KALKI AVTAR
04/11/2014
भारतीय सन्दर्भ में गौ माता का विशेष महत्त्व है। समृद्धि और संस्कृति को जोड़ती है। भुक्ति-मुक्ति दायित्व है। राम, राष्ट्र और रोटी को जोड़ती है। गौ माता के बारे में गीता प्रेस गोरखपुर ने कल्याण का गौअंक एवं गौसेवा अंक प्रकाशित कर चिरस्मरणीय योगदान किया है। किसी भी गौ रक्षक, गौ सेवक के लिए इन्हे पढ़ जाना बहुत बड़ा प्रशिक्षण है।
दो तथ्यों का उल्लेख करता हूँ। मनुष्य के और गौ के गर्भ काल में केवल एक सप्ताह का अंतर है। किसी का नौ महीना 6 दिन, किसी का नौ महीना 13 दिन। बकरी का गर्भ काल 6 माह, भैस का एक वर्ष होता है|
मनुष्य के माँ का दूध और गाय का दूध तत्वों की दृष्टि से लगभग समान है। बकरी का दूध हल्का सुपाच्य किन्तु कम पौष्टिक है। भैस का दूध गरिष्ट अधिक वसा युक्त है। गाय के दूध की तुलना में कुछ तत्व भैस के दूध में नहीं है।
हैदराबाद के श्री सहदेव दास की गाय के बारे में लिखी पुस्तक बहुत बोधप्रद है। विगत 200 वर्षो में गोवंश का ह्रास तेजी से हुआ है। बाजारवाद ने तो हद ही कर दी है। आधुनिक टेक्नोलॉजी ने पशु शक्ति को ही ख़ारिज कर दिया-उसमे बैल भी गए ।
बाजारवादी नीतियों ने आस्थाहीनता के कारण मांस निर्यात की बढ़ोतरी को विकास में शामिल कर लिए। खेती और ढुलाई से पशु शक्ति बाहर हो गई। मोटे अनाज और मिश्रित फसल से चारा मिलता था। महीन अनाज और नगदी फसल में चारे पर मार पर जाती है|
गोचर जमींनो को शहरीकरण और अवैध कब्ज़ा बहुतांश लील गया है। सामाजिक आश्रय के आभाव में वृद्धाश्रय की तरह गौशालाएं बढ़ी है और व्यपारिक निगाहे अधिक पैनी हुई है अनैतिकता की हद तक।
इन कारणों से गौ रक्षा और गौ सेवा के सामने गंभीर चुनौती है। प्रकृति विरुद्ध बाजारवादी नीतियों का संवेदनशील मनोविज्ञान एवं सामाजिक पारस्परिकता एवं व्यवहार में मानवीयता घटी है। व्यक्तिवाद, उपभोगवाद बढ़ा है। मनुष्य की उदारता और आंतरिक अमीरी घटी है|
इस नुकसान की भरपाई कठिन है। बहुत समय लेगी। इस नुकसान को नहीं समझा गया है आंकने और परिमार्जन की बात तो दूर।
गौरक्षा और उसके सामाजिक दायित्व के निर्वहन के लिए जरुरी है की सत्ता की कृषि, सिचाई, ढुलाई, ऊर्जा, स्वास्थ्य, पर्यावरण की नीतिया देशी हो और गौमाता के अनुकूल हो|
गौशाला और गौमाता से संबंध अनेक विध रचनात्मक प्रयोग गौरक्षा के सन्दर्भ में आवश्यक है, उपयोगी है। मगर समस्या के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं है।
इस दृष्टि से सार्वजनिक क्षेत्र में गौमाता के बारे में आस्था के अधिष्ठान पर रहना जरुरी है। साथ ही सम्पूर्ण गौवंश हत्या बंदी एवं उससे संबंधित और उससे उतपन्न चुनौतियों के समाधान के लिए समाज की समझ और सहभागिता और संघर्ष जरुरी रहेगी|
गौ माता हम सब पर अपनी कृपा बनाए रखें.
