक रूप से प्रारंभिक दिनों में भी भगवान मात्र एक अन्य मशहूर किये गये पूर्वीय गुरु नहीं थे।
जैसा कि “एडिलेड (ऑस्ट्रेलियाई) सैटरडे रिव्यू" में एलन अटकिन्सन ने 1 अगस्त, 1981 के अंक
में लिखा, “यह बात साफ है कि रजनीश कोई साधारण आदमी नहीं हैं। उनका वर्णन इन शब्दों में
किया जाता हैः एक महान आधुनिक आध्यात्मिक ऋषि; जीसस और बुद्ध की परंपरा के; बुद्धत्व को
उपलब्ध सद्गुरु; पूना के झक्की संत, वर्तमान समय के प्रसन्नचित्त जॉन द बैप्टिस्ट — और उनके
विरोधियों के अनुसार वे क्राइस्ट-विरोधी, पागल, संसार के सबसे खतरनाक आदमी हैं। विगत दो
वर्षों से पश्चिम के मनोवैज्ञानिकों, मनस्चिकित्सकों, चर्च से संबंधित लोगों, पत्रकारों तथा व्यावसायिक
संदेहवादियों के मन में उनकी उपस्थिति और उनके प्रभाव के कारण कुतूहल पैदा हो गया है।
"साढ़े चार साल बाद, सन् 1986 तक, वही कुतूहल जगानेवाली उपस्थिति और प्रभाव दुनिया
के लगभग हर देश के लिए अपने-अपने कम्प्यूटरों में भगवान श्री रजनीश के नाम के आगे लाल
सावधान चिह्न अंकित कर लेने का कारण बन गया है- "राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए
खतरनाक ”..."सार्वजनिक कल्याण की दृष्टि से अहितकारक उपस्थिति”...“राज्य के हितों के
लिए बाधा"... "प्रवेश कदापि न दें।
क्यों?
उनके साथ जुड़ा 'खतरनाक' विशेषण केवल उनके विचारों के कारण उन्हें दिया गया है।
आतंकवादी अथवा किसी संघातक गिरोह के नेता के अर्थों में उनके खतरनाक होने का तो कोई
कभी सवाल ही नहीं था। समस्त ज्ञात वृत्तान्त के अनुसार वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो कभी अपने
घर से बाहर नहीं गए, बल्कि प्रवचन देने के अलावा जो वास्तव में अपने कमरे तक से बाहर नहीं
गए। और जिन्होंने बोलने के अलावा और कुछ भी नहीं किया है। जिन दो देशों में वे रहे
भारत और अमेरिका • उनमें गहरी छानबीन करने के बावजूद भी जिस व्यक्ति के ऊपर कोई भी
जुर्म कायम नहीं किया जा सका, सिवाय इसके कि उन्होंने आप्रवास अधिकारियों को झूठे वक्तव्य
दिए हैं।
*
फिर जर्मन, स्विस, ऑस्ट्रेलियन तथा डच सरकारों को 1986 में आपातकालीन आदेश क्यों
पास करने पड़े कि यह व्यक्ति उनके देश की जमीन पर पांव तक नहीं रख सकता?
इटली और स्वीडन ने उन्हें पर्यटक-वीसा देने से इन्कार क्यों कर दिया?
जब हीथ्रो हवाई अड्डे पर उनका जेट आठ घंटे के लिए उतरा तब इंग्लैंड ने उनको ट्रांजिट
लाउंज में रात भर रुकने की इजाजत क्यों नहीं दी? ग्रीस में जब उन्हें चार हफ्ते रुकने की अनुमति
थी तब उन्हें सिर्फ दो हफ्तों के बाद वहां से अचानक निकाल बाहर क्यों कर दिया गया— -जबकि
इन दो हफ्तों में उन्होंने अपने घर से बाहर कदम भी नहीं रखा था?
जिस जेट प्लेन में वे यात्रा कर रहे थे, उसे कनाडा ने ईंधन लेने हेतु पैंतालीस मिनटों के लिए
भी क्यों नहीं उतरने दिया—ऐसी लिखित गांरटी के बावजूद भी कि वे प्लेन के बाहर कदम नहीं
रखेंगे?
सामान्यतः सीधे-सादे करीबियन द्वीप-समूहों ने अखबारों द्वारा प्रसारित मात्र एक अफवाह की
हल्की-सी भनक पर कि वे वहीं जा रहे हैं, अपने हवाई अड्डों को सतर्क क्यों कर दिया कि उनका
हवाई जहाज वहां उतरने न दें?
जमाइका ने उन्हें दस दिन का वीसा देने के बाद, उनके वहां पहुंचने पर उन्हें चौबीस घंटे के
भीतर देश छोड़ने का आदेश क्यों दे दिया?
* पीत पत्रकारिता द्वारा उत्कंठापूर्वक प्रसारित की गयी अफवाहों के ठीक विपरीत, भगवान श्री रजनीश भारत
में कभी किसी प्रकार के आरोप के जुर्म में नहीं थे। अमरीका में, चार वर्ष तक प्रायः प्रत्येक सरकारी एजेंसी द्वारा
चलाई गयी जांच-पड़तालों के बाद, केवल क्षुद्र आरोप जो उन पर लगाये जा सके वे थे कि अमरीका- आगमन पर
उन्होंने झूठा वक्तव्य दिया कि उनका उस देश में स्थायी आवास का इरादा नहीं था जबकि वास्तव में उनका वैसा
इरादा था, और कि उन्होंने कुछ लोगों को ऐसे विवाहों के आधार पर स्थायी आवास के लिए आवेदन करने की प्रेरणा
दी जिनके बारे में उन्हें पता था कि वे विवाह सही नहीं थे।
क्रिस्टन डेमोक्रेटों के एक गुट ने यूरोप की संसद के सामने यह प्रस्ताव क्यों रखा कि सभी सदस्य देश ऐसा उपाय करे कि जिससे वे (भगवान) कभी भी उन देशों की सीमा में रह न सके ?
वेटिकन के अपने नियंत्रण के अंतर्गत आने वाले सभी इतालवी समाचार पत्रों से यह निवेदन क्यों किया कि वे उनके नाम का उल्लेख न करे?
अमरीकी अलर्नी जनरल एड मिज ने ऐसा क्यों कहा वे चाहते है कि " वे (भगवान) भारत वापिस हो ओर फिर कभी देखने सुनने न आय "
ओर वे पश्चिम जगत में न रहे इसके लिए अमरीकी सरकार को ब्लैकमेल पर क्यों उतरना पड़ा ?
ऐसी क्या बात थी जिससे कि विश्व की सर्वाधिक ताकतवर सरकार एक अकेले व्यक्ति से इतनी भयभीत हो गई
जिसके पास न की राजनीतिक पद था , जो स्वयं के अलावा किसी ओर का प्रतिनिधत्व नहीं करता था जो बोलने के अलावा कोई कृत्य नहीं करता था ?
यह कौन आदमी था जिससे अपने खिलाफ कम्युनिस्ट, पूंजीवाद, कैथलिक, ओर फासिस्टुको एक पवित्र बंधन में जोड़ दिया ।
आज इतना ही🙏
आपके अंदर बैठे परमात्मा को मेरा नमस्कार
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इस वीडियो का उद्देश्य पैसा कमाना ही नहीं अपितु लोगों के जीवन में आनंद बड़े सभी मित्रों को ओशो नमन💚🌹👏
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