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रावण सीता को समझा समझा कर हार गया था पर सीता ने रावण की तरफ एक बार देखा तक नहीं ,
तब मंदोदरी ने उपाय बताया कि तुम राम बन के सीता के पास जाओ वो तुम्हे जरूर देखेगी...
रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर चुका हू
मंदोदरी - तब क्या सीता ने आपकी ओर देखा
रावण - "मैं खुद सीता को नहीं देख सका...क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ मुझे परायी नारी अपनी माता और अपनी पुत्री सी दिखती है......"
अपने अंदर राम को ढूंढे, और उनके चरित्र पर चलिए आपसे भूलकर भी भूल नहीं होगी
जय श्री राम
13/09/2014
पुराणों में कल्कि अवतार के कलियुग के अंतिम चरण में आने की भविष्यवाणी की गई है। अभी कलियुग का प्रथम चरण ही चल रहा है लेकिन अभी से ही कल्कि अवतार के नाम पर पूजा-पाठ और कर्मकांड शुरू हो चुके हैं। कुछ संगठनों का दावा है कि कल्कि अवतार के प्रकट होने का समय नजदीक आ गया है और कुछ का दावा है कि कल्कि अवतार हो चुका है। जो यह कहते हैं कि कल्कि अवतार हो चुका है, उनके दावों में कितना दम है यह जानने का हम प्रयास करेंगे।
आप ये तारीखें याद रखें : कलयुग की शुरुआत 3000 विक्रम संवत् पूर्व अर्थात 2942 ईसा पूर्व में हुई। 3114 विक्रम संवत् पूर्व अर्थात 3056 ईसा पूर्व को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इसके बाद कोई बड़ी घटना है तो वह है भगवान बुद्ध का जन्म। बुद्ध के पूर्व ही जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। महावीर स्वामी का जन्म 1797 विक्रम संवत पूर्व अर्थात 1739 ईसा पूर्व बिहार के वैशाली क्षेत्र के कुण्डग्राम में हुआ था।
बुद्ध के बाद ही कल्कि अवतार होने की बात कही जाती है। पौराणिक इतिहास के अनुसार गौतम बुद्ध का काल 1760 विक्रम संवत् पूर्व से 1680 वि.पू. होने का मत स्थिर किया गया है।
मथुरावासियों के इतिहास अनुसार 1710 विक्रम संवत पूर्व बुद्ध मथुरा आए थे अर्थात 1652 ईसा पूर्व, जबकि इतिहास में पढ़ाया जाता है कि ईसा से 563 वर्ष पूर्व बुद्ध का जन्म हुआ था यानी कि अंग्रेज इतिहाकार भारतीय इतिहास को 11सौ (1100) वर्ष नीचे खींचकर लाकर उसे भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। इसका मतलब उन्होंने भारतीय इतिहास के 1 हजार वर्षों के पन्ने फाड़ दिए और भारतीयों को वही पढ़ाया, जो वे चाहते थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के साथ-साथ ही बौद्ध धर्म के भी गौरवशाली इतिहास को मिटाने का प्रयास किया। यही दो धर्म ऐसे थे जिनसे मुगल, अंग्रेज और ईसाइयत को खतरा महसूस होता था। खैर!
वर्तमान में भगवान कल्कि के नाम पर उत्तरप्रदेश में संभल ग्राम में एक मंदिर बना है। उनके नाम पर दिल्ली आदि क्षेत्रों में ऑडियो, वीडियो, सीडी, पुस्तक आदि साहित्य सामग्री का विकास कर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। उनके नाम की आरती, चालीसा, पुराण आदि मिलते हैं। शंकराचार्यों के अनुसार कलयुग में दो ही अवतार हैं- बुद्ध और कल्कि।
कल्कि अवतार को लेकर हिन्दुओं में यह भ्रम और मतभेद क्यूं हैं? क्योंकि हिन्दुओं के इतिहास को मुगलों और अंग्रेजों के काल में लगभग नष्ट कर दिया गया था। तो फिर इतिहास कैसे पता चले? इतिहास के पन्नों को अब खुदाई और बचे हुए अवशेषों के आधार पर जाना जाता है। इसके अलावा इतिहास का स्रोत है- जैन और बौद्ध धर्मग्रथों के अलावा चीनी, नेपाली, बर्मा, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि पूर्वी देशों के इतिहास ग्रंथ।
इसके अलावा मथुरा, काशी, वृंदावन, हरिद्वार, ऋषिकेश, कांची आदि पवित्र नगरियों में बैठे पंडों और पुरोहितों के पास संरक्षित वे पौथी-पानड़े जो उन्होंने हजारों वर्षों से सुरक्षित रखे हैं। उनकी पौथियों के इतिहास से यह पता चला कि अंग्रेज जो इतिहास लिख गए, वह पूरी तरह से झूठ पर आधारित है। फिर हमारे जेएनयू के विद्वानों ने जो लिखा उस पर क्या कहें? वे तो हमसे ज्यादा पढ़े लिखे हैं बुद्धिमान हैं। अंग्रेजों ने ईसा पूर्व के संपूर्ण इतिहास को भ्रमित करने के लिए तथ्यों और संदर्भों के साथ छेड़छाड़ की। फिर उन्होंने गुप्त काल के वह पन्ने भी फाड़ दिए जिसे पढ़कर भारतीय गौरव का अनुभव करें। फिर बाद के इतिहासकारों ने अनुसरण करते हुए पूरी तरह अनजाने में ही सही समाज में एक झूठा इतिहास प्रचारित कर दिया। बाद में अंग्रेज ऐसे लोगों के हाथों में सत्ता दे गए जो किसी भी धर्म पर विश्वास नहीं करते थे लेकिन वे धर्म का उपयोग करना अच्छी तरह जानते थे।
पुराणों और भारत के धार्मिक इतिहास को जानने वाले जानकार मानते हैं कि भगवान कृष्ण के पूर्व 'अवतार' जैसा शब्द प्रचलन में तो था लेकिन विष्णु, शिव आदि के अवतार होते हैं, यह नहीं था। भगवान कृष्ण के बाद जब धर्म का पतन होना शुरु हुआ तो धर्म को पुन: स्थापित करने के लिए अवतारवाद को स्थापित किया गया। वेदव्यास ने कुछ ही पुराण लिखे थे। अधिकतर पुराण बौद्धकाल में ही लिखे गए हैं कुछ मध्यकाल में लिखें गए। सबसे दुखदाई बात यह कि पुराणों में मध्यकाल और फिर अंग्रेज काल में संसोधित कराया गया था। उसे भ्रमित करने वाले बनाया गया।
पुराणों में विष्णु के 10 अवतार बताए गए हैं- मत्स्य, क्रुमु, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। कल्कि अवतार भगवान विष्णु के 10 अवतारों में अंतिम हैं, जोकि भविष्य में जन्म लेकर कलयुग का अंत करके सतयुग का प्रारंभ करेगा।
स्कंद पुराण के दशम अध्याय में स्पष्ट वर्णित है कि कलियुग में भगवान श्रीविष्णु का अवतार श्रीकल्कि के रुप में सम्भल ग्राम में होगा।
'अग्नि पुराण' के सौलहवें अध्याय में कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण किए हुए एक घुड़सवार के रूप में किया हैं और वे भविष्य में होंगे। कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध और विजय के लिए निकलेगा तथा बौद्ध, जैन और म्लेच्छों को पराजित कर सनातन राज्य स्थापित करेगा। पुराणों की यह धारणा की कोई मुक्तिदाता भविष्य में होगा सभी धर्मों ने अपनाई।
इसके विपरीत कुछ अन्य पुराण और बौद्धकाल के कवियों की कविता और गद्य में ऐसा उल्लेख व गुणगान मिलता है कि कल्कि अवतार हो चुका है। 'वायु पुराण' (अध्याय 98) के अनुसार कल्कि अवतार कलयुग के चर्मोत्कर्ष पर जन्म ले चुका है। इसमें विष्णु की प्रशंसा करते हुए दत्तात्रेय, व्यास, कल्की विष्णु के अवतार कहे गए हैं, किन्तु बुद्ध का उल्लेख नहीं हुआ है। इसका मतलब यह कि उस काल में या तो बुद्ध को अवतारी होने की मान्यता नहीं मिलती थी या फिर बुद्ध के पूर्व कल्कि अवतार हुआ होगा।
मत्स्य पुराण के द्वापर और कलियुग के वर्णन में कल्कि के होने का वर्णन मिलता है। बंगाली कवि जयदेव (1200 ई.) और चंडीदास के अनुसार भी कल्कि अवतार की घटना हो चुकी है अतः कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हो सकते हैं।
बौद्धकाल में जहां हिन्दू पुराणों के साथ छेड़खानी की गई, वहीं मध्यकाल में इसके कई पन्ने नष्ट कर इसको विरोधाभाषी बनाया गया। लेकिन बौद्ध ग्रंथों और जैन पुराणों में इतिहास की सही जानकारी संरक्षित है।
जैन पुराणों में एक कल्कि नामक भारतीय सम्राट का वर्णन मिलता है। जैन विद्वान गुणभद्र नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखते हैं कि कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के 1 हजार वर्ष बाद हुआ। जिनसेन ‘उत्तर पुराण’ में लिखते हैं कि कल्किराज ने 40 वर्ष राज किया और 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई।
कल्किराज अजितान्जय का पिता था, वह बहुत हिंसक और क्रूर शासक था जिसने दुनिया का दमन किया और निग्रंथों के जैन समुदाय पर अत्याचार किए। गुणभद्र के अनुसार उसने दिन में एक बार दोपहर भोजन करने वाले जैन निग्रंथों के भोजन पर भी टैक्स लगा दिया था, जिससे वे भूखे मरने लगे।
तब निग्रंथों को कल्कि की क्रूर यातनाओं से बचाने के लिए एक दैत्य का अवतरण हुआ जिसने वज्र (बिजली) के प्रहार से उसे मार दिया ओर अनगिनत युगों तक असहनीय दर्द और यातनाएं झेलने के लिए 'रत्नप्रभा नामक' नर्क में भेज दिया।
प्राचीन जैन ग्रंथों के अनुसार 'कल्कि' एक ऐतिहासिक सम्राट था जिसका शासनकाल महावीर की मृत्यु के 1 हजार साल बाद हुआ यानी कि महावीर स्वामी का जन्म यदि प्राचीन काल निर्धारण अनुसार मानें तो 1797 विक्रम संवत पूर्व अर्ताथ महावीर के एक हजार वर्ष बाद यानी 797 विक्रम संवत पूर्व कल्कि हुए थे अर्थात 739 ईसा पूर्व।
अब यदि हम अंग्रेजों द्वारा लिखे इतिहास का काल निर्धारण मानें तो महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व हुआ था। इसका मतलब महावीर के 1 हजार वर्ष बाद कल्कि हुए थे यानी कि तब भारत में गुप्त वंश का काल था। मौर्य और गुप्तकाल को भारत का स्वर्णकाल माना जाता है। गुप्तकाल के बाद ही भारत में बौद्ध और जैन धर्म का पतन होना शुरू हो गया था। आधे भारत पर राज्य करने वाले बौद्ध और जैनों का शासन आखिर हर्षवर्धन के काल तक समाप्त होकर शून्य क्यों हो गया?
तब क्या हम यह मानें कि गुप्त वंश के पतन के बाद ही कल्कि का अवतार हुआ जिसने शक, कुषाण आदि को ही नहीं मार भगाया बल्कि जिसने बौद्ध और जैनों के प्रभुत्व को भी समाप्त कर दिया?
यदि हम प्राचीन तारीख निर्धारण के अनुसार कल्कि का जन्म 739 ईसा पूर्व मानते हैं तो इसका मतलब कि जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ (877-8777 ईसा पूर्व) ईसा पूर्व के बाद कल्कि का जन्म हुआ होगा। पार्श्वनाथ के काल में जैन धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था और निश्चित ही तब हिन्दुओं के लिए जैन धर्म एक खतरा जान पड़ा होगा।
क्या हूण शासक मिहिरकुल थे कल्कि? यदि गुप्त काल के बाद कल्कि का होना मानें तो गुप्तों के बाद हूणों ने भारत पर कब्जा कर लिया था। जैन ग्रंथों में वर्णित कल्कि का समय और कार्य हूण सम्राट मिहिरकुल के साथ समानता रखता है अतः कल्किराज ओर मिहिरकुल (502-542 ई.) के एक होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
इतिहासकार केबी पाठक ने सम्राट मिहिरकुल हूण की पहचान कल्कि के रूप में की गई है। वे कहते हैं कि मिहिरकुल का दूसरा नाम कल्किराज था। जैन ग्रंथों ने कल्किराज के उत्तराधिकारी का नाम अजितान्जय बताया है। मिहिरकुल हूण के उत्तराधिकारी का नाम भी अजितान्जय था।
चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग मिहिरकुल की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष बाद भारत आया। उसके द्वारा लिखित 'सी यू की' नामक ग्रंत में भारत का वर्णन है। वह कहता है कि मिहिरकुल की मृत्यु के समय भयानक तूफान आया और ओले बरसे, धरती कांप उठी तथा चारों ओर गहरा अंधेरा छा गया।
बौद्ध संतों ने कहा कि अनगिनत लोगों को मारने और बुद्ध के धर्म को उखाड़ फेंकने के कारण मिहिरकुल गहरे नर्क में जा गिरा, जहां वह अंतहीन युगों तक सजा भोगता रहेगा।
इतिहास में मिहिरकुल हूण कल्कि की तरह श्रेष्ठ घुड़सवार और धनुर्धर के रूप में विख्यात है तथा कल्किराज (मिहिरकुल हूण) ने भी कल्कि की तरह जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का दमन किया था। उसने भारत से बौद्ध धर्म को उखाड़कर बाहर फेंक दिया और शक्य मुनियों को जंगल में ही रहने पर मजबूर कर दिया। क्यों उसने बौद्ध धर्म को भारत से उखाड़ फेंका?
इस संबंध में एक कहानी है कि मिहिरकुल बौद्ध धर्म अपनाना चाहता था। इस इच्छा से उनने बौद्धा के सर्वोच्च धर्मगरु को संदेश भेजा की आप मुझे बौद्ध धर्म के संबंध में जानकारी दें और बताएं कैसे मोक्ष पाया जा सकता हैं। उस सर्वोच्च गुरु ने खुद संदेश न भेजकर और न आकर एक भिक्षु को भेजा और कहा कि आप इससे सीख लें। मिहिरकुल ने इसे अपना अपमान समझा और शपथ ली की भारत से शाक्यों को नामोनिशान मिटा दूंगा।
कल्कि पुराण में लिखा भी हैं कि कल्कि आएंगे और अनिश्वरवादी धर्मों (जैन और बौद्ध) का नाश कर देंगे। क्या मिहिरकुल ने ऐसा नहीं किया था?
कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान कल्हण के अनुसार मिहिरकुल वैदिक धर्म का अनुयायी था। वह अनीश्वरवादियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ता था। कल्हण ने 'राजतरंगिणी' नामक ग्रंथ में मिहिरकुल का वर्णन शिवभक्त के रूप में किया है। कल्हण कहता है कि मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया।
हूणों के शासन से पहले कश्मीर ही नहीं, वरन पूरे भारत में बौद्ध धर्म प्रबल था। भारत में बौद्ध धर्म के अवसान और सनातन धर्म के संरक्षण एवं विकास में मिहिरकुल हूण की एक प्रमुख भूमिका है। मिहिरकुल का शासन ईरान से लेकर बर्मा और कश्मीर से लेकर श्रीलंका तक था।
कुछ विद्वानों के अनुसार मिहिरकुल को कल्कि मानना इसलिए ठीक नहीं होगा, क्योंकि
हूण तो विदेशी आक्रांता थे। उनको तो इतिहास में विधर्मी माना गया है। 'विधर्मी' का अर्थ होता है ऐसे व्यक्ति जिसने या जिसके पूर्वजों ने हिन्दू धर्म को त्यागकर दूसरों का धर्म अपना लिया हो।
लेकिन ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार हूण विदेशी नहीं थे। उन्हें प्राचीनकाल में यक्ष कहा जाता था। वे सभी धनाढ्य लोग थे। हूण, कुषाण और शक सभी मूलत: भारतीय ही थे। ये सभी भारत से निकलकर बाहर गए और फिर पुन: भारत में आकर राज करने लगे।
इतिहासकारों के अनुसार वराह हूण और कुषाण लगभग 360 ई. में भारत के पश्चिमोत्तर में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनकर उभरे थे। उन्होंने पंजाब से मालवा तक अपना शासन स्थापित कर लिया था। श्वेत हूण भी 5वीं शताब्दी में पश्चिमोत्तर भारत के शासक थे। 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के नेतृत्व में जब हूणों ने मध्यभारत में साम्राज्य स्थापित किया, तब वे वैदिक धर्म और संस्कृति का एक हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इससे पहले मौर्य वंश भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे अतः हूणों और गुप्तों का टकराव दो भारतीय ताकतों का टकराव था।
भारत के प्रथम शक्तिशाली हूण सम्राट तोरमाण के शासनकाल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्यभारत के एरण नामक स्थान से वाराह मूर्ति से मिला है। हूणों के देवता वाराह थे।
कालांतर में हूणों से संबंधित माने जाने वाले गुर्जरों के प्रतिहार वंश ने मिहिरभोज के नेतृत्व में उत्तर भारत में अंतिम हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया और हिन्दू संस्कृति के संरक्षण में हूणों जैसी प्रभावी भूमिका निभाई।
तोरमाण हूण की तरह गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज भी वाराह का उपासक था और उसने आदि वाराह की उपाधि भी धारण की थी। जाटों, गुर्जर-प्रतिहारों ने 7वीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों से भारत और उसकी संस्कृति की जो रक्षा की उससे सभी इतिहासकार परिचित हैं।
समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था, क्योंकि भोज राजाओं ने 10वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवृत्त का महान सम्राट कहा जाता था। गुर्जर संभवतः हूणों और कुषाणों की नई पहचान थी।
अतः हूणों और उनके वंशज गुर्जरों ने हिन्दू धर्म और संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण से इनके सम्राट मिहिरकुल हूण औरमिहिरभोज गुर्जर को समकालीन हिन्दू समाज द्वारा अवतारी पुरुष के रूप में देखा जाना आश्चर्य नहीं होगा। निश्चित ही इन सम्राटों ने हिन्दू समाज को बाहरी और भीतरी आक्रमण से निजाद दिलाई थी इसलिए इनकी महानता के गुणगान करना स्वाभाविक ही था। लेकिन मध्यकाल में भारत के उन महान राजाओं के इतिहास को मिटाने का भरपूर प्रयास किया गया जिन्होंने यहां के धर्म और संस्कृति की रक्षा की। फिर अंग्रेजों ने उनके इतिहास को विरोधामासी बनाकर उन्होंने बौद्ध सम्राटों को महान बनाया। सचमुच सम्राट मिहिरकुल सम्राट अशोक से भी महान थे।
संदर्भ : मत्स्य पुराण, वायु पुराण, उत्तर पुराण आदि।
